Tuesday, July 25, 2017

गुटर गूं के अतिरिक्त नहीं है जीवन

#हिन्दी_ब्लागिंग
मसूरी में देखे थे देवदार के वृक्ष, लम्बे इतने की मानो आकाश को छूने की होड़ लगी हो और गहरे इतने की जमीन तलाशनी पड़े। पेड़ जहाँ उगते हैं, वे वहाँ तक सीमित नहीं रहते, आकाश-पाताल की तलाश करते ही रहते हैं। हम मनुष्य भी सारा जहाँ देखना चाहते हैं, सात समुद्र के पार तक सब कुछ देखना चाहते हैं। पहाड़ों के ऊपर जहाँ और भी है, उसे भी तलाशना चाहते हैं। मैं एक नन्हीं चिड़िया कैसे उड़ती है, उसे देखना चाहती हूँ, एक छोटी सी मछली विशाल समुद्र में कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है, उसे देखना चाहती हूँ। रेत के टीलों पर कैसे एक केक्टस में फूल खिलता है. उसे महसूस करना चाहती हूँ। मैं वो सब देखना और छूना  चाहती हूँ जो इस धरती पर प्रकृति की देन है। मनुष्य ने क्या बनाया है, यह देखना मेरी चाहत नहीं है। बस प्रकृति कैसी है, यही देखने की चाहना है। लेकिन क्या मन की चाह पूरी होती है? कभी समुद्र की एक बूंद से ही सातों समुद्र नापने का संतोष करना पड़ता है तो कभी एक बीज से ही सारे देवदार और सारे ही अरण्य देखने का सुख तलाश लेती हूँ।
कभी महसूस होता है कि हम जंजीरों से जकड़े हैं, बेड़ियां पड़ी हैं हमारे पैरों में। यायावर की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं लेकिन जीवन ऐसा नहीं करने देता। हम एक गृहस्थी बसा  लेते हैं और उस बसावट में ऐसी भूलभुलैय्या में फंस जाते हैं कि निकलने का मार्ग ही नहीं सूझता। प्रकृति हँसना सिखाती है लेकिन गृहस्थी रोने का पाठ बखूबी पढ़ा देती है। रोते-रोते जीवन कब प्रकृति से दूर चले गया पता ही नहीं चलता। बरसात में सारी गर्द झड़ जाती है, लेकिन समय मन पर ऐसी गर्द चढ़ा देता है कि कितना ही खुरचो, मन की उजास दिखायी ही नहीं देती। कैसी उजली सी है प्रकृति, लेकिन मन न जाने कहाँ खो गया है! उसे छूने का, उसे महसूस करने का मन ही नहीं  होता। हिरण अपनी जिन्दगी जी लेता है, वह कूदता है, फलांग लगाता है, मौर नाच लेता है, कोयल कुहूं-कुहूं बोल लेती है, चिड़िया भी मुंडेर पर आकर चींची कर लेती है, लेकिन मन न जाने किसे खोजता रहता है!

सारी प्रकृति जोड़ों से बंधी है, मोर तभी नाचता है जब उसे मोरनी के साथ होती है, चिड़िया की चींची भी साथी के बिना अधूरी है। प्रकृति कुछ भी नहीं है, बस जोड़ों की कहानी है। हँसना, फुदकना, चहचहाना सभी कुछ एक-दूसरे के लिये है।  लेकिन मनुष्य की बात जुदा है, वह हमेशा दिखाना चाहता है कि मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ, मेरी खुशी अकेले में भी सम्भव है। मैं अकेले में भी चहचहा सकता हूँ। लेकिन यह उसका भ्रम है। जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में भी जो एक-दूजे में खुशी ढूंढते हैं, वे ही खुश रहते हैं। जो खुद की ही खुशी ढूंढते हैं, वे खुश नहीं रह सकते। मनुष्य अकेला चल पड़ता है, उसे लगता है कि वह यायावर बनकर अकेला ही चल सकेगा लेकिन यदि वह भी कबूतर के जोड़े की तरह रहे या उन पक्षियों की तरह रहे जो अपने जोड़ो के साथ सात समुद्र पार करके भी भारत चले आते हैं और यहाँ नया जीवन बसाते हैं,  फिर उड़ जाते हैं। उदयपुर का फतेहसागर सफेद और काले पक्षियों का डेरा है, बड़े-बड़े पंख फैलाते ये पक्षी जीवन को अपने पास बुलाते हैं। हम मनुष्यों को जीवन क्या है, पाठ पढ़ाते रहते हैं। मैं रोज शाम को इनको देखने फतेहसागर चले जाती हूँ, लगता है कि यही जीवन है। यही यायावरी है, ये जब चाहे आकाश में उड़कर उसे नाप लेते हैं और जब चाहें पानी में तैरकर उसकी थाह ले लेते हैं। हम तो बस किनारे से देखने वाले लोग हैं, प्रकृति को आत्मसात नहीं कर पाते, बस दूर से ही देखते हैं और दूर से भी कहाँ देख पाते हैं? यहाँ कितने हैं जिनके जोड़े एक दूसरे के पूरक है? शायद कोई नहीं या शायद मुठ्ठीभर। कभी लगता  है कि मनुष्य ने कितने किले खड़े कर लिये लेकिन अपने साथी का  हाथ नहीं पकड़ पाया। मनुष्य ने पानी में भी दुनिया बसा ली लेकिन साथी का साथ नहीं रख पाया। बिना साथी सबकुछ बेकार है, यह प्रकृति है ही नहीं, यह तो विकृति है और इस विकृति को जीने के लिये मनुष्य कितना अहंकारी बन बैठा है? काश हम भी कबूतर के जोड़े के समान ही होते! गुटर गूं के अतिरिक्त कुछ नहीं है जीवन।

Monday, July 24, 2017

पहल करो – खेल तुम्हारा होगा

#हिन्दी_ब्लागिंग

आओ आज खेल की ही  बात करें। हम भी अजीब रहे हैं, अपने आप में। कुछ हमारा डिफेक्ट और कुछ हमारी परिस्थितियों का या भाग्य का। हम बस वही करते रहे जो दुनिया में अमूमन नहीं होता था। हमारा भाग्य भी हमें उसी ओर धकेलता रहा है। हमारी लड़की बने रहने की चाहत लम्बे समय तक चल ही नहीं पाती थी, आज पूरी कोशिश में लगी हूँ कि महिला होने के सारे सुख अपनी झोली में डाल लूँ। बचपन में सभी खेलते हैं, तो हम  भी खूब खेलते थे, उसमें नया कुछ नहीं था, बस नया इतना ही था कि गुड़िया की शादी कभी नहीं करायी, रसोई-रसोई का खेल कभी नहीं खेला। इसके उलट कंचे खेले, गिल्ली-डण्डा खेला। पहलदूज, रस्सीकूद, गुट्टे यह सब तो रोज का और बारहमासी खेल था। लेकिन जैसे ही क्रिकेट का खेल रेडियो पर सुनायी देने लगा, हम रेडियो से चिपक जाते और जब बेट और बॉल से खेलने लायक हुए तो अपना मैदान तैयार कर लिया। एक टीम भी बना डाली जिसमें लड़के और लड़कियाँ सभी थे। बाकायदा पिच भी बनायी गयी और लोगों के घरों की खिड़की तक गेंद भी पहुंचायी गयी। हमारे घर के परिसर में ही मैदान था तो हमने बना डाला खेल का मैदान। वहाँ क्रिकेट भी होता, बेडमिंटन भी और रिंग भी। खाली जमीन धीरे-धीरे मुनाफे की ओर मुड़ गयी और वहाँ बसावट  होने लगी। शुरू में एक ही घर बसा, लेकिन ना वे खुश और ना हम खुश। राजी-नाराजी के  बाद भी खेल चलता रहा। तो क्रिकेट खूब खेला, स्कूल में नहीं था, नहीं तो वहाँ भी  हम ही होते। वहाँ खो-खो था तो हम थे। खेल के मैदान पर बालीबॉल खिलाड़ी की कमी पड़ी तो हम थे। दो-दो टूर्नामेंट में भी भाग लिया, स्कूल में भी और कॉलेज में भी।

हमने घर पर कोई भी खेल खेला  हो, उसमें लड़के और लड़कियां साथ ही रही। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी ऐसा हुआ हो कि हम हारते हों और लड़के जीतते हों। पता नहीं हमारे साथ कैसे फिसड्डी लड़के खेल खेलते थे! लेकिन कल महिला क्रिकेट देखते हुए लगा कि खेल में महिला और पुरुष कुछ नहीं होता। युद्ध भूमि पर भी नहीं  होता, बस हौंसले चाहिये। हमारे घर के पास ही जयपुर का प्रसिद्ध तीर्थ गलता जी है, हम बचपन से ही रोज वहाँ जाते रहे हैं। गलताजी के दरवाजे पर ही एक अखाड़ा बना हुआ था, पहलवान कुश्ती लड़ते थे और हमारे पिताजी हमें भी उतार देते थे। कबड्डी तो हमारा प्रिय खेल था, रेत के टीलों पर कबड्डी खेलने का आनन्द ही कुछ और था। पतंग तो सभी उड़ा लेते हैं लेकिन लड़कों की तरह पतंग लूटना भी खूब किया। खेल के लिये कभी पिताजी ने मना नहीं किया, ना कभी कहा कि यह लड़कों के लिये है और तुम्हारे लिये नहीं हैं। हमने यह अन्तर जाना ही नहीं। पहली बार टूर्नामेंट में जाने का अवसर मिला जब हम सातवीं में पढ़ते थे, दूसरे शहर जाना था, पता नहीं पिताजी का क्या उत्तर हो? लेकिन उन्होंने मना नहीं किया। कॉलेज में  भी  गये और वहाँ भी राजी-राजी आज्ञा मिली। क्रिकेट का बेट खरीदना हो या बेडमिंटन का रेकेट, पिताजी से पैसे मिल ही जाते थे, लेकिन कभी चूड़ी-बिन्दी के लिये पैसे नहीं मिले। हम हाथों में मेहंदी लगे हाथ, चूड़ी और बिन्दी से सजी लड़की को देखकर मुग्ध  हो जाते थे, सोचते थे कि काश हमें भी अवसर मिलता। लड़कों की तरह जीवन जीने के हिमायती रहे  हमारे  पिताजी तो हमें भी वहीं जीवन जीने का अवसर मिला। वे कहते थे कि स्वेटर बुनने में क्या रखा है? बाजार में खूब मिलेंगे, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार में नहीं मिलेगा। इसलिये कहते थे कि खेलो और पढ़ो। हमने खूब खेला, आज भी बेट देखते ही मन मचल उठता है कि एकाध हाथ तो जमा ही दें। फिर अपनी उम्र का तकाजा देखकर महिला बनने की ओर मुड़ने लगती हूँ। खेल नहीं सकते तो क्या, क्रिकेट और दूसरे खेल देख तो सकते ही हैं, खूब देखते हैं। हमने तो उस पल को भी बहुत गर्व के साथ जीया था जब एशियन गेम्स में भारत प्रथम स्थान पर रहा था। खेलो खूब खेलो, कभी मत सोचो की यह लड़कियों का खेल है या लड़कों का, सारे ही खेल सभी के हैं, बस पहल करो तो खेल तुम्हारा होगा। 

Friday, July 21, 2017

मैं इस बात से आहत हूँ

#हिन्दी_ब्लागिंग
#संजयसिन्हा की एक कहानी पर बात करते हैं। वे लिखते हैं कि मैंने एक बगीचा लगाया, पत्नी बांस के पौधों को  पास-पास रखने के लिये कहती है और बताती है कि पास रखने से पौधा सूखता नहीं। वे लिखते हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा भी होता है?  उनकी कहानियों में माँ प्रधान हैं, हमारे देश में माँ ही प्रधान है और संस्कृति के संरक्षण की जब बात आती है तो आज  भी स्त्री की तरफ ही देश देखता है। पौधों की नजदीकियों से लेकर इंसानों की नजदीकियों की सम्भाल हमारे देश में अधिक है। इसलिये जब लेखक अपने दायरे में सत्य को देखता है और सत्य को ही लिखता है तब उसकी कहानी अंधेरे में भी अपने देश और समाज का परिदृश्य खड़ा करती है। आजतक हम इन कहानियों के माध्यम से ही अपने समाज को समझ सके हैं। लेकिन जब कोई इस कहानी को चुराता है और समझदारी का श्रेय लेने के चक्कर में या पुरुषत्व के हावी होने पर स्त्री के स्थान पर पुरुष को बिठा देता है तब कहानी की आत्मा मर जाती है, देश और समाज की बात से  परे कहानी नकली लगती है। पत्नी जब कहती है कि पौधों को पास रखने से वे बढ़ते हैं तो यह समाज का सच उजागर करते हैं लेकिन जब पत्नी के स्थान पर लेखक स्वयं विराजमान हो जाता है तब कहानी, कहानी नहीं रहती। कहानी चोरी भी करते हो और देश के साथ खिलवाड़ भी, ऐसा नहीं चलेगा।
हम बौद्धिक सम्पदा की चोरी करते हैं, कीजिये आपका  हक है। क्योंकि यह विचार भी हम समाज से ही लेते हैं तो इन पर आपका भी  हक बन ही जाता है लेकिन कम से कम तारीफ का हक तो उसे दे दो जिसने इन विचारों को एक लड़ी में पिरोया है। अभी #संजयसिन्हा ने दर्द उकेरा था कि मेरी कहानियाँ चोरी होती हैं, सभी की हो रही हैं, खुलेआम हो रही हैं। आज भी उनकी एक कहानी को तोड़-मरोड़कर यहाँ परोसा गया, अपना बनाने के चक्कर में मूल भाव में  भी  परिवर्तन कर दिया गया, मन बहुत दुखी हुआ। आप किसी की कहानी उठा लें लेकिन उसके मूल भाव में तो  परिवर्तन ना करें और जब लोग आपकी सोच की तारीफ कर रहे हों तब शर्म खाकर सच लिख ही दें कि यह मेरी कहानी नहीं है।

हम फेसबुक और सोशल मिडिया पर बने रहने के लिए रोज चोरी कर रहे हैं, रचनाओं के मूल भाव को कचरा कर रहे हैं। आप सोच रहे हैं कि मैं बहुत अच्छा कर रहा हूँ  लेकिन आप समाज और देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आप कहानी के मर्म को बदल रहे हैं, स्त्री पात्र के स्थान पर पुरुष पात्र को और पुरुष के स्थान पर स्त्री को रखकर समाज और देश की संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप विदेश की कहानी को भारत के संदर्भ में बना देते हैं, आप देश से खिलवाड़ करते हैं। यह साहित्य ही तो हैं, जिसे पढ़कर हम अपने समाज और देश की मनस्थिति का पता लगाते हैं, लेकिन  हमने चोरी करने के चक्कर में सब गुड़-गोबर कर दिया है। हम एक सांसद को गाली देते हैं कि वह हमारे धर्म का अपमान करता है, उसे सजा मिलनी चाहिये लेकिन हम अपने आप में झांककर नहीं देखते कि  हम क्या कर रहे हैं? हमारा कसूर भी उससे कम नहीं है। आप चोरी करें मुझे आपत्ति नहीं है, क्योंकि यदि आप चोरी को जायज मानते हैं तो करें लेकिन रचना के मूल स्वरूप में बदलाव अक्षम्य अपराध  है। क्योंकि इससे लेखक आहत होता है, ऐसा नहीं है,  लेकिन देश और समाज आहत होता है, मैं इस बात से आहत हूँ।

Thursday, July 20, 2017

सील के ये थूथन

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक दृश्य देखा था, बीत गये न जाने कितने ही दिन लेकिन वह दृश्य आज भी मुझे कुछ लिखने को उकसाता है। मैं दिमाग को झटक देती हूँ लेकिन फिर वह सामने आकर बिराज जाता है। उस दृश्य के क्या मायने निकालूं समझ ही नहीं पाती। किसी भूल-भुलैय्या में ले जाए बिना अपनी बात सीधे रूप में ही कह देती हूँ – समुद्र किनारे एक समुद्री जीव का पूरा दल या हरम आराम कर रहा है। मोटा-ताजा मुखिया मस्ती में अलसाया सा पड़ा है। उसके चारों तरफ 100 के लगभग मादाएं भी अलसा रही हैं। केवल एक नर है, शेष मादा। मुखिया बूढ़ा हो चला है, मोटा-थुलथुल सा है, लेकिन उसी का साम्राज्य इस हरम पर है। तभी क्या देखती हूँ कि एक युवा मादाओं के बीच में जा पहुंचा, लेकिन किसी मादा की हिम्मत नहीं कि उसे अपना साथी बना ले। वह टोह लेता है लेकिन तभी मुखिया को पता लग जाता है और वह अपनी थूथन से उसे भगा देता है। टिप्पणीकर्ता बताता है कि यह सील है, जल और धरती दोनों पर रहती हैं, अनेक प्रकार की होती हैं। ये अपना समूह बनाकर रहती हैं, एक नर सील, ढेर सारी मादाओं को अपने हरम में रखता है और किसी अन्य नर सील की हिम्मत नहीं जो इस समूह की मादा को हाथ लगा ले। उसे मुखिया को हराना होगा तब जाकर वह मादाओं के इस हरम को हथिया सकेगा। ऐसी ही कहानी बन्दरों की भी है और अनेक प्राणियों की है।
देश में ऐसे कितने ही थुलथुले सील हैं, सभी के अपने समूह हैं। वह सील अपने दल के मुखिया हैं, वहाँ दूसरे का प्रवेश वर्जित है। कभी मुझे यह दृश्य बिहार की राजनीति में लालू के दर्शन करा देता है तो कभी उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती दिखायी देते हैं। सील नामक प्राणी के दल के रूप में हरम है लेकिन यहाँ सारा तबका मौजूद है। मुलायम नामक सील की थूथन पर तो लात मारकर युवा अखिलेश विराजमान हो गये लेकिन बिहार में युवा सील के अभी मूछे भी नहीं निकली थी कि उसे दूसरों ने ही पटकनी दे दी। दल में घमासान मच गया है, लेकिन स्थापित सील जस की तस है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक इन सीलों का साम्राज्य है, न जाने किस-किस रूप में ये विराजमान हैं। युवा पीढ़ी का संघर्ष जारी है, कुछ सफल हो जाते हैं और कुछ असफल। बन्दरों का झुण्ड भी मुझे दिखायी देने लगा है, कुछ युवा मासूम बन्दर गुमसुम बैठे हैं, उन्हें किसी मादा का सहचर्य नहीं मिलता, बस जिन्दगी निकल जाती है, यूं ही। थूथन को उठाए मठाधीश अपने साम्राज्य को देखता रहता है और निगरानी रखता है कि कोई युवा वहाँ अनाधिकृत प्रवेश ना कर जाए। बस मुझे चारों तरफ सील के ये थूथन ही थूथन दिखायी देते हैं

Wednesday, July 19, 2017

सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल iifa awards का प्रसारण  हो रहा था। उत्तर भारतीय शादी में और इस कार्यक्रम में कुछ अन्तर नहीं था। हमारे यहाँ की शादी कैसी होती है? शादी का मुख्य बिन्दु है पाणिग्रहण संस्कार। लेकिन यह सबसे अधिक गौण बन गया है, सारे नाच-कूद हो जाते हैं उसके बाद समय मिलने पर या चुपके से यह संस्कार  भी करा दिया जाता है। जितने भी फिल्मों के अवार्ड फंक्शन होते हैं, उनमें भी यही होता है। अवार्ड के लिये एक मिनट और हँसी-ठिठोली के लिये दस मिनट। शादी में सप्तपदी से अधिक महिला संगीत पर फोकस रहता है, यहाँ भी कलाकारों के नृत्य पर ध्यान लगा रहता है।
आप किसी भी शादी में मेहमान बनकर जाइए, बस वहाँ सब नाचते हुए ही मिलेंगे। सारा दिन नाच की प्रेक्टिस चलती है और मेहमान कौन आया और कौन गया किसी को नहीं पता। ब्यूटी-पार्लर भी प्रमुख विषय है, दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने की ललक तो आपके मन में रह ही जाती है, जब पूछो तब – वे पार्लर गए हैं। कल वहाँ भी ऐसा ही हुआ। अवार्ड देते-देते ध्यान आ गया कि ये जो हिरोइनें हैं, इतना सज-धज कर आयी हैं, इनकी ड्रेस की भी नुमाइश लगा ही दी जाए। बस एंकर के मन में आया और खेल शुरू, किसकी ड्रेस सुन्दर का खेल, खेल लिया गया।
अवार्ड फंक्शन में फिल्म के प्रमोशन भी होने लगे हैं, जिसकी भी नयी फिल्म आ रही है, वह स्टेज पर आता हैं और अपनी-अपनी तरह से प्रमोशन करता है। हमारे यहाँ शादियों में ऐसा खेल तो नहीं होता लेकिन नये जोड़े  बनने का खेल खूब होता है। लड़के-लड़की ने कब आँख मटक्का कर लिया पता ही नहीं  चलता या फिर माता-पिता ने कब किसके लड़के या लड़की को देखकर पसन्द कर लिया, यह हमेशा का खेल है।

इसलिये शादी केवल सप्तपदी नहीं है, बहुआयामी समारोह है, ऐसे ही अवार्ड फंक्शन केवल पुरस्कार देना नहीं है अपितु पूरा फिल्मी मनोरंजन है। कौन नया कलाकार छाने की कोशिश में है और कौन पुराना अब स्थापित होकर अपनी जगह बना चुका है, सारे ही खेल होते हैं। बस एक बात ध्यान  देने की है कि जो किसी विशेष समूह से जुड़ जाता है, वह शीघ्र  ही ऊँचाई छूने लगता है और जो नहीं जुड़ पाता वह शायद अंधेरे में खो जाता है। इसलिये कुछ लोग अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं। मेरी छतरी के नीचे आ जा का खेल चलता रहता है। कभी कपूर खानदान की छतरी विशाल थी अब कई छतरियाँ तन गयी हैं और ऐसे समारोह ही तय करते हैं कि किसकी छतरी में कितनी सुरक्षा है। जिसने इन छतरियों को पहचान लिया बस वह सुरक्षित हो जाता है। कल की एक बातचीत – तू अपने बाप के कारण है, वरूण धवन से कहा गया। वरूण ने पलटकर कहा कि सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है। तभी कर्ण जौहर ने स्वयं कह दिया कि मैं भी अपने  बाप की बदौलत हूँ। 

Tuesday, July 18, 2017

लड़ना क्या इतना आसान होता है?

#हिन्दी_ब्लागिंग

लड़ना क्या इतना आसान होता है? पिताजी जब डांटते थे तब बहुत देर तक भुनभुनाते रहते थे, दूसरों के कंधे का सहारा लेकर रो  भी लेते थे लेकिन हिम्मत नहीं होती थी कि पिताजी से झगड़ा कर लें या उनसे कुछ बोल दें। माँ भी कभी ऊंच-नीच बताती थी तो भी मन मानता नहीं था, माँ को जवाब भी दे देते थे लेकिन बात-बात में झगड़ा नहीं किया जा सकता था। ऐसा ही हाल भाइयों के साथ था। नाते-रिश्तेदार, परिचित सभी के साथ कुछ ना कुछ तो मतभेद हो ही जाता था लेकिन झगड़ें की जब नौबत आती थी तब हौंसले पस्त हो जाते थे। नौकरी में भी कभी-कभार झगड़ा कर लेते थे लेकिन रोज-मर्रा यह सम्भव नहीं होता था। बस एक जगह है जहाँ आप रोज झगड़ा करने के लिये स्वतंत्र हैं। रोज कहना भी ठीक नहीं, हर पल आपके पास यह सुविधा उपलब्ध है और दुनिया का हर व्यक्ति इस सुविधा का प्रयोग करता ही है। जिसके पास भी एक अदद पति है या पत्नी है, उसे भला कौन रोक सकता है, इस सुविधा का लाभ लेने से? गर्मी हो या सर्दी, भरी बरसात हो या खिलता हुआ वसन्त, झगड़े के  बहाने अपने आप निकल आते हैं। मजेदार बात यह है कि झगड़ा भी कर लो और दूसरे ही क्षण हँस भी दो। हौसला बनाने में यह रिश्ता बहुत काम आता है, जिसने इस  रिश्ते की कद्र नहीं की और अभी तक अकेला है, वह हमेशा डरा हुआ ही रहता है।

एक किस्सा याद अ गया। मेरी एक मित्र के घर मैं गयी थी. वहाँ तमाशा पूरी स्पीड से चल रहा था। सारा ही घर हँस-हँसकर लौटपोट हो रहा था। मेरी मित्र ने बताया कि अभी कुछ देर पहले हमारी पड़ोसन आयी और चूड़िया फोड़कर चले गयी। जबरदस्त गुस्से में थी, बस आज के बाद पति से सारे ही सम्बन्ध समाप्त। लेकिन यह क्या, अभी कुछ ही देर बीती होगी कि देखा सज-धज कर कहीं जाने की जुगाड़ में है। हमने पूछा कि क्या हुआ, कहाँ जा रही हो? हँसकर बोली की पति के साथ पिक्चर देखने जा रही  हूँ। अब कर लो बात। 

Monday, July 17, 2017

कश्मीर मोसुल की राह पर

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल इराक का शहर मोसुल एक चैनल पर दिखाया जा रहा था। इस्लामिक स्टेट का कब्जा अब खाली करवा लिया गया है। लोग वहाँ वापस आ रहे हैं, धरती को चूम रहे हैं। वहाँ के लगभग 10 लाख लोगों को वापस बसाया जाएगा। एक-एक घर खण्डहर में बदल चुका है, उसे वापस खड़ा करना कितना कठिन होगा? मोसुल की दशा देखकर कश्मीर दिखायी देता है, क्या इसके भाग्य में भी मोसुल जैसा विनाश लिखा है? जब मोसुल में इस्लामिक स्टेट घुसा था तो लोगों को एतराज नहीं हुआ होगा, शायद उनका स्वागत भी किया होगा। जेहाद धर्म का हिस्सा है और इसका स्वागत तो करना ही चाहिये। कश्मीर में भी आज यही हो रहा है, जेहाद के नाम पर इस्लामिक स्टेट अपने पैर पसार रही है और बची-खुची कश्मीरीयत उनका स्वागत कर रही है। कश्मीरी सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं और आतंकियों का फूलों से स्वागत कर रहे हैं। एक दिन यह जन्नत जहन्नुम में बदल जाएंगी तब समझ आएगा कि हमने क्या कर डाला है?
सीरीया कभी जीरे का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश था, आज नष्ट हो रहा है। हम भी कहेंगे कि केसर की घाटी केसर विहीन हो गयी है। कश्मीर के वाशिंदे तो जेहाद की अफीम चाटकर पत्थर फेंकने में मशगूल हैं लेकिन शेष देशवासी तो मोसुल को देख रहे हैं, उन्हें तो कश्मीर को बचाने के लिये आगे आना होगा। वहाँ की कश्मीरीयत तो कश्मीरी पंडितों के साथ ही पलायन कर गयी थी, अब जो शेष है केवल सम्प्रदाय विशेष है। यह सम्प्रदाय यदि जिहाद के रंग में रंग गया तो कश्मीर को मोसुल बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। अभी भी समय है, चेत जाओ। मोसुल के नागरिक अपने शहर लौट रहे हैं, धरती पर माथा रगड़ रहे हैं, उसे प्रणाम कर रहे हैं। कल तक कहते थे कि यह धरती हमारी माँ नहीं है, हम किसी देश को माँ का दर्जा नहीं दे सकते, आज मोसुल वासी धरती पर माथा रगड़ रहे हैं। यदि अपना देश है तो हम है, जिस दिन अपना देश छूटेगा, उस दिन हम उस चूहे की तरह हो जाएंगे जिसे उड़ती चील अपने पंजों में दबोच लेती है। कश्मीर पर संकट मंडरा रहा है, उसे समय रहते मोसुल बनने से रोकना होगा।