Saturday, October 14, 2017

अपनी बचा लूं और दूसरे की रीत दूँ

पहली बार अमेरिका 2007 में जाना हुआ था। केलिफोर्निया में रेड-वुड नामक पेड़ का घना जंगल है। हम मीलों-मील चलते रहे लेकिन जंगल का ओर-छोर नहीं मिला। इस जंगल में सैकड़ों साल पुराने रेड-वुड के पेड़ थे, इतना घना जंगल देखकर आनन्द आ रहा था। लेकिन एक बात मुझे हैरान कर रही थी और वो थी कि जंगल में कितने ही पेड़ गिरे पड़े थे लेकिन जो जहाँ गिर गया था, वहीं था, उन्हें वहाँ से हटाया नहीं गया था। पता लगा कि ये अपने जंगलों की लकड़ी काम नहीं लेते, दुनिया की लकड़ी का उपयोग करते हैं और अपनी बचाकर रखते हैं। जब दुनिया में कमी होगी तब खुद की काम लेंगे। बिल्कुल ऐसे ही जैसे बच्चे करते हैं, पहले माँ की चीज खाने के फेर में रहते हैं और जब वह समाप्त हो जाए तो अपनी निकालते हैं।
आज केलिफोर्निया के जंगलों में आग लगी है, हर साल ही लगती है लेकिन इस बार विकराल रूप है। अत्यधिक संचय स्वत: ही विनाश का कारण बनता है। प्रकृति हमेशा उथल-पुथल करती है, मेरा संचय स्थायी नहीं है। लबालब भरा कटोरा कभी भी छलक पड़ता है। सुन रहे हैं कि स्विटजरलेण्ड में हजारों किलो सोना गटर में बह रहा है। हमारे देश में अथाह सम्पत्ति खजाने के रूप में कहीं गड़ी है। या जिसके पास  भी है वह स्वत: ही नष्ट हो जाती है। जंगल प्रकृति का धन है लेकिन इसे भी संचित रखने पर नष्ट हो ही जाता है। प्रकृति सम्यक रूप में ही रहती है, ना ज्यादा और ना ही कम। वह अपने आप संतुलन बनाकर चलती है। इसलिये किसी कंजूस की तरह वस्तुओं का उपभोग करने पर वह बिना उपभोग के भी नष्ट हो ही जाती हैं तो संतुलन बनाते हुए उनका उपभोग अवश्य कर लेना चाहिये। पहले दुनिया की खत्म कर लूँ फिर मेरी का नम्बर लूंगा, यह प्रवृत्ति सफल नहीं है। संग्रह किसी भी चीज का उचित नहीं है।

अपनी बचाकर रख लूं और दूसरे की रीत दूँ, बस यही सोच घातक है। आज एशिया के जंगल तेजी से कट रहे हैं और अमेरिका के पड़े-पड़े जल रहे हैं। कितने लोग बेघर-बार हो रहे हैं और कितने ही मर रहे हैं, मेरा सोचना है कि यदि वहाँ के जंगलों में संतुलन बनाया जाए तो ऐसी आपदाएं कम होंगी। दुनिया के जंगल भी  बचेंगे और अमेरिका के जंगल भी आग की लपटों से शायद बच जाएं। अमेरिका की संचय की प्रवृत्ति घातक भी  हो सकती है, इस पर विचार जरूर करना चाहिये। वे सारी दुनिया के बुद्धिजीवियों को एकत्र करने में लगा है, शेष दुनिया में कमी और उनके यहाँ भरमार! कहीं ऐसा ना हो कि ये बुद्धिजीवि चाय के प्याले में तूफान ला दे। खैर, वे संचय करें, उनकी सोच लेकिन हमारे देश की सोच तो संचय के उलट अपरिग्रह है। हमारे देश में भी जो संचय करता है, वह कहीं ना कहीं लपेटे में आ ही जाता है और उसका खजाना कहीं ना कहीं डूब ही जाता है। लेकिन मुझे चिन्ता है केलिफोर्निया की, वहाँ के घने जंगलों की, वे इस तरह नष्ट नहीं होने चाहियें। 15 दिन बाद मुझे भी जाना है, तब तक यह आपदा समाप्त हो चुकी होगी। प्रकृति संतुलन बनाने में कामयाब रहेगी ही। 

Friday, October 13, 2017

पहले जुड़िये फिर बात कहिये

बोल झमूरे, खेल दिखाएगा? हाँ दिखाऊंगा। आज बन्दरियाँ को कहाँ- कहाँ घुमाया? बन्दरियाँ के लिये नये कपड़े लेने कहाँ गया था? क्या कहा, मॉल में! एकदम नये फैशन के कपड़े लाया हूँ। अरे मॉल में तो कपड़े बड़े महंगे मिलते हैं! तो क्या? मेरी बन्दरियां भी तो बेशकीमती है। तो मेहरबानों और कद्रदानों देखिये एक नायाब खेल। तैयार हैं आप लोग? आप भी महंगी चीज से मत घबराइए, अपनी घरवाली की कद्र करिये, वह भी आपकी कद्र करेगी। कुछ इसी प्रकार से शुरुआत होती है सड़क किनारे खेल की। जैसे ही तमाशा दिखाने वाले व्यक्ति की आवाज वातावरण में गूंजने लगती है, लोग भीड़ लगाना शुरू कर देते हैं। यदि कोई सीधे ही तमाशा दिखाना शुरू कर दे तो तमाशबीन कम ही जुट पाते हैं। ऐसे ही लिखना एक अलग बात है लेकिन उसे पाठक देना अलग बात है। मेरा तो यह अनुभव है कि किस रचना को पढ़ना है या नहीं, उसके पहले शब्द या वाक्य पर निर्भर करता है। पाठक का जुड़ाव सबसे आवश्यक बात है, पहले पाठक को जोड़िये और फिर अपनी बात कहिये। कड़वी से कड़वी बात भी चाशनी में लपेटकर गले उतारी जा सकती है। जब तक पाठक की उत्सुकता नहीं बढ़ेगी वह रचना को नहीं पढ़ेगा। इसलिये यदि आप लिखते हैं तो इस गुर को जरूर अपनाएं। मैंने भी फेसबुक से ही सीखा है कि पहले व्यक्ति को कनेक्ट करो और फिर अपनी बात कहो।

माँ हमें कहानी सुनाती थी, शुरुआत राजा-रानी, चिड़िया, बन्दर आदि से होती थी। हम माँ के पेट से चिपक जाते थे लेकिन कुछ ही देर में कहानी किसी शिक्षा में बदल जाती थी और हम अभी तक उस कहानी के माध्यम से उस शिक्षा को अपने अन्दर बसाये हुए हैं। पिताजी सीधे ही शिक्षा की बात करते थे और हम कहते थे कि रात-दिन उपदेश सुनकर दुखी हो गये हैं। माँ की कहानी बार-बार सुनते थे और पिताजी की बात से बचने का उपाय ढूंढते थे। पता नहीं कितनी कहानियां सुनी थी, याद भी नहीं लेकिन उनके अन्दर छिपी शिक्षा याद है। बस यही अन्तर है लिखने और पाठक बनाने में। उपदेश कोई नहीं सुनना चाहता लेकिन अनुभव के साथ उपदेश सारे ही सुन लिये जाते हैं इसलिये अपने सच्चे अनुभव बच्चों के सामने रखो, फिर देखों बच्चे आपकी बात सुनेंगे भी और हृदयंगम भी कर लेंगे। लेकिन सबसे पहले जुड़ाव जरूरी है। बस जुड़ाव बनाकर रखिये और देखिये आपकी बात क्या घर वाले और क्या बाहर वाले सभी सुनेंगे। फेसबुक पर भी नये-नये लोग जुटना शुरू हो जाएंगे।

Thursday, October 12, 2017

यही जीवन है, यही सफलता है और यही सुख है


मैं अपनी जिन्दगी की जाँच-परख करती रहती हूँ, कभी दूसरों की नजरों से देखती हूँ तो कभी अपनी नजरों से। आप भी आकलन करते ही होंगे कि क्या पाया और क्या खो दिया। मेरे सोचने का ढंग कुछ बेढंगा सा है, मैं सोचती हूँ कि भगवान ने सुख की एक सीमा दी है, अब मुझे निश्चित करना है कि सुख की परिधि में किसे मानूं या किसे नहीं मानूं। कुछ लोग मिठाई खाकर सुखी होते हैं तो कुछ चटपटा खाकर या मेरे जैसे लोग फल खाकर। जब मैं किसी इच्छित वस्तु को छोड़ती हूँ तो लगता है कि यह छोड़ना ही नवीन सुख को पाना है और मैं छोड़ने से अधिक पाने का सुख भोगने लगती हूँ। लेकिन दुनिया की नजर ऐसी नहीं है, वह आपका आकलन अलग तरह से करती है। आप सत्ता के कितना करीब हैं, वैभव आपके पास कितना है, दुनिया का यह आकलन है लेकिन मेरा आकलन बिल्कुल अलग है।
मैं जब अपने बारे में चिंतन करती हूँ तब देखती हूँ कि मेरी सफलता का पैमाना क्या है? सफलता का मतलब मेरे लिये है कि मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकूं। मेरे अन्दर जो कुछ है, उसे बाहर निकाल सकूं, मेरी वेदनाएं, मेरी आशाएं, मेरा विश्वास सभी कुछ बाहर आ पाए और मैं दुनिया के सामने स्वयं को उजागर कर सकूं। सत्ता के करीब या वैभव से परिपूर्ण होने पर असुरक्षा की दीवार से हम घिरे रहते हैं, कुछ भी अभिव्यक्त करने से पहले डरते हैं कि सत्ता से दूरी नहीं बन जाए या वैभव कम ना हो जाए लेकिन जब इन सबसे दूर हो जाते हैं तब बेधड़क स्वयं को अभिव्यक्त कर सकते हैं और मैं इसी अभिव्यक्ति को परम सुख मानती हूँ। मैं जब भी लोगों के चेहरों को देखती हूँ, मुझे डरे हुए, समझौता किया हुए, लाचार से चेहरे दिखायी देते हैं, दुनिया उन्हें सफल भी कहती है और उनका उदाहरण भी देती है। कम से कम मुझे तो कह ही देते है कि तुम क्या थे और वे क्या थे, आज वे क्या हैं और तुम क्या हो! मैं सफलता के इस मापदण्ड से आहत नहीं होती। मैं खुद के बनाए मापदण्डों को ही ध्यान में रखती हूँ और फिर विश्वास से भर जाती हूँ कि आज मैंने जो पाया है, वह शायद मेरी औकात से ज्यादा ही है। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मैं स्वयं को अभिव्यक्त करने का साहस जुटा पाऊंगी और हर पल संतोष मेरे अन्दर बिराजमान होगा।

कुछ लोग ताली बजाते हैं कि उन्होंने मुझे धक्का लगा दिया, वे सफल हो गये। लेकिन मुझे लगता है कि मुझे जीवन मिल गया, साधना के लिये समय मिल गया। अपने आपको कुरेदने का वक्त मिल गया। मैं जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तब घबरा जाती हूँ और पल भर में ही अपना ध्यान विगत से हटा लेती हूँ। कैसे दम घोंटू वातावरण में जीना था, अपना वजूद भुलाकर, कुछ पा लेना शायद सबसे बड़ा खोना है। मुझे खुली हवा में सांस लेना अब अच्छा लगने लगा है और पता भी चला है कि खुली हवा क्या होती है? लेकिन जो कल था वह भी अनुभव से परिपूर्ण था और आवश्यक था। आप की बुद्धि कितनी ही कुशाग्र हो या आपके अन्दर ज्ञान का भण्डार हो लेकिन बिना अनुभव के कुछ काम का नहीं है। इसलिये अनुभव से पूर्ण होकर, सबकुछ छोड़कर पाने का जो आनन्द है वह निराला है, अपने आपको तलाशते रहने का आनन्द अनूठा है, अपने को भली-भांती अभिव्यक्त करने का प्रयास अनोखा है। बस मेरे लिये यही जीवन है, यही सफलता है और यही सुख है।  

Wednesday, October 11, 2017

विदेश में जीवनसाथी और देश में पति

हम घर में दोनों पति-पत्नी रहते हैं, गाड़ी एक ही धुरी पर चलती है। दोनों ही एक-दूसरे को समझते हैं इसलिये कुछ नया नहीं होता है। लेकिन जैसे ही हमारे घर में कोई भी अतिथि आता है, हमारे स्वर बदल जाते हैं, हम खुद को अभिव्यक्त करने में जुट जाते हैं। आप सभी ने इस बात पर गौर किया होगा कि दूसरों के सामने हमारा व्यवहार बदल जाता है। हम निपुण  हैं सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित हो जाता है। महिला का सारा ध्यान इस बात  पर लग जाता है कि वह सिद्ध कर सके कि उसमें सलीका बहुत है, खाना बनाने से लेकर बाजार तक की गहरी पकड़ है और साथ ही पति को साधने की कला भी वह जानती है। इसके विपरीत पुरुष यह सिद्ध करने में लग जाता है कि उससे ज्यादा लापरवाह कोई नहीं और अभी भी वह स्वतंत्र है तथा पत्नी की  बात तो बिल्कुल भी नहीं मानता है। दोनों ही अपनी-अपनी अभिव्यक्ति में लग जाते हैं, कई बार घर का वातावरण खराब हो जाता है और कभी हास्यास्पद। हम बोलने से लेकर हर काम में खुद को अभिव्यक्त करते हैं, हमने कितना अभिव्यक्त किया यह चाहे खुद जान ना पाएं लेकिन सामने वाला तो पक्का जान जाता है।
जब अतिथि चले जाते हैं तो नया अध्याय शुरू  होता है, पत्नी गुर्राती है कि तुम हेकड़ी क्यों दिखा रहे थे? पति एकदम से हथियार डाल देता है कि गलती हो गयी। पति कहता है कि तुमने अतिथियों के सामने इतने पकवान बनाये, मेरे लिये तो नहीं बनाती  हो! पत्नी इठलाकर बोलती है कि आखिर उन्हें भी तो पता लगे कि मैं कितनी सुघड़  हूँ! याने दोनों में फिर सुलह हो जाती है। अतिथियों के सामने जहाँ सुलह रहनी चाहिये थी वहीं कलह रहती है और अकेले में कलह भी हो जाए तो मामला सुलझ जाता है, लेकिन तब सुलह रहती है। कारण बस यही है कि हम जमाने को दिखाना चाहते हैं कि हम क्या हैं। हम अपने जीवन को बेहतर करना नहीं चाहते बस दिखावा करते रहते हैं। हमारा अहम् फूट-फूटकर बाहर निकल जाता है, किसी दूसरे को देखकर। ना चाहते हुए भी कहीं ना कहीं खुद को  प्रकट करने की मानसिकता झलक ही पड़ती है। विकट स्थिति तो तब होती है जब अतिथि मायके या ससुराल के होते हैं, दोनों की ही अभिव्यक्ति परवान चढ़ने लगती है, दोनों ही सिद्ध करने लगते हैं कि मैं श्रेष्ठ हूँ।

इस अहम् का कोई अन्त नहीं है, यही कारण है कि आजकल लोग अकेला रहना पसन्द करने लगे हैं। जहाँ अकेले में पति, पत्नी के कामों में हाथ बंटाता है, वहीं दूसरों के सामने शेर बनकर रहना चाहता है, बस पत्नी इसी सीख को गाँठ बांध लेती है कि कभी साथ नहीं रहूंगी। जो लोग विदेश में रहते हैं, वे तो दोनों ही मिलकर काम करते हैं लेकिन देश में परम्परा नहीं है कि पति काम करे तो विदेश में जो जीवनसाथी था देश में आकर पति बन जाता है, बस पत्नी कहती है कि मैं देश नहीं आऊंगी। इसलिये यदि आप परिवार के साथ रहना चाहते हैं तो बात-बात में खुद को बॉस मानना छोड़ना होगा। दूसरों के सामने अभिव्यक्ति से पहले विचार कर लें कि मेरी अभिव्यक्ति क्या संदेश दे रही है? मैं ऐसा हूँ इससे अच्छा है कि बताएं कि हम ऐसे हैं। नहीं तो सभी यही कहते रहेंगे कि अकेले रहते हैं तभी घर में शान्ति रहती है और तब परिवार एवं अतिथि दूर होते जाते हैं। 

Monday, October 9, 2017

पति को पूजनीय बनाना या चौथ माता का व्रत करना?


कल घर में गहमागहमी थी, करवा चौथ जो थी। लेकिन करवा चौथ में नहीं मनाती, कारण यह नहीं है कि मैं प्रगतिशील हूँ इसलिये नहीं मनाती, लेकिन हमारे यहाँ रिवाज नहीं था तो नहीं मनाया, बस। जब विवाह हुआ था तो सास से पूछा कि करवा चौथ करनी है क्या? वे बोलीं कि अपने यहाँ रिवाज नहीं है, करना चाहो तो कर लो। अब रिवाज नहीं है तो मैं अनावश्यक किसी भी कर्मकाण्ड में क्यों उलझू और मैंने तत्काल छूट का लाभ ले लिया। लेकिन यह क्या, देखा वे करवा चौथ पर व्रत कर रही हैं! मैंने पूछा कि आप तो कर रही हैं फिर! उन्होंने बताया कि हम सारी ही चौथ करते हैं, इसलिये यह व्रत है, करवा चौथ नहीं है। धार्मिक पेचीदगी में उलझने की जगह, मिली छूट का लाभ लेना ही उचित समझा।
खैर, कल भतीजी और ननद दोनों ही आ गयी थी और उनका करवा चौथ अच्छे से हो जाए इसलिये सारे  ही जतन मैं कर रही थी। रात को पूजा भी पड़ोस में की गयी और कहानी भी सुनी। कहानी सुनते हुए और अपनी सास की  बात का अर्थ समझते हुए एक बात समझ में आयी कि करवा चौथ का व्रत, चौथ माता के लिये किया जाता है, माता तो एक ही है – पार्वती। बस अलग-अलग नाम से हम उनकी पूजा करते हैं। इस व्रत में पति की लम्बी आयु की बात और केवल पति के लिये ही इस व्रत को मान लेना मेरे गले नहीं उतरा। महिलाएं जितने भी व्रत करती हैं, सभी में सुहाग की लम्बी उम्र की  बात होती ही है, क्योंकि महिला का जीवन पति के साथ ही जुड़ा है, वरना उसे तो ना अच्छा खाने का हक है और ना ही अच्छा पहनने का। अब जो व्रत चौथ माता के लिये था, वह कब से पति के लिये हो गया, मुझे समझ नहीं आ रहा था।
हम बचपन से ही भाभियों को व्रत करते देखते थे, रात को चाँद देखकर, उसको अर्घ चढ़ाकर सभी अपना व्रत खोल लेती थी। पति तो वहाँ होता ही नहीं था। लेकिन आज पति को ही पूजनीय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पति के लिये या अपने सुहागन रहने के लिये यह व्रत है जो चौथ माता को पूजकर किया जाता है ना कि पति को परमेश्वर बनाने के लिये है। हमारे व्रतों को असल स्वरूप को हमें समझना होगा और उनका अर्थ सम्यक हो, इस बात का भी ध्यान रखना होगा। यह चौथ माता का व्रत है, उसे साल में एक बार पूजो चा हर चौथ पर पूजो, लेकिन व्रत माता का ही है। इसलिये पूजा के बाद बायणा देने की परम्परा है जो अपनी सास को दिया जाता है। महिला सुहागन रहने के लिये ही चोथमाता का व्रत करती है, साथ में पति को  भी माता को पूजना चाहिये कि मेरी गृहस्थी ठीक से चले। बस यह शुद्ध रूप से महिलाओं का व्रत  है, इसे पति को परमेश्वर बनाने की प्रक्रिया का अन्त होना चाहिये। 
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Sunday, October 1, 2017

बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं


मैंने कई बार न्यूसेंस वेल्यू के लिये लिखा है। आज फिर लिखती हूँ। यह जो राज ठाकरे है, उसका अस्तित्व किस पर टिका है? कहते हैं कि मुम्बई में वही शान से रह सकता है जिसकी न्यूसेंस वेल्यू हो। फिल्मों का डॉन यहीं रहता है। चम्बल के डाकू बीहड़ों में रहते हैं, इसलिये उनका आतंक या न्यूसेंस वेल्यू बीहड़ों से लगे गाँवों तक सीमित है लेकिन मुम्बई के डॉन की वेल्यू सभी जगह लगायी जाती है। राज ठाकरे भी उन में से ही एक हैं। उनकी सोशल वेल्यू तो लगभग जीरो है, इसकारण वे पूरी निष्ठा से न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने में लगे हैं। जैसै आपको हर सामाजिक मौके पर अपनी सोशल वेल्यू बढ़ानी होती है, वैसे ही राज ठाकरे जैसों के लिये अपनी न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने का मौका दुर्घटनाओं के समय मिलता है।
कहीं भगदड़ मचती है, शायद मुम्बई में रोज की ही मारामारी है, तो इन जैसों को अपनी वेल्यू बढ़ाने का अवसर समझ आता है। कारखाने में काम करते समय यदि किसी मजदूर की तबियत खराब हो जाए तो ऐसे लीडर दौड़कर मालिक का कॉलर पकड़ लेते हैं। बेचारा मालिक कुछ पैसा देकर अपनी जान छुड़ाता है। मजदूर को कुछ मिले या नहीं लेकिन उस लीडर की न्यूसेंस वेल्यू बढ़ जाती है और उसकी कमाई चल पड़ती है। मुम्बई में पुल नहीं टूटता है, भगदड़ है लेकिन राज ठाकरे दौड़ पड़ते हैं कि बुलेट ट्रेन नहीं आने दूंगा। मुझे चाहिये हफ्ता। आज ही अहमद नगर में एयर पोर्ट का उद्घाटन है, रोक देना चाहिये उसे भी। राज ठाकरे सरीखे लोगों को कसम खा लेनी चाहिये कि जब तक देश में ऐसी भगदड़ रहेंगी, वायुयान का प्रयोग नहीं करेंगे।
समाज को सभ्य बनाने की ओर कदम किसी का नहीं है, बस हर व्यक्ति लगा है अपनी दादागिरी छांटने में। मुम्बई के आंकड़े बताते हैं कि रोज ही न जाने कितने लोग ट्रेनों में लटकते हुये यात्रा करते हैं और मरते भी हैं। तो रोक दो सारे ही विकास की धारा। क्यों नहीं रोका जा रहा है मुम्बई में बड़ी कम्पनियों को आने से। जिन कम्पनियों के भी 10000 से ज्यादा कर्मचारी हैं, उन्हें अपनी टाउनशिप बनानी चाहिये। लेकिन रोकने की कवायद हो रही है बुलेट ट्रेन को। ऐसा लग रहा है जैसे बुलेट ट्रेन के कारण ही इनका वोट बैंक धड़ाम हो जाएगा! भाई राजनीति में हो तो राजनीति जैसी बात करो, गुण्डे-मवालियों जैसी बात तो मत करो, इससे ना न्यूसेंस वेल्यू बढ़ती है और आपकी सोशल वेल्यू तो पहले से ही जीरो  है, तो वह तो कैसे बढ़ेगी। भीड़ को रोको ना कि तीव्रता को। तुम्हारी लीडरी तीव्रता से ही परवान चढ़ेगी ना कि बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं से। 

Saturday, September 23, 2017

महिला की हँसी उसकी चूंदड़ जैसी

जब भी किसी महिला को खिलखिलाकर हँसते देखती हूँ तो मन करता है, बस उसे देखती ही रहूँ। बच्चे की पावन हँसी से भी ज्यादा आकर्षक लगती है मुझे किसी महिला की हँसी। क्योंकि बच्चा तो मासूम है, उसके पास दर्द नहीं है, वह अपनी स्वाभाविक हँसी हँसता ही है लेकिन महिला यदि हँसती हैं तो वह मेरे लिये स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर दृश्य होता है। फेसबुक पर कुछ महिलाएं अपनी हँसी डालती हैं. उनके जीवन को  भी मैंने जाना है और अब जब उनकी हँसी देखती हूँ तो लगता है कि जीवन सार्थक हो रहा है। कहाँ हँस पाती है महिला? पल दो पल यदि किसी प्रसंग पर  हँस लें तो कैसे उसे हँसना मान लेंगे?
बचपन में एक लड़की  हँस रही थी, माता-पिता ने टोक दिया, ज्यादा हँसों मत, लड़कियों के लिये हँसना ठीक नहीं है। बेचारी लड़की समझ ही नहीं पायी कि हँसने में क्या हानि है? आते-जाते जब सभी ने टोका तो उसकी हँसी कहीं छिप गयी। सोचा जब अपना घर बसाऊंगी तो जी भर कर हँसूंगी लेकिन किसी पराये घर को अपना कहने में हँसी फंसकर रह गयी। दूसरों को हँसाने का साधन जो बनना था उसे, तो भला वह वहाँ भी कैसे हँसती? वार त्योहार जैसे चूंदड़ पहनकर अपनी पुरानी साड़ी को छिपाती आयी हैं महिलाएं, वैसे ही कभी हँसी को ओढ़ने का मौका मिल जाता है उन्हें। जब त्योंहार गया तो चूंदड़ को समेटकर पेटी में  रख दिया बस।
बड़ा होने की बाट जोहती रही महिला, कब बेटा बड़ा हो और माँ का शासन चले तो जी भरकर हँसे। लेकिन तब तो  पल दो पल की हँसी भी दुबक कर बैठ गयी। दिखने को लगता है कि किसने रोकी है  हँसी? लेकिन महिला जानती है कि उसकी हँसी किसी पुरुष के अहम् को ठेस पहुँचाने का पाप कर देती है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाप यही है। कोई काले लिबास में कैद है तो कोई सफेद लिबास में कैद है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व कहीं है ही नहीं। हँसने पर आज्ञा-पत्र लेना होता है या किसी का साथ जरूरी होता है। महिलाएं इसलिये ही इतना रोती हैं कि उन्हें हँसने की आजादी नहीं है, वे रो-कर  ही  हँसने की कमी को पूरा करती हैं। इसलिये जब भी किसी महिला को रोते देखो तो समझ लेना कि यह हँसने की कमी पूरा कर रही है। मैं तो रोती भी नहीं हूँ बस किसी महिला को हँसते देख लेती हूँ तो मान लेती हूँ की मैं ही हँस रही हूँ।