Saturday, October 14, 2017

अपनी बचा लूं और दूसरे की रीत दूँ

पहली बार अमेरिका 2007 में जाना हुआ था। केलिफोर्निया में रेड-वुड नामक पेड़ का घना जंगल है। हम मीलों-मील चलते रहे लेकिन जंगल का ओर-छोर नहीं मिला। इस जंगल में सैकड़ों साल पुराने रेड-वुड के पेड़ थे, इतना घना जंगल देखकर आनन्द आ रहा था। लेकिन एक बात मुझे हैरान कर रही थी और वो थी कि जंगल में कितने ही पेड़ गिरे पड़े थे लेकिन जो जहाँ गिर गया था, वहीं था, उन्हें वहाँ से हटाया नहीं गया था। पता लगा कि ये अपने जंगलों की लकड़ी काम नहीं लेते, दुनिया की लकड़ी का उपयोग करते हैं और अपनी बचाकर रखते हैं। जब दुनिया में कमी होगी तब खुद की काम लेंगे। बिल्कुल ऐसे ही जैसे बच्चे करते हैं, पहले माँ की चीज खाने के फेर में रहते हैं और जब वह समाप्त हो जाए तो अपनी निकालते हैं।
आज केलिफोर्निया के जंगलों में आग लगी है, हर साल ही लगती है लेकिन इस बार विकराल रूप है। अत्यधिक संचय स्वत: ही विनाश का कारण बनता है। प्रकृति हमेशा उथल-पुथल करती है, मेरा संचय स्थायी नहीं है। लबालब भरा कटोरा कभी भी छलक पड़ता है। सुन रहे हैं कि स्विटजरलेण्ड में हजारों किलो सोना गटर में बह रहा है। हमारे देश में अथाह सम्पत्ति खजाने के रूप में कहीं गड़ी है। या जिसके पास  भी है वह स्वत: ही नष्ट हो जाती है। जंगल प्रकृति का धन है लेकिन इसे भी संचित रखने पर नष्ट हो ही जाता है। प्रकृति सम्यक रूप में ही रहती है, ना ज्यादा और ना ही कम। वह अपने आप संतुलन बनाकर चलती है। इसलिये किसी कंजूस की तरह वस्तुओं का उपभोग करने पर वह बिना उपभोग के भी नष्ट हो ही जाती हैं तो संतुलन बनाते हुए उनका उपभोग अवश्य कर लेना चाहिये। पहले दुनिया की खत्म कर लूँ फिर मेरी का नम्बर लूंगा, यह प्रवृत्ति सफल नहीं है। संग्रह किसी भी चीज का उचित नहीं है।

अपनी बचाकर रख लूं और दूसरे की रीत दूँ, बस यही सोच घातक है। आज एशिया के जंगल तेजी से कट रहे हैं और अमेरिका के पड़े-पड़े जल रहे हैं। कितने लोग बेघर-बार हो रहे हैं और कितने ही मर रहे हैं, मेरा सोचना है कि यदि वहाँ के जंगलों में संतुलन बनाया जाए तो ऐसी आपदाएं कम होंगी। दुनिया के जंगल भी  बचेंगे और अमेरिका के जंगल भी आग की लपटों से शायद बच जाएं। अमेरिका की संचय की प्रवृत्ति घातक भी  हो सकती है, इस पर विचार जरूर करना चाहिये। वे सारी दुनिया के बुद्धिजीवियों को एकत्र करने में लगा है, शेष दुनिया में कमी और उनके यहाँ भरमार! कहीं ऐसा ना हो कि ये बुद्धिजीवि चाय के प्याले में तूफान ला दे। खैर, वे संचय करें, उनकी सोच लेकिन हमारे देश की सोच तो संचय के उलट अपरिग्रह है। हमारे देश में भी जो संचय करता है, वह कहीं ना कहीं लपेटे में आ ही जाता है और उसका खजाना कहीं ना कहीं डूब ही जाता है। लेकिन मुझे चिन्ता है केलिफोर्निया की, वहाँ के घने जंगलों की, वे इस तरह नष्ट नहीं होने चाहियें। 15 दिन बाद मुझे भी जाना है, तब तक यह आपदा समाप्त हो चुकी होगी। प्रकृति संतुलन बनाने में कामयाब रहेगी ही। 

Friday, October 13, 2017

पहले जुड़िये फिर बात कहिये

बोल झमूरे, खेल दिखाएगा? हाँ दिखाऊंगा। आज बन्दरियाँ को कहाँ- कहाँ घुमाया? बन्दरियाँ के लिये नये कपड़े लेने कहाँ गया था? क्या कहा, मॉल में! एकदम नये फैशन के कपड़े लाया हूँ। अरे मॉल में तो कपड़े बड़े महंगे मिलते हैं! तो क्या? मेरी बन्दरियां भी तो बेशकीमती है। तो मेहरबानों और कद्रदानों देखिये एक नायाब खेल। तैयार हैं आप लोग? आप भी महंगी चीज से मत घबराइए, अपनी घरवाली की कद्र करिये, वह भी आपकी कद्र करेगी। कुछ इसी प्रकार से शुरुआत होती है सड़क किनारे खेल की। जैसे ही तमाशा दिखाने वाले व्यक्ति की आवाज वातावरण में गूंजने लगती है, लोग भीड़ लगाना शुरू कर देते हैं। यदि कोई सीधे ही तमाशा दिखाना शुरू कर दे तो तमाशबीन कम ही जुट पाते हैं। ऐसे ही लिखना एक अलग बात है लेकिन उसे पाठक देना अलग बात है। मेरा तो यह अनुभव है कि किस रचना को पढ़ना है या नहीं, उसके पहले शब्द या वाक्य पर निर्भर करता है। पाठक का जुड़ाव सबसे आवश्यक बात है, पहले पाठक को जोड़िये और फिर अपनी बात कहिये। कड़वी से कड़वी बात भी चाशनी में लपेटकर गले उतारी जा सकती है। जब तक पाठक की उत्सुकता नहीं बढ़ेगी वह रचना को नहीं पढ़ेगा। इसलिये यदि आप लिखते हैं तो इस गुर को जरूर अपनाएं। मैंने भी फेसबुक से ही सीखा है कि पहले व्यक्ति को कनेक्ट करो और फिर अपनी बात कहो।

माँ हमें कहानी सुनाती थी, शुरुआत राजा-रानी, चिड़िया, बन्दर आदि से होती थी। हम माँ के पेट से चिपक जाते थे लेकिन कुछ ही देर में कहानी किसी शिक्षा में बदल जाती थी और हम अभी तक उस कहानी के माध्यम से उस शिक्षा को अपने अन्दर बसाये हुए हैं। पिताजी सीधे ही शिक्षा की बात करते थे और हम कहते थे कि रात-दिन उपदेश सुनकर दुखी हो गये हैं। माँ की कहानी बार-बार सुनते थे और पिताजी की बात से बचने का उपाय ढूंढते थे। पता नहीं कितनी कहानियां सुनी थी, याद भी नहीं लेकिन उनके अन्दर छिपी शिक्षा याद है। बस यही अन्तर है लिखने और पाठक बनाने में। उपदेश कोई नहीं सुनना चाहता लेकिन अनुभव के साथ उपदेश सारे ही सुन लिये जाते हैं इसलिये अपने सच्चे अनुभव बच्चों के सामने रखो, फिर देखों बच्चे आपकी बात सुनेंगे भी और हृदयंगम भी कर लेंगे। लेकिन सबसे पहले जुड़ाव जरूरी है। बस जुड़ाव बनाकर रखिये और देखिये आपकी बात क्या घर वाले और क्या बाहर वाले सभी सुनेंगे। फेसबुक पर भी नये-नये लोग जुटना शुरू हो जाएंगे।

Thursday, October 12, 2017

यही जीवन है, यही सफलता है और यही सुख है


मैं अपनी जिन्दगी की जाँच-परख करती रहती हूँ, कभी दूसरों की नजरों से देखती हूँ तो कभी अपनी नजरों से। आप भी आकलन करते ही होंगे कि क्या पाया और क्या खो दिया। मेरे सोचने का ढंग कुछ बेढंगा सा है, मैं सोचती हूँ कि भगवान ने सुख की एक सीमा दी है, अब मुझे निश्चित करना है कि सुख की परिधि में किसे मानूं या किसे नहीं मानूं। कुछ लोग मिठाई खाकर सुखी होते हैं तो कुछ चटपटा खाकर या मेरे जैसे लोग फल खाकर। जब मैं किसी इच्छित वस्तु को छोड़ती हूँ तो लगता है कि यह छोड़ना ही नवीन सुख को पाना है और मैं छोड़ने से अधिक पाने का सुख भोगने लगती हूँ। लेकिन दुनिया की नजर ऐसी नहीं है, वह आपका आकलन अलग तरह से करती है। आप सत्ता के कितना करीब हैं, वैभव आपके पास कितना है, दुनिया का यह आकलन है लेकिन मेरा आकलन बिल्कुल अलग है।
मैं जब अपने बारे में चिंतन करती हूँ तब देखती हूँ कि मेरी सफलता का पैमाना क्या है? सफलता का मतलब मेरे लिये है कि मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकूं। मेरे अन्दर जो कुछ है, उसे बाहर निकाल सकूं, मेरी वेदनाएं, मेरी आशाएं, मेरा विश्वास सभी कुछ बाहर आ पाए और मैं दुनिया के सामने स्वयं को उजागर कर सकूं। सत्ता के करीब या वैभव से परिपूर्ण होने पर असुरक्षा की दीवार से हम घिरे रहते हैं, कुछ भी अभिव्यक्त करने से पहले डरते हैं कि सत्ता से दूरी नहीं बन जाए या वैभव कम ना हो जाए लेकिन जब इन सबसे दूर हो जाते हैं तब बेधड़क स्वयं को अभिव्यक्त कर सकते हैं और मैं इसी अभिव्यक्ति को परम सुख मानती हूँ। मैं जब भी लोगों के चेहरों को देखती हूँ, मुझे डरे हुए, समझौता किया हुए, लाचार से चेहरे दिखायी देते हैं, दुनिया उन्हें सफल भी कहती है और उनका उदाहरण भी देती है। कम से कम मुझे तो कह ही देते है कि तुम क्या थे और वे क्या थे, आज वे क्या हैं और तुम क्या हो! मैं सफलता के इस मापदण्ड से आहत नहीं होती। मैं खुद के बनाए मापदण्डों को ही ध्यान में रखती हूँ और फिर विश्वास से भर जाती हूँ कि आज मैंने जो पाया है, वह शायद मेरी औकात से ज्यादा ही है। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मैं स्वयं को अभिव्यक्त करने का साहस जुटा पाऊंगी और हर पल संतोष मेरे अन्दर बिराजमान होगा।

कुछ लोग ताली बजाते हैं कि उन्होंने मुझे धक्का लगा दिया, वे सफल हो गये। लेकिन मुझे लगता है कि मुझे जीवन मिल गया, साधना के लिये समय मिल गया। अपने आपको कुरेदने का वक्त मिल गया। मैं जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तब घबरा जाती हूँ और पल भर में ही अपना ध्यान विगत से हटा लेती हूँ। कैसे दम घोंटू वातावरण में जीना था, अपना वजूद भुलाकर, कुछ पा लेना शायद सबसे बड़ा खोना है। मुझे खुली हवा में सांस लेना अब अच्छा लगने लगा है और पता भी चला है कि खुली हवा क्या होती है? लेकिन जो कल था वह भी अनुभव से परिपूर्ण था और आवश्यक था। आप की बुद्धि कितनी ही कुशाग्र हो या आपके अन्दर ज्ञान का भण्डार हो लेकिन बिना अनुभव के कुछ काम का नहीं है। इसलिये अनुभव से पूर्ण होकर, सबकुछ छोड़कर पाने का जो आनन्द है वह निराला है, अपने आपको तलाशते रहने का आनन्द अनूठा है, अपने को भली-भांती अभिव्यक्त करने का प्रयास अनोखा है। बस मेरे लिये यही जीवन है, यही सफलता है और यही सुख है।  

Wednesday, October 11, 2017

विदेश में जीवनसाथी और देश में पति

हम घर में दोनों पति-पत्नी रहते हैं, गाड़ी एक ही धुरी पर चलती है। दोनों ही एक-दूसरे को समझते हैं इसलिये कुछ नया नहीं होता है। लेकिन जैसे ही हमारे घर में कोई भी अतिथि आता है, हमारे स्वर बदल जाते हैं, हम खुद को अभिव्यक्त करने में जुट जाते हैं। आप सभी ने इस बात पर गौर किया होगा कि दूसरों के सामने हमारा व्यवहार बदल जाता है। हम निपुण  हैं सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित हो जाता है। महिला का सारा ध्यान इस बात  पर लग जाता है कि वह सिद्ध कर सके कि उसमें सलीका बहुत है, खाना बनाने से लेकर बाजार तक की गहरी पकड़ है और साथ ही पति को साधने की कला भी वह जानती है। इसके विपरीत पुरुष यह सिद्ध करने में लग जाता है कि उससे ज्यादा लापरवाह कोई नहीं और अभी भी वह स्वतंत्र है तथा पत्नी की  बात तो बिल्कुल भी नहीं मानता है। दोनों ही अपनी-अपनी अभिव्यक्ति में लग जाते हैं, कई बार घर का वातावरण खराब हो जाता है और कभी हास्यास्पद। हम बोलने से लेकर हर काम में खुद को अभिव्यक्त करते हैं, हमने कितना अभिव्यक्त किया यह चाहे खुद जान ना पाएं लेकिन सामने वाला तो पक्का जान जाता है।
जब अतिथि चले जाते हैं तो नया अध्याय शुरू  होता है, पत्नी गुर्राती है कि तुम हेकड़ी क्यों दिखा रहे थे? पति एकदम से हथियार डाल देता है कि गलती हो गयी। पति कहता है कि तुमने अतिथियों के सामने इतने पकवान बनाये, मेरे लिये तो नहीं बनाती  हो! पत्नी इठलाकर बोलती है कि आखिर उन्हें भी तो पता लगे कि मैं कितनी सुघड़  हूँ! याने दोनों में फिर सुलह हो जाती है। अतिथियों के सामने जहाँ सुलह रहनी चाहिये थी वहीं कलह रहती है और अकेले में कलह भी हो जाए तो मामला सुलझ जाता है, लेकिन तब सुलह रहती है। कारण बस यही है कि हम जमाने को दिखाना चाहते हैं कि हम क्या हैं। हम अपने जीवन को बेहतर करना नहीं चाहते बस दिखावा करते रहते हैं। हमारा अहम् फूट-फूटकर बाहर निकल जाता है, किसी दूसरे को देखकर। ना चाहते हुए भी कहीं ना कहीं खुद को  प्रकट करने की मानसिकता झलक ही पड़ती है। विकट स्थिति तो तब होती है जब अतिथि मायके या ससुराल के होते हैं, दोनों की ही अभिव्यक्ति परवान चढ़ने लगती है, दोनों ही सिद्ध करने लगते हैं कि मैं श्रेष्ठ हूँ।

इस अहम् का कोई अन्त नहीं है, यही कारण है कि आजकल लोग अकेला रहना पसन्द करने लगे हैं। जहाँ अकेले में पति, पत्नी के कामों में हाथ बंटाता है, वहीं दूसरों के सामने शेर बनकर रहना चाहता है, बस पत्नी इसी सीख को गाँठ बांध लेती है कि कभी साथ नहीं रहूंगी। जो लोग विदेश में रहते हैं, वे तो दोनों ही मिलकर काम करते हैं लेकिन देश में परम्परा नहीं है कि पति काम करे तो विदेश में जो जीवनसाथी था देश में आकर पति बन जाता है, बस पत्नी कहती है कि मैं देश नहीं आऊंगी। इसलिये यदि आप परिवार के साथ रहना चाहते हैं तो बात-बात में खुद को बॉस मानना छोड़ना होगा। दूसरों के सामने अभिव्यक्ति से पहले विचार कर लें कि मेरी अभिव्यक्ति क्या संदेश दे रही है? मैं ऐसा हूँ इससे अच्छा है कि बताएं कि हम ऐसे हैं। नहीं तो सभी यही कहते रहेंगे कि अकेले रहते हैं तभी घर में शान्ति रहती है और तब परिवार एवं अतिथि दूर होते जाते हैं। 

Monday, October 9, 2017

पति को पूजनीय बनाना या चौथ माता का व्रत करना?


कल घर में गहमागहमी थी, करवा चौथ जो थी। लेकिन करवा चौथ में नहीं मनाती, कारण यह नहीं है कि मैं प्रगतिशील हूँ इसलिये नहीं मनाती, लेकिन हमारे यहाँ रिवाज नहीं था तो नहीं मनाया, बस। जब विवाह हुआ था तो सास से पूछा कि करवा चौथ करनी है क्या? वे बोलीं कि अपने यहाँ रिवाज नहीं है, करना चाहो तो कर लो। अब रिवाज नहीं है तो मैं अनावश्यक किसी भी कर्मकाण्ड में क्यों उलझू और मैंने तत्काल छूट का लाभ ले लिया। लेकिन यह क्या, देखा वे करवा चौथ पर व्रत कर रही हैं! मैंने पूछा कि आप तो कर रही हैं फिर! उन्होंने बताया कि हम सारी ही चौथ करते हैं, इसलिये यह व्रत है, करवा चौथ नहीं है। धार्मिक पेचीदगी में उलझने की जगह, मिली छूट का लाभ लेना ही उचित समझा।
खैर, कल भतीजी और ननद दोनों ही आ गयी थी और उनका करवा चौथ अच्छे से हो जाए इसलिये सारे  ही जतन मैं कर रही थी। रात को पूजा भी पड़ोस में की गयी और कहानी भी सुनी। कहानी सुनते हुए और अपनी सास की  बात का अर्थ समझते हुए एक बात समझ में आयी कि करवा चौथ का व्रत, चौथ माता के लिये किया जाता है, माता तो एक ही है – पार्वती। बस अलग-अलग नाम से हम उनकी पूजा करते हैं। इस व्रत में पति की लम्बी आयु की बात और केवल पति के लिये ही इस व्रत को मान लेना मेरे गले नहीं उतरा। महिलाएं जितने भी व्रत करती हैं, सभी में सुहाग की लम्बी उम्र की  बात होती ही है, क्योंकि महिला का जीवन पति के साथ ही जुड़ा है, वरना उसे तो ना अच्छा खाने का हक है और ना ही अच्छा पहनने का। अब जो व्रत चौथ माता के लिये था, वह कब से पति के लिये हो गया, मुझे समझ नहीं आ रहा था।
हम बचपन से ही भाभियों को व्रत करते देखते थे, रात को चाँद देखकर, उसको अर्घ चढ़ाकर सभी अपना व्रत खोल लेती थी। पति तो वहाँ होता ही नहीं था। लेकिन आज पति को ही पूजनीय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पति के लिये या अपने सुहागन रहने के लिये यह व्रत है जो चौथ माता को पूजकर किया जाता है ना कि पति को परमेश्वर बनाने के लिये है। हमारे व्रतों को असल स्वरूप को हमें समझना होगा और उनका अर्थ सम्यक हो, इस बात का भी ध्यान रखना होगा। यह चौथ माता का व्रत है, उसे साल में एक बार पूजो चा हर चौथ पर पूजो, लेकिन व्रत माता का ही है। इसलिये पूजा के बाद बायणा देने की परम्परा है जो अपनी सास को दिया जाता है। महिला सुहागन रहने के लिये ही चोथमाता का व्रत करती है, साथ में पति को  भी माता को पूजना चाहिये कि मेरी गृहस्थी ठीक से चले। बस यह शुद्ध रूप से महिलाओं का व्रत  है, इसे पति को परमेश्वर बनाने की प्रक्रिया का अन्त होना चाहिये। 
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Sunday, October 1, 2017

बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं


मैंने कई बार न्यूसेंस वेल्यू के लिये लिखा है। आज फिर लिखती हूँ। यह जो राज ठाकरे है, उसका अस्तित्व किस पर टिका है? कहते हैं कि मुम्बई में वही शान से रह सकता है जिसकी न्यूसेंस वेल्यू हो। फिल्मों का डॉन यहीं रहता है। चम्बल के डाकू बीहड़ों में रहते हैं, इसलिये उनका आतंक या न्यूसेंस वेल्यू बीहड़ों से लगे गाँवों तक सीमित है लेकिन मुम्बई के डॉन की वेल्यू सभी जगह लगायी जाती है। राज ठाकरे भी उन में से ही एक हैं। उनकी सोशल वेल्यू तो लगभग जीरो है, इसकारण वे पूरी निष्ठा से न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने में लगे हैं। जैसै आपको हर सामाजिक मौके पर अपनी सोशल वेल्यू बढ़ानी होती है, वैसे ही राज ठाकरे जैसों के लिये अपनी न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने का मौका दुर्घटनाओं के समय मिलता है।
कहीं भगदड़ मचती है, शायद मुम्बई में रोज की ही मारामारी है, तो इन जैसों को अपनी वेल्यू बढ़ाने का अवसर समझ आता है। कारखाने में काम करते समय यदि किसी मजदूर की तबियत खराब हो जाए तो ऐसे लीडर दौड़कर मालिक का कॉलर पकड़ लेते हैं। बेचारा मालिक कुछ पैसा देकर अपनी जान छुड़ाता है। मजदूर को कुछ मिले या नहीं लेकिन उस लीडर की न्यूसेंस वेल्यू बढ़ जाती है और उसकी कमाई चल पड़ती है। मुम्बई में पुल नहीं टूटता है, भगदड़ है लेकिन राज ठाकरे दौड़ पड़ते हैं कि बुलेट ट्रेन नहीं आने दूंगा। मुझे चाहिये हफ्ता। आज ही अहमद नगर में एयर पोर्ट का उद्घाटन है, रोक देना चाहिये उसे भी। राज ठाकरे सरीखे लोगों को कसम खा लेनी चाहिये कि जब तक देश में ऐसी भगदड़ रहेंगी, वायुयान का प्रयोग नहीं करेंगे।
समाज को सभ्य बनाने की ओर कदम किसी का नहीं है, बस हर व्यक्ति लगा है अपनी दादागिरी छांटने में। मुम्बई के आंकड़े बताते हैं कि रोज ही न जाने कितने लोग ट्रेनों में लटकते हुये यात्रा करते हैं और मरते भी हैं। तो रोक दो सारे ही विकास की धारा। क्यों नहीं रोका जा रहा है मुम्बई में बड़ी कम्पनियों को आने से। जिन कम्पनियों के भी 10000 से ज्यादा कर्मचारी हैं, उन्हें अपनी टाउनशिप बनानी चाहिये। लेकिन रोकने की कवायद हो रही है बुलेट ट्रेन को। ऐसा लग रहा है जैसे बुलेट ट्रेन के कारण ही इनका वोट बैंक धड़ाम हो जाएगा! भाई राजनीति में हो तो राजनीति जैसी बात करो, गुण्डे-मवालियों जैसी बात तो मत करो, इससे ना न्यूसेंस वेल्यू बढ़ती है और आपकी सोशल वेल्यू तो पहले से ही जीरो  है, तो वह तो कैसे बढ़ेगी। भीड़ को रोको ना कि तीव्रता को। तुम्हारी लीडरी तीव्रता से ही परवान चढ़ेगी ना कि बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं से। 

Saturday, September 23, 2017

महिला की हँसी उसकी चूंदड़ जैसी

जब भी किसी महिला को खिलखिलाकर हँसते देखती हूँ तो मन करता है, बस उसे देखती ही रहूँ। बच्चे की पावन हँसी से भी ज्यादा आकर्षक लगती है मुझे किसी महिला की हँसी। क्योंकि बच्चा तो मासूम है, उसके पास दर्द नहीं है, वह अपनी स्वाभाविक हँसी हँसता ही है लेकिन महिला यदि हँसती हैं तो वह मेरे लिये स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर दृश्य होता है। फेसबुक पर कुछ महिलाएं अपनी हँसी डालती हैं. उनके जीवन को  भी मैंने जाना है और अब जब उनकी हँसी देखती हूँ तो लगता है कि जीवन सार्थक हो रहा है। कहाँ हँस पाती है महिला? पल दो पल यदि किसी प्रसंग पर  हँस लें तो कैसे उसे हँसना मान लेंगे?
बचपन में एक लड़की  हँस रही थी, माता-पिता ने टोक दिया, ज्यादा हँसों मत, लड़कियों के लिये हँसना ठीक नहीं है। बेचारी लड़की समझ ही नहीं पायी कि हँसने में क्या हानि है? आते-जाते जब सभी ने टोका तो उसकी हँसी कहीं छिप गयी। सोचा जब अपना घर बसाऊंगी तो जी भर कर हँसूंगी लेकिन किसी पराये घर को अपना कहने में हँसी फंसकर रह गयी। दूसरों को हँसाने का साधन जो बनना था उसे, तो भला वह वहाँ भी कैसे हँसती? वार त्योहार जैसे चूंदड़ पहनकर अपनी पुरानी साड़ी को छिपाती आयी हैं महिलाएं, वैसे ही कभी हँसी को ओढ़ने का मौका मिल जाता है उन्हें। जब त्योंहार गया तो चूंदड़ को समेटकर पेटी में  रख दिया बस।
बड़ा होने की बाट जोहती रही महिला, कब बेटा बड़ा हो और माँ का शासन चले तो जी भरकर हँसे। लेकिन तब तो  पल दो पल की हँसी भी दुबक कर बैठ गयी। दिखने को लगता है कि किसने रोकी है  हँसी? लेकिन महिला जानती है कि उसकी हँसी किसी पुरुष के अहम् को ठेस पहुँचाने का पाप कर देती है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाप यही है। कोई काले लिबास में कैद है तो कोई सफेद लिबास में कैद है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व कहीं है ही नहीं। हँसने पर आज्ञा-पत्र लेना होता है या किसी का साथ जरूरी होता है। महिलाएं इसलिये ही इतना रोती हैं कि उन्हें हँसने की आजादी नहीं है, वे रो-कर  ही  हँसने की कमी को पूरा करती हैं। इसलिये जब भी किसी महिला को रोते देखो तो समझ लेना कि यह हँसने की कमी पूरा कर रही है। मैं तो रोती भी नहीं हूँ बस किसी महिला को हँसते देख लेती हूँ तो मान लेती हूँ की मैं ही हँस रही हूँ।

Friday, September 22, 2017

झूठी शान से मुक्त होता पुरुष

कुछ लोग अलग मिट्टी से बने होते हैं, उनकी एक छोटी सी सोच उन्हें सबसे अलग बना देती है। कल केबीसी के सेट पर खिलाड़ी थी – अनुराधा,  लेकिन मैं आज बात अनुराधा की नहीं कर रही हूँ। मेरी बात का नायक है अनुराधा का पति – दिनेश। कुछ लोग जीवन में एक उद्देश्य लेकर आगे बढ़ते हैं, स्वयं को बीज की तरह धरती में रोप देते हैं। उनका सारा ध्यान इस बात पर होता है कि मेरे इस बीज के त्याग से श्रेष्ठ बीजों का निर्माण हो सके। दिनेश का बचपन अशिक्षा की रात के साथ  बीता, उसके दिल और दीमाग में एक ही बात घर कर गयी कि मेरी संतान आगे पढ़ेगी। लेकिन यह कैसे सम्भव होगा? बारह भाई-बहनों के गरीब परिवार में उम्मीद की किरण कहीं नहीं थी। शिक्षित युवती से विवाह का सपना तो सब कोई देख लेते हैं लेकिन उसके लिये खुद को होम देने की बात कितने कर पाते हैं? दिनेश ने पोलियों से ग्रस्त एक शिक्षित युवती – अनुराधा से विवाह किया और उसकी बैसाखी बन गया। अब अनुराधा पढ़ाई भी करती और नौकरी भी करती और घर सम्भालता दिनेश। रोटी बनाने से लेकर सारे ही काम दिनेश करता। धीरे-धीरे शिक्षिका अनुराधा डिप्टी-कलेक्टर बन गयी और कल केबीसी में हॉट-सीट  पर थी।

जो पुरुष पत्नी के प्रमोशन होने पर भी शराब के अड्डे पर गम गलत करता दिख जाता है, वहीं दिनेश पूरे घर को मनोयोग से सम्भाल रहा है। दोनों पैरों से अपाहिज लड़की से विवाह करना, फिर घर की जिम्मेदारी वहन करना साहस का काम है। अपाहिज होने के बाद भी अनुराधा का आत्मविश्वास देखने लायक था। अक्सर पतियों के सपनों को पूरा करने में पत्नी खुद को झौंक देती है, अपने सपने के बारे में रत्ती भर नहीं सोचती है और बदले में सुनती है कि तुम करती ही क्या हो? किसी के भी सपने किसी दूसरे के सपनों को जमींदोज करके ही पूरे होते हैं। किसी भी सफल व्यक्तित्व के पीछे उसके साथी का हाथ  होता है और हमारे देश में अक्सर यह हाथ महिला का होता है लेकिन कल दिनेश ने सिद्ध कर दिया कि पुरुष भी अपने झूठे अभिमान को त्याग दे तो एक सुखद जीवन और सुखी परिवार का निर्माता बन सकता है। ऐसे न जाने कितने दिनेश होंगे, बस उन्हें समाज जीवन में उदाहरण बनकर सामने आना है, तब झूठी शान से पुरुष मुक्त हो सकेगा और अपने अंकुरण से श्रेष्ठ संतान को जन्म देगा। 

Friday, September 15, 2017

ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा


हम बनिये-ब्राह्मण उस सुन्दर लड़की की तरह हैं जिसे हर घर अपनी दुल्हन बनाना चाहता है। पहले का जमाना याद कीजिए, सुन्दर राजकुमारियों के दरवाजे दो-दो बारातें खड़ी हो जाती थी और तलवार के जोर पर ही फैसला होता था कि कौन दुल्हन को ले जाएगा? तभी से तो तोरण मारने का रिवाज पैदा हुआ था। हिन्दू समाज में बणिये और ब्राह्मण की स्थिति आज ऐसी ही है। ये भी हमारे समाज के सुन्दर और समृद्ध चेहरे हैं, इन पर  ही आक्रान्ताओं की नजर सदैव से रहती है। युद्ध के बाद हमेशा ये ही लुटते हैं। इनके पास ही वैभव एकत्र है और इनके पास  ही सुन्दरता है और ये ही समाज की दुर्बल कड़ी भी है। इन पर सारी दुनिया की नजर रहती है। बस इन्हें अपने समाज में मिला लो, हमारा समाज समृद्ध हो जाएगा, यही सोच सभी की रहती है। आसान शिकार भी यही हैं, जब असम में लूट मचती है तो सेठों को ही लूटा जाता है। जितने भी युद्ध हुए हैं उसमें बणिये-ब्राह्मण  ही लुटे है। बाकी के पास तो लुटने के लिये था ही क्या और यदि था भी तो साथ में उनके पास तलवार भी थी अपनी रक्षा के लिये। युद्ध किसने लड़े? क्षत्रियों ने लड़े। सैनिक कौन बने? राजपूत, जाट, गुर्जर, आदिवासी आदि। युद्ध में कोई भी जीते या  हारे, लड़ते हमेशा क्षत्रीय थे लेकिन लुटते हमेशा ही बणिये-ब्राह्मण थे।
छठी शताब्दी में सिन्ध पर मोहम्मद बिन कासिम का आक्रमण हुआ, उसने किसका कत्लेआम किया? ब्राह्मणों का। एक-एक को चुन-चुनकर मारा, लाखों का कत्लेआम किया। आज जो सिन्धी दिखायी देते है ना, वे सब ब्राह्मण थे। सिकन्दर ने किसे लूटा? गजनी ने किसे लूटा? बाबर ने किसे लूटा? अकबर ने किसे लूटा? औरंगजेब ने किसे लूटा? विभाजन में कौन लुटा? कश्मीर में कौन लुटा? आज भी जब दंगे होते हैं तो कौन लुटता है? ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा। सदियों से यही हो रहा है। इतिहास में क्या दर्ज है? इतने मण जनेऊ जली और इतने दिन पुस्तकालय जले। इतने मण सोना-चाँदी लूटे गये और इतने मण हीरे-जवाहरात लूटे गये। राजवंश कटे-मरे लेकिन लूट बणिये-ब्राह्मणों की हुई।

इसलिये सुरक्षा के लिये विचार किसे करना चाहिये? आज सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने की जरूरत आन पड़ी है, सामाजिक सुरक्षा समाज का ही उत्तरदायित्व है। जिस समाज के पास हथियार की ताकत नहीं है, उन समाजों को दूसरों को अपनी ताकत बनाना होता है। हमें भी आज समाज के उन योद्धाओं को जो हमारी सुरक्षा में सक्षम  है, ताकतवर और सुविधा सम्पन्न बनाना होगा। उनसे आत्मीयता बढ़ानी होगा। समाज के बिखराव को दूर करना हमारा ही उत्तरदायित्व है, इसी में हमारा बचाव है। जो लोग हिन्दू समाज  पर घात लगाए बैठे हैं, वे इन जातियों के हमसे दूर करना चाहते हैं, जिससे हम एकदम कमजोर हो जाएं। पैसे और ज्ञान के बलबूते हम सुरक्षित नहीं  रह सकते, सुरक्षा के लिये योद्धा जातियों को अपने साथ रखना ही होगा। अब तय आप को करना है कि बणिये-ब्राह्मण इन जातियों से दूरी बनाकर रखे या अपना रक्षक मानते हुए इन्हे सम्मान दें। 

Monday, September 11, 2017

human values / nuisance values

#हिन्दी_ब्लागिंग
विवेकानन्द के पास क्या था? उनके पास थे मानवीय मूल्य। इन्हीं मानवीय मूल्यों ( human vallues) के आधार पर उन्होंने दुनिया को अपना बना लिया था। लेकिन एक होती है nuisance value (उपद्रव मूल्य) जो अपराधियों के पास होती है, उस काल में डाकुओं के पास उपद्रव मूल्य था। सत्ता के पास दोनों ही मूल्य होते हैं, वे कभी मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन करते हैं तो कभी उपद्रव मूल्य पर भी शासन करते हैं। अंग्रेजों ने यही किया था।  यदि आज के संदर्भ में देखे तो देश के प्रधानमंत्री मानवीय मूल्यों पर शासन कर रहे हैं और मीडिया के पास उपद्रव मूल्य या न्यूसेंस वेल्यू है। मीडिया अपनी इसी ताकत के बल पर किसी ने किसी उपद्रवकारी को पैदा करता रहता है और देश के विपक्षी-दल इन उपद्रवकारियों को हवा देते रहते हैं। कांग्रेस के इतिहास में इन न्यूसेंस कारकों का योगदान बहुत है, कभी-कभी तो लगता है कि उनका शासन न्यूसेंस वेल्यूज को सिद्धान्त पर ही चला। कभी भिण्डरावाला को पैदा कर दिया तो कभी 1984 में सिखों का कत्लेआम कर दिया। वर्तमान में राहुल गांधी हर उस जगह पहुंच जाते हैं जहाँ न्यूसेंस वेल्यू की उम्मीद हो। केजरीवाल ने तो अपना राजनैतिक केरियर इसी सिद्धान्त पर खड़ा किया था। लेकिन जब पंजाब में जीती हुई बाजी हार गये तब लगा कि केवल न्यूसेंस वेल्यू से काम नहीं चलता। कम से कम राजनीति में तो नहीं चलता, हाँ डाकू या आतंकी  बनना है तो खूब चलता है। और उस बन्दे ने सबक सीखा, चुप रहना सीखा। परिणाम भी मिला, दिल्ली में बवाना सीट जीत गये।

वर्तमान में मोदीजी पूर्णतया मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन कर रहे हैं लेकिन विपक्ष और अधिकांश मीडिया उपद्रव मूल्यों पर डटे हैं। ये सारे मिलकर देश में सनसनी तो फैला देते हैं लेकिन हासिल कुछ नहीं  होता। कुछ अतिवादी हिन्दू भी उपद्रव मूल्य हासिल करना चाहते हैं, जैसे शिवसेना ने किया है। अब गोवंश के नाम पर करने का प्रयास रहता है। दोनों मूल्य आमने-सामने खड़े है, जब उपद्रव मूल्य  हावी हो जाते हैं तब मारकाट मचती है, लेकिन तभी लोगों के अन्दर के मानवीय मूल्य जागृत होने लगते हैं और शान्ति स्थापित होती है। लेकिन यह भी सच है कि यदि केवल मानवीय मूल्य ही एकत्र हो जाएं और उपद्रव-मूल्य ना हो तो मनुष्य बचेगा भी नहीं, क्योंकि प्रकृति तो कहती है कि बलवान ही शेष रहेगा। इसलिये किसके पास कितना हो, यह हम सभी को निर्धारित करना होगा। समाज के  पास कितने मानवीय मूल्य और कितने उपद्रव-मूल्य हों तथा शासन के  पास कितने हो, यह बहुत ही समझदारी का विषय है। आज के संदर्भ में हमें इस बात पर गौर करना ही पड़ेगा। 

Tuesday, September 5, 2017

एक विपरीत बात

#हिन्दी_ब्लागिंग
मुझे आज तक समझ नहीं आया कि – a2 + b2 = 2ab इसका हमारे जीवन में क्या महत्व है? यह फार्मूला हमने रट लिया था, पता नहीं अब ठीक से लिखा गया भी है या नहीं। बीजगणित हमारे जागतिक संसार में कभी काम नहीं आयी। लेकिन खूब पढ़ी और मनोयोग से पढ़ी। ऐसी ही न जाने कितनी शिक्षा हमपर थोप दी गयी। हम रटते गये और पास  होते गये, बस। शिक्षा की आड़ में हमारा ज्ञान नष्ट होने लगा। रामायण, महाभारत या अनेक पौराणिक ग्रन्थ हमसे दूर हो गये और हम जीवन के व्यावहारिक ज्ञान से दूर हो गये। चरित्र निर्माण की पाठशाला होती है, ऐतिहासिक चरित्रों को पढ़ना। सदियों से हमारे पुरखों ने राम और कृष्ण जैसे चरित्रों को पढ़कर ही समाज का चरित्र निर्माण किया था। बचपन में हम सभी नाटकों का मंचन करते थे और उनके पात्र हमारे पौराणिक पात्र ही होते थे, हमें स्वाभाविक रूप से ज्ञान मिलता था और इसी ज्ञान के माध्यम से दुनिया को जानने की रुचि जागृत होती थी। जैसे ही  रुचि जागृत  हुई व्यक्ति स्वत: ही शिक्षित होने लगता था। फिर उसे रटने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन हम पर थोपी हुई शिक्षा हमारे ज्ञान को भी नष्ट कर देती है। हम एक विषय के जानकार अवश्य हो जाते हैं लेकिन शेष विषयों में ज्ञान शून्य रह जाते हैं।

मुझे याद नहीं की मैंने विधिवत शिक्षा का कब प्रारम्भ किया, बस कुछ दिन तीसरी कक्षा के याद हैं तो कुछ माह पांचवी कक्षा के। छठी कक्षा से ही पढ़ाई प्रारम्भ हुई और जब तक ज्ञान  प्राप्ति की। मैं आज भी सफल व्यक्तियों के जीवन चरित्र को प्राथमिकता से पढ़ती हूँ। आप गाँव में जाइए, बच्चे बकरी के बच्चों के साथ खेलते मिल जाएंगे लेकिन स्कूल में दिखायी नहीं देंगे। उन्हें बोझ लगती है यह पढ़ाई। जैसे हमें समझ नहीं आ रहा कि बीज गणित का हमारे जीवन में क्या लाभ है, वैसे ही वे भी नहीं समझ पा रहे कि इस इतिहास-भूगोल का उनके जीवन में क्या लाभ है! यदि हम सात साल तक केवल पौराणिक कथानकों को ही मौखिक पढ़ाते रहें और उनका मंचन कराते रहें तो फिर बच्चों को शिक्षा की ललक जगेगी। शिक्षा उतनी ही होनी चाहिये जितनी हमें आवश्यक है, लेकिन ज्ञान की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। आज शिक्षक दिवस पर यदि हम ऐसे प्रयोग कर लें तो हमारे देश का स्वरूप बदल जाएगा। कोई भी बच्चा किताबों के तले दबकर आत्महत्या नहीं करेगा ना अपने दिमाग का संतुलन खोएगा। बहुत  हो चुका घिसापिटा प्रयोग, अब नवीन सोच की जरूरत है। देखे किस युग में हम नवीनता की पहल करेंगे?

Friday, September 1, 2017

बतंगड़ या समाधान

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हम अपने-अपने सांचों में कैद हैं, हमारी सोच भी एक सांचे में बन्द है, उस सांचे को हम तोड़कर बाहर ही नहीं आना चाहते। कितना ही नुकसान हो जाए लेकिन हमारी सोच में परिवर्तन नहीं होता, कभी हमें पता भी होता है कि हम गलत तर्क के साथ खड़े हैं तब भी हम वहीं खड़े होते हैं और उसके लिये भी कोई तर्क ढूंढ लेते हैं। भीष्म अपनी प्रतीज्ञा के साथ खड़े थे, सारा वंश नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए, कर्ण भी अपनी मित्रता के साथ खड़े थे, सब कुछ नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए। हम लेखक लोग जब कुछ लिखते हैं तो हम अपना बिम्ब बनाते हैं और उसी के अनुसार अपनी बात कहते हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं कि पाठक उस बिम्ब को समझ ले, बस वह और कुछ समझ लेता है। दोनों ही हैरान हैं कि क्या लिखा गया और क्या पढ़ा गया! ऐसे ही हर व्यक्ति की अपनी मानसिकता है, उसने स्वयं को अपने दायरे तक सामित कर लिया है। अधिकांश व्यक्ति भेड़चाल के होते हैं, जो चलन में आ गया, बस वे भी वहीं चल देते हैं और इसके विपरीत यदि कोई दूसरी बात कह दें तो उसे कदापि नहीं मानेंगे।
कल जोधपुर मेडीकल कॉलेज के समाचार आ रहे थे, एक पत्रकार समझ ही नहीं पा रही थी कि भला कोई भी डॉक्टर असभ्य भाषा का प्रयोग कैसे कर सकता है? उस जैसे करोड़ो लोग इसी सत्य के साथ जीते हैं कि डॉक्टर जैसे पेशे वाले लोग बड़े ही सलीके वाले होते हैं। वे ऑपरेशन थियेटर में, जहाँ मरीज का पेट चिरा हुआ हो, कैसे आपस में गाली-गलोज करते हुए लड़ सकते हैं? करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि एक संन्यासी कैसे व्यभिचार कर सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि जो भी मिडिया दिखा रहा है, भला वह झूठ कैसे हो सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि भला न्यायपालिका कैसे व्यक्ति का जाति और धर्म देखकर न्याय कर सकता है! इसलिये जब समाज में कोई घटना घटती है तब सभी लोग अपने-अपने तर्क गढ़ लेते हैं और हम जैसे लोग जो समग्रता में विचार करते हैं, जब किसी घटना पर दूसरी तरह से विचार कर लेते हैं तब बतंगड़ बन जाता है। कोई यह नहीं कहता कि यह भी एक विचार है, इस पक्ष पर भी विचार करना चाहिये लेकिन सभी अपनी बात पर अडिग रहते हैं और केवल एक पक्ष को सत्य बनाने में तुल जाते हैं।
हम अपनी बात पर अड़िग रहते हैं लेकिन समस्या का समाधान नहीं ढूंढते। मुझे हमेशा ही समाधान ढूंढना पसन्द है इसलिये दूसरे मार्ग की भी बात करती हूँ। लेकिन जैसे ही दूसरी बात की और जलजला आ जाता है। आज यदि हम समाधान के लिये जुट जाएं तो देश अधिक सुन्दर होगा। जोधपुर में हुए काण्ड में मीडिया अपनी मानसिकता दिखा रहा था जब कि सत्य और कुछ था। परिणाम क्या होगा, किसी पर कोई आरोप सिद्ध नहीं होंगे। जितने भी इस देश में बाबा हैं, हम उन पर भी अपने-अपने तरीके से अरोप मढ़ते हैं। समग्रता में विचार नहीं करते कि इस परिस्थिति में समाधान कैसे निकालें। बस एकबारगी तो हो-हल्ला खूब हो जाता है लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता है। हमें समाधान की ओर बढ़ना चाहिये ना कि अपनी मानसिकता को साथ खड़े रहना चाहिये। कम से कम मीडिया, बुद्धिजीवि, कानून आदि को समग्रता के साथ ही रहना चाहिये, जिसमें देश हित हो वही कार्य करना चाहिये।

Thursday, August 24, 2017

अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक प्रसंग जो कभी भूलता नहीं और बार-बार उदाहरण बनकर कलम की पकड़ में आ जाता है। मेरी मित्र #sushmakumawat ने कामकाजी महिलाओं की एक कार्यशाला की, उसमें मुझे आमंत्रित किया। कार्यशाला में 100 मुस्लिम महिलाएं थी। मुझे वहाँ कुछ बोलना था, मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं क्या विषय लूं जो इन्हें समझ आ जाये! फिर मैंने कहा कि आज हम केवल बातचीत करते हैं और आपके जो प्रश्न हो उनको हल करने का प्रयास करते हैं। दो प्रश्न आए – पहला – तलाक-तलाक-तलाक कब तक और दूसरा बुर्का कब तक। वहाँ 100 महिलाओं में हर उम्र की महिला थी, अधिकांश पीड़ित थीं, तलाकशुदा थीं। हम उनका दर्द जानने का प्रयास कर ही रहे थे कि नीचे शोर मचा। तब मुझे बताया गया कि किसी महिला के कमरे में मौलवी घुसकर जबरदस्ती कर रहा है और महिला चिल्ला रही है लेकिन बचाने की हिम्मत किसी में नहीं है। तब मैंने इस बात को कई बार दोहराया कि मुस्लिम समाज में अवश्य क्रांति आएगी और महिलाओं के द्वारा ही आएगी। आज पहले प्रश्न का समाधान आ गया है बस दूसरा उसके सहारे ही हल हो जाएगा।
साहित्यिक महिलाओं की एक विचार गोष्ठी किसी परिवार में आयोजित थी, वहाँ महिला अधिकारों की बात हो रही थी। मुस्लिम बहन कह रही थी कि हमें कोई अधिकार नहीं हैं, हमारे नाम मकान नहीं है, कोई सम्पत्ती नहीं है। ताज्जुब तब हुआ जब हिन्दू बहने भी उसी रो में बहती दिखीं। मैंने कहा कि हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है, मेरे नाम मकान है और पूरा घर मेरा है। मुस्लिमों की इस समस्या को हिन्दुओं की क्यों बनाते हो। महिला मुक्ति आंदोलन में यही स्थिति बनी। यूरोप में महिलाओं ने चर्च के खिलाफ मोर्चा खोला तो आग हमारे यहाँ भी लगी, जबकि भारत में ऐसा नहीं था। दोनों बातें सामने आयीं, एक ईसाई महिला पादरियों का शिकार हो रही थीं और दूसरा मुस्लिम महिला मौलवियों का शिकार बन रही थी। लेकिन लपेटे में हिन्दू समाज भी आ रहा था। हिन्दू समाज के सन्तों ने भी स्वयं को भगवान का दर्जा दिया और महिलाओं का शोषण करने का प्रयास प्रारम्भ किया। मुस्लिम समाज में भी जहाँ एक तरफ तीन तलाक का बोलबाला था तो हिन्दू समाज के पुरुष भी महिला को अपनी अनुगामिनी मानने लगे और सभी जगह अपना वर्चस्व स्थापित करने में लग गये।
इसलिये कल का दिन इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है जब स्त्रियों को आजादी मिली है। प्रत्यक्ष आजादी मुस्लिम महिला को मिली है लेकिन अप्रत्यक्ष आजादी सभी को मिली है। जो अपराध समाज में बढ़ता जा रहा था और उसके छींटे सारे समाजों पर पड़ रहे थे, उससे समाज और देश को मुक्ति मिली है। हलाला को नाम पर यौन उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ था जो हवस बनकर विस्तार ले रहा था। सारा महिला समाज असुरक्षित हो गया था, नन्हीं बच्चियां तक असुरक्षित हो गयी थीं। जब किसी एक वर्ग की तानाशाही समाप्त होती है तो बहुत सारे अपराध और जुल्म भी समाप्त होते हैं। यह विभेद बहुत पहले ही समाप्त हो जाता यदि शाहबानो के केस में राजीव गांधी महिलाओं के पक्ष में खड़े होते। आज मोदी जी का लाख-लाख धन्यवाद है कि वे महिलाओं के पक्ष में खड़े हुए और उन्हें न्याय मिलने के मार्ग में बाधक नहीं बने। हमारा उनको नमन। यह सृष्टि जितनी पुरुषों की है उतनी ही महिलाओं की है, किसी एक को इसे अपनी मन मर्जी से चलाने का हक नहीं है। अब महिला ने खड़ा होना सीख लिया है, वे अपने अधिकार लेकर ही रहेगी। धर्म के नाम पर महिलाएं कल यूरोप में पादरियों से मुक्त हुई थीं और आज भारत में मौलवियों से। अब महिला का स्वाभिमान लौटेगा और उसका यथोचित सम्मान समाज को देना ही पड़ेगा। जिन महिलाओं ने भी इस आंदोलन को लड़ा है उन्हें भी प्रणाम। इस आंदोलन से देश बदलेगा और सारे ही समीकरण बदलेंगे। अब वोट बैंक के लिये महिला का अधिकार नहीं छीना जाएगा। अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा।
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Saturday, August 19, 2017

हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है

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मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा  बना रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं ये पक्षी? मन में प्रश्न था। शायद ये कहीं दूर से आए हैं और इनने अपना ठिकाना कुछ दिनों के लिये यहाँ बसा लिया है। पहले तो इन पक्षियों को कभी यहाँ नहीं देखा, बस दो-चार साल से ही दिखायी पड़ रहे हैं। सफेद और काले पक्षी, बड़े-बड़े पंखों वाले पक्षी। उड़ते हैं तो आकाश नाप लेते हैं और जब जल में उतर जाते हैं तो किस तरह इठलाते हुए तैरते हैं। इनका उड़ना, इनका लहराकर पेड़ पर बैठना कितना आकर्षक है! मेरे रोज का क्रम हो गया है इन पक्षियों को देखने का। मन करता है कि यहाँ से नजर हटे ही ना। इन बड़े पक्षियों के साथ नन्हीं चिड़ियाओं की दुनिया भी यहाँ बसती है। सैकड़ों की तादाद में आती हैं और इन्हीं तीन-चार पेड़ों पर अपना ठिकाना बना लेती हैं। शाम पड़ते ही इनका काफिला फतेहसागर की ओर चल पड़ता है, चहचहाट पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती है। ये चिड़िया भी अपनी गौरैया नहीं है, कोई विदेशी नस्ल की ही दिखायी  देती हैं। रात होने को है और अब चिड़ियाएं धीरे से उड़कर पेड़ के नीचे के हिस्से में चले गयी हैं, वहाँ सुरक्षित जो हैं। ये पेड़ मानों इन पक्षियों की हवेली है जिसमें नीचे की मंजिल में नन्हीं चिड़िया रहती हैं और ऊपर बड़े पक्षी।
गर्मी के दिनों में नन्हीं चिड़ियाएं दिखायी नहीं दे रही थी, शायद वे भी ननिहाल गयी होंगी! लेकिन जैसे ही मौसम सुहावना हुआ, ये लौट आयी हैं। बड़े पक्षी अपने देश नहीं लौटे और इनने अपना पक्का ठिकाना यहाँ पर ही बना लिया है। तभी आकाश में हवाईजहाज गरजने लगता है, न जाने कितने पक्षी दूसरे देश में बसेरा ढूंढने निकल पड़े होंगे! मेरी इस खूबसूरत झील में दुनिया जहान के पक्षी आए हैं अपना सुकून ढूंढने, ये लौटकर नहीं जा रहे हैं और इस जहाज में लदकर न जाने कितने बाशिंदे दूसरे देश में सुकून ढूंढ रहे हैं। तभी लगता है कि जीवन रीतने लगा है, इस पेड़ पर बड़े पक्षी हैं तो नन्हें पक्षी भी है। ये आपस में बतियाते तो होंगे, सारा वातावरण तो गूंज रहा है इनकी बातों से। लेकिन मन खामोश है, न जाने कितने घर खामोश हैं और शहर खामोश हैं। इन घरों की बाते रीत गयी हैं, यहाँ कोई बतियाने नहीं आता। घरों के पक्षियों ने दूसरे देश में सुकून ढूंढ लिया है। बूढ़े होते माँ-बाप पूछ रहे हैं कि किस पेड़ पर जीवन मिलेगा? क्या हमें भी अपना बसेरा उजाड़ना पड़ेगा? क्या हमें भी सात समन्दर पार जाना पड़ेगा? ये पक्षी तो मेरे शहर में आ बसे हैं लेकिन शायद मुझे इनका साथ छोड़ना  पड़ेगा।

मनुष्य क्यों यायावर बन गया है, ये पक्षी शायद इन्हें यायावरी सिखा रहे हैं। अब मुझे क्रोध आने लगा है इन पर, तुम क्यों चले आये अपने देश से? तुमने ही तो सिखाया है मनुष्य को दूसरे देशों में बसना। तुम्हारा जीवन तो सरल  है लेकिन हमारा जीवन सरल नहीं है, तुम्हारें पास लोभ नहीं है, संग्रह नहीं है, तुम छोड़कर कुछ नहीं आते। लेकिन हमें तो जीवन का हिसाब करना होता है। किस-किस माँ को क्या-क्या जवाब दूं कि परिंदों सा जीवन नहीं हैं हमारा। परिंदे जब उड़ते हैं तो आजादी तलाशते हैं, वे किसी झील को अपना मुकाम बना लेते हैं, जहाँ जीवन में सब कुछ पाना हो जाता है। ये परिंदे भी सबकुछ अपने पीछे छोड़कर आए हैं, इनके पीछे कोई नहीं आया। सभी के पेड़ निर्धारित हैं, सभी की झीलें निर्धारित हैं। कोई इस देश की झील में बसेरा करता है तो कोई पराये देश की झील में बसेरा करता है। मनुष्य कब तक स्वयं को दूसरों से अलग मानता रहेगा? घुलना-मिलना ही होगा हमें इन पक्षियों के साथ। इनके जीवन की तरह अकेले रहकर  ही बनाना होगा अपना आशियाना। जब ये पक्षी अकेले ही जीवन जीते हैं तो हम क्यों नहीं! हमने घौंसला बनाया, परिंदों को पाला, लेकिन अब वे उड़ गये हैं। उन्हें उड़ने दो, अपना संसार बसा लेने दो। उनकी गर्मी-सर्दी उनकी है, हम किस-किस को अपनी छत देंगे? कब तक देंगे और कब तक देने की स्थिति में रहेंगे? वे भी हमें कब तक आश्वासन देंगे? यहाँ फतेहसागर की झील में कितने ही पक्षियों का बसेरा है, हम भी हमारे ही देश में इन परिन्दों की तरह बसे रहेंगे। पेड़ बन जाएंगे जहाँ पक्षी अपना बसेरा बना सके। इन जहाजों में जाने दो युवाओं को, उनको दूर देश की झील ने मोह लिया है लेकिन हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है। 

Wednesday, August 16, 2017

पहाड़ों के बीच बसा अलसीगढ़

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मनुष्य प्रकृति की गोद खोजता है, नन्हा शिशु भी माँ की गोद खोजता है। शिशु को माँ की गोद में जीवन मिलता है, उसे अमृत मिलता है और मिलती है सुरक्षा। बस इंसान भी इसी खोज में आजीवन जुटा रहता है। बचपन छूट जाता है लेकिन जहाँ जीवन मिले, जहाँ अमृत मिले और जहाँ सुरक्षा मिले, उस माँ समान गोद की तलाश जारी रखता है। प्रकृति की ऐसी गोद जब उसे मिलती है तो वह कह उठता है यह मेरी माँ ही तो है। कभी साहित्याकर की भाषा में जन्नत कह उठता है। मनुष्य कितनी ही भौतिक उन्नति कर ले लेकिन प्रकृति को आत्मसात करने की उसकी फितरत कभी नहीं जाती। वह कभी बर्फिली पहाड़ियों पर पहुंचता है तो अनायास ही कह देता है कि धरती पर यही जन्नत है, कभी मेरे जैसा व्यक्ति हरियाली से लदे पहाड़ों से मध्य जा पहुंचता है तो कह देता है कि अरे इसके अतिरिक्त जन्नत और क्या होगी? हमने तो धरती की इसी जन्नत को बार-बार देखा है, इसी में जीवन को खोजा है, इसी में अमृत ढूंढा है और इसी धरती को सुरक्षित माँ की गोद माना है। इसलिये इसे ही नमन करते हैं, इसी का वन्दन करते हैं।
कल निकल पड़े थे इसी जन्नत की ओर, उदयपुर के जनजाति गाँव की सैर पर। घर से मात्र 20 किमी की दूरी थी लेकिन वहाँ पहुंचने में 40 मिनट का समय लग गया। हमारी गाडी सर्पिली सड़कों पर गुजरती हुई पहाड़ियों को लांघ रही थी, कभी पहाड़ सामने ही आ खड़ा होता था तो कुछ दूर चलने पर ही रास्ता बना देता था। पहाड़ पेड़ों से और हरी घास से लदे थे, बीच-बीच में इनमें जीवन भी दिखायी दे जाता था। कहीं छोटी सी पहाड़ी थी तो उसमें एक झोपड़ी थी, बकरी थी और बच्चे थे। महिला और पुरुष खेतों सें दिखायी दे जाते थे। खेत भी तो पहाड़ी के तलहटी में ही छोटे आकार के थे। चारो तरफ मक्की की खेती लहलहा रही थी। कब 40 मिनट बीत गये, पता ही नहीं चला और गाँव अलसीगढ़ आ गया। हमारे एक मित्र का वहाँ छोटा सा ठिकाना था हमने वहीं अपना सामान रखा और अलसीगढ़ के डेम की ओर चलने को तैयार हो गए। हमारे ठिकाने की महिला चौकीदार से पूछा कि डेम कितनी दूर है, वह बोली पास ही है। हमने कहा फिर पैदल ही चलते हैं फिर युवाओं से पूछा तो बोले की नहीं चार किमी है, गाडी से जाइये, सीधी सड़क वहीं तक जा रही है। हम गाडी उठाकर चल पड़े। कुछ दूर जाकर पूछ लिया कि कहाँ है डेम? अरे वह तो पीछे छूट गया। अब वापस पीछे, कच्चे रास्ते में गाडियां उतार दी, लेकिन कुछ दूर चले थे कि पता लग गया कि गाडी ले जाना सम्भव नहीं है। वापस लौटे, फिर सड़क पर चलते रहे, पता लगा कि फिर काफी दूर निकल आये हैं। वापस लौटे और दूसरे रास्ते पर गाडी उतारी, लेकिन रास्ता फिर भी नहीं मिला। पानी दिख रहा है लेकिन पहाड़ को लांघने का रास्ता नहीं मिल रहा। फिर वापस, अब की बार जवान को साथ लिया और उसने रास्ता दिखाया। गाडियों को खड़ा करके पहाड़ों को लांघना था। पहाड़ के पीछे बांध का पानी था। पहले पहाड़ पर चढ़ना फिर उतरना, तब कहीं जाकर पानी को हाथ लगा सकते थे। हमें पानी में उतरने को भी मना कर दिया गया था, बताया था कि पानी गहरा है, खतरा मत मोल लेना।
चारों तरफ पहाड़े थे और पहाड़ों के बीच में पानी को रोक रखा था, नदी भी थी। कभी सोचो, दिन की चहल-पहल के बाद जब रात ढलती होगी तब प्रकृति क्या बात करती होगी? आकाश में चाँद और तारे झिलमिलाते होंगे और धरती पर पहाड़ों के मध्य बसा यह पानी कभी किसी मछली की छपाक के साथ खामोशी तोड़ता होगा। पहाड़ मद्धिम रोशनी में जगमगाते होंगे, हरी दूब पर शबनम की बूंदे जब तैरती होंगी तो हीरे जगमगाते होंगे! उस अलौकिक सौन्दर्य को पता नहीं किसने देखा होगा या यह सब हमारा ही है, कभी ध्यान नहीं दिया होगा! सुबह पंक्षियों की चहचहाट से होती होगी और खेतों में किसान जब अपने बैलों को ले जाते होंगे तो कैसा समा होगा! लेकिन इतना ही तो नहीं है गाँव! इसके आगे भी बहुत कुछ है, इस जन्नत में लोग रहते हैं लेकिन प्रकृति से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं। गाँव तक स्कूल जा पहुंचा लेकिन बच्चे पढ़ने के शौकीन नहीं, उनका मन लगता ही नहीं। शिक्षा को उन पर थोप दिया गया है। यदि शिक्षा से उन्हें मुक्त कर दिया जाए और जीवन को वहीं के साधनों से सम्पन्न बना दिया जाए तो शिक्षा को अपना लेंगे। थोपी हुई कोई चीज किसी को भी पसन्द नहीं आती, हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है, अपने तरीके से जीना चाहता है। हम क्यों उन्हें अपना सा बनाना चाहते हैं? उनकी कुटिया को स्वच्छ और सुन्दर बना दीजिये, ग्रामीण पर्यटन शुरू कर दीजिये, वे सम्पन्न हो जाएंगे और शिक्षा की ओर भी मुड़ जाएंगे। तरीके उनकी पहल के होने चाहिये फिर हमारा सुझाव होना चाहिये, ऐसा कर लिया तो वे अपनी तरह से आगे बढ़ेंगे और फिर हमें जा पकड़ेंगे। प्रकृति के पुत्रों को प्रकृति ही रास आती है और प्रकृति स्वतंत्र होती है। 

Tuesday, August 15, 2017

जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है

#हिन्दा_ब्लागिंग
आधा-आधा जीवन जीते हैं हम, आधे-आधे विकसित होते हैं हम और आधे-आधे व्यक्तित्व को लेकर जिन्दगी गुजारते हैं हम। खिलौने का एक हिस्सा एक घर में बनता है और दूसरा हिस्सा दूसरे घर में। दोनों को जोड़ते हैं, तो ही पूरा खिलौना बनता है। यदि दोनों हिस्सों में कोई भी त्रुटी रह जाए तो जुड़ना असम्भव हो जाता है। हम भी खिलौना बना दिये गए हैं, हमने भी अपनी संतान को खिलौने जैसे संस्कारित किया है। एक हिस्सा किसी घर में तो दूसरा हिस्सा किसी घर में संस्कारित होता है। शरीर सम्पूर्ण मिला है लेकिन हमने कार्य विभाजन करके उसे आधा ही विकसित होने दिया है। एक को शक्तिशाली तो दूसरे को कोमल, एक को अर्थतंत्र में प्रवीण तो दूसरे को गृहविज्ञान में निपुण बनाने में हम सभी जुट गये हैं। हम इसी सभ्यता को लेकर अभी तक संस्कारित हुए हैं। इसीकारण एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इन दो खिलौनों को जोड़ने के लिये एक सी परवरिश चाहिये, दोनों को एक दूसरे के पूरक के रूप में ही संस्कारित होने की जरूरत है। सारी बात का मूल यह है कि हम युगल रूप में संस्कारित होते हैं, हमारा जीवन एकाकी रूप में संस्कारित नहीं है। इसके विपरीत यदि अमेरिका, यूरोप आदि देशों का जीवन एकाकी रूप में संस्कारित होता है, वहाँ युगल रूप से संतान को संस्कारित करने का रिवाज नहीं है।
एक दादी माँ थीं, उनसे एक कहावत सुनी थी। जब कोई बेटा रोता था तो वे कहती थीं कि – बेटा तू क्यों रो रहा है? आने वाली आएगी, तेरे लिए रोटी पकाती जाएगी और रोती जाएगी। ऐसे ही जब बेटी रोती थी तो कहती थीं – बेटी तू क्यों रो रही है? आने वाला आएगा, कमाता जाएगा और रोता जाएगा। याने रोना दोनों को है। हँसने के लिये दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए। आज परिवार का मूल झगड़ा भी यही है, हम एक दूसरे पर निर्भर हो गये हैं। हमारी खुशी दूसरे पर है, आपकी पत्नी का यदि आपकी माँ से झगड़ा होता है तो आप उसका समाधान नहीं दे पाते क्योंकि आपके व्यक्तित्व में परिवार के समाधान का संस्कार ही नहीं है। पुरुष महिलाओं के झगड़े में क्यों पड़े, बस पुरुष को यही सिखाया गया है। वह घर की समस्या में उलझना भी चाहता है और समाधान भी उसके पास नहीं है। जो बाहरी दुनिया में सफल है, कलेक्टर है याने पूरे जिले का रखवाला है वह अपने घर को समाधान नहीं दे पाता और आत्महत्या कर लेता है। उधर महिला को जीवन से जूझने के लिये सबकुछ सिखाया जा रहा है, वह सक्षम होती जा रही है, स्वयं को पूर्ण विकसित करती जा रही है। अब वह कार्यविभाजन के सिद्धान्त को मानने के लिये तैयार नहीं है। वह पति पर निर्भर होने के बावजूद भी कार्य विभाजन के सिद्धान्त को पूरी तरह से नहीं मानती है और इस सिद्धान्त को तो कतई नहीं मानती कि सम्पूर्ण परिवार का बोझ उस पर हो। और यदि वह भी कामकाजी है तो फिर इस सिद्धान्त को मानना उसकी कतई मजबूरी नहीं है।
भारतीय समाज इसी उहापोह में जीवन जी रहा है, वह आज भी समझ नहीं पा रहा है कि हमें हमारी संतान को पूर्ण रूप से संस्कारित करना होगा, तेरा काम और मेरा काम करके दिये गये संस्कार किसी युग में चल गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आज के युग में भी चल जाएंगे। ना लड़की को निर्भर रहने के संस्कार दीजिये और ना लड़के को। दोनों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित कीजिये। आज के समय की यही आवश्यकता है। मुझे अपनी बुआ के घर की बात हमेशा अच्छी लगती थी, जब भी वहाँ जाती थी, बुआ को भी और भाभी को भी बराबर काम करते देखती थी। बुआ सभी के कपड़े धोती थी, यह नहीं की बहु के कपड़ अलग निकाल दें। मैंने उनके बीच में हमेशा प्रेम देखा। परिवार को चलाना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है, सभी को सारे काम के लिये तैयार कीजिये। जब लड़के घर में रोटी बनाते दिखायी देंगे तब कोई झगड़ा सर नहीं उठा पाएगा। फिर किसी कलेक्टर को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी। युग बदलता है तो सभ्यता में भी परिवर्तन होता है। हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये लेकिन परिवार में वहीं अटके हैं। परिवार में भी आगे बढ़िये, एक दूसरे पर निर्भर मत बनिए। यह निर्भरता ही आपको तोड़ रही है, कभी आशा साहनी मर रही है तो कभी सिंघानिया बेघर हो रहा है और कभी कलेक्टर आत्महत्या कर रहा है। अपनी परम्पराओं से चिपके नहीं, इन्हें बदलते रहें। रूकी हुई जिन्दगी सड़ने लगती हैं, जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है।

Wednesday, August 9, 2017

दिल इतना बड़ा कीजिये कि दुनिया समा जाये

#हिन्दी_ब्लागिंग

मन का दोगलापन देखिये, कभी मन कहता है कि अकेलापन चाहिये और कभी कहता है कि अकेलापन नहीं चाहिये। कभी कहता है कि अकेलापन तो चाहिये लेकिन केवल अपनी चाहत के साथ का अकेलापन चाहिये। हम अपनी पसन्द का साथ चाहते हैं, बस उसी के लिये सारी मारा-मारी करते हैं। दुनिया भरी पड़ी है लेकिन हम भरी दुनिया में अकेले रह जाते हैं। समारोह में जाते हैं और साथी का साथ छूट जाये तो कह देते हैं कि तुम मुझे अकेला छोड़कर चले गये। अरे कहाँ थे तुम अकेले! समारोह में इतने लोग तो थे! लेकिन बस जो अपना है, जो अपने दिल के करीब है या जो हमारा आत्मीय है, बस उसी का साथ चाहिये। बचपन में माँ अपनी होती है,  लोकिन यौवन आते ही मन संगी का साथ ढूंढने लगता है और माँ विस्मृत हो जाती है। माँ अपने पुत्र के बिना अकेलापन अनुभव करती है और पुत्र को यौन आकांक्षा की पूर्ति करने वाली संगी के साथ का अकेलापन चाहिये। अकेलापन दोनो को ही चाहिये, दोनो की ही शर्तें हैं। अपना इच्छित साथी दोनों को ही चाहिये। माँ दुखी है क्योंकि पुत्र अब उसके पास नहीं है लेकिन पुत्र सुखी है क्योंकि जीवन संगनी उसके साथ है। माँ कहती है कि पुत्र मैं अकेली हूँ और पुत्र कहता है कि मुझे अकेला छोड़ दो। ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में होता है। कभी कहानी बन जाती है और कभी बिना कहानी के ही जीवन बीत जाता है। मुम्बई की आशा साहनी की कहानी बन गयी। उसके अकेलेपन की घटना समाज के अस्तित्व की कहानी बन गयी।

मन के धागे आत्मीयता से बंधते हैं, प्रेम भी आत्मीय भाव से ही उपजता है। सम्बन्धों को आत्मीयता की अनुभूति हर पल करानी होती है, कभी त्याग भी करना पड़ता है तो कभी प्यार भी देना पड़ता है। आशा साहनी की कहानी में आत्मीयता के धागे उलझ गये थे। जब पुत्र को प्यार की जरूरत थी तो माँ ने त्याग नहीं किया और जब माँ को प्यार की जरूरत थी तो पुत्र की आत्मीयता दूर चले गयी थी। किसे दोष दें? यह मन का ही दोष है कि हम केवल मनचाहे से ही बंधना चाहते हैं। अपने रिश्तों को विस्तार नहीं देते। पत्नी की मृत्यु होने पर पति को दूसरी पत्नी का साथ चाहिये ही तो पति की मृत्यु होने पर पत्नी को भी दूसरा साथी चाहिये। हमें दूसरा साथी तो चाहिये लेकिन हम अपनी संतान के साथ के बारे में भूल जाते हैं। तब हमें संतान के रहते अकेलापन लगता है और अपनी संतान के अकेलेपन को भूल जाते हैं। अक्सर सौतले रिश्तों में प्रेम पनपता नहीं है। आशा साहनी के मामले में भी यही हुआ। आशा साहनी ने दूसरी शादी की और पुत्र का प्रेम दूसरे पिता के साथ नहीं पनपा। पुत्र अकेला हो गया और जब माँ दोबारा अकेली हुई तो पुत्र की आत्मीयता जागृत नहीं हुई। दोनो के सम्बन्धों में दूरी आ गयी। छटे-चौमासे बात होने लगी। माँ पुत्र के आलावा अकेलेपन को कहीं  बांट नहीं पायी और अकेलापन उसका काल  बन  गया। रिश्ते जब दुराव के रास्ते चल पड़ते हैं तब समय कितना निकल गया यह रिश्ते याद नहीं रखते। अनबोलापन पसर जाता है और रह जाता है अकेलापन। लेकिन हम सभी को अपने रिश्तों को विस्तार देना होगा, केवल खून के रिश्तों को जिद से नहीं बांध सकते और ना किसी अधिकार से बांधकर रखा जा सकता है। यह हम सब की विडम्बना है कि आज हम अकेले हैं लेकिन हम अकेले केवल संतान से है, बाकि रिश्ते तो हमारे साथ हैं। आत्मीयता का विस्तार करते रहिये, फिर सब अपने से लगेंगे। अपने मन को खोलना सीखिये, फिर देखिये कैसे दूसरे भी अपने ही बन जाते हैं। आशा साहनी की कहानी को मत दोहराइये, मत जिद करिये इच्छित के साथ की। बस दुनिया बहुत बड़ी है और अपना दिल भी इतना बड़ा कर लीजिये कि इसमे दुनिया समा जाये।

Sunday, August 6, 2017

तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है

#हिन्दी_ब्लागिंग

ओह! आज मित्रता दिवस है! मित्र याने मीत, अपने मन का गीत। मन रोज भर जाता है, उसे रीतना ही होता है,  लेकिन रीते कैसे? रीतने के लिये कोई मीत तो चाहिये। मन जहाँ अपने आप बिना संकोच रीत जाए वही तो मीत होता है। मन को अभिव्यक्त करने के लिये मीत का साथ चाहिये और जिसे यह साथ मिल जाए वह सबसे धनवान बन जाता है। पता नहीं किसे मीत मिला और किसे नहीं लेकिन मेरा मीत तो मेरी लेखनी बन गयी है। यह फेसबुक यह ब्लाग और यह वेबसाइट मेरे मीत बनकर मेरे साथ हर पल खड़े हैं। यह मुझे नकारते नहीं है, मैं जो चाहे वो लिख सकती हूँ, जैसे चाहे अपने मन की परते खोल सकती हूँ। इससे कुछ भी नहीं छिपा है। मन को अभिव्यक्त होने का मार्ग मिल गया है। इसलिये हमारा सबसे प्यारा मित्र यह सोशल मीडिया बन गया है। ना केवल यह मेरी सुनता है अपितु मुझे सम्भालकर भी रखता है, मेरी बातों को सहेजकर रखता है। इतना तो किसी ने नहीं सुना जितना यह सुन लेता है। इसलिये मित्रता दिवस पर आज इसी परम मित्र को अपनी बाहों में भर लेती हूँ। यह नहीं होता तो मेरा वजूद भी बिखर गया होता, इसी के सहारे मेरा स्वाभिमान जिन्दा है।
लेखक मन को अभिव्यक्त करता है, इसके सहारे समाज के मन को भी अभिव्यक्त कर देता है लेकिन सम्पादक आप पर पहरे बिठा देता है। लोग आपको मंच से धकेल देते हैं। दो ही बाते होती हैं आपके सामने या तो अपनी अभिव्यक्ति बन्द कर दो या फिर अपना स्वाभिमान बेच दो। किसी समूह का हिस्सा बनकर गुलामी का जीवन और दूसरों की इच्छित अभिव्यक्ति आपका नसीब बन जाता है। पुरस्कार भी मिल जाते हैं, प्रसिद्धि भी मिल जाती है लेकिन मन में जो द्वंद्व हैं वे प्रकट नहीं होते, स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। जीवन नकली बन जाता है। आपको कुछ पैर दिखायी देते रहते हैं, जिन्हें पूजना आपकी नियति बन जाती है। लेकिन की-बोर्ड पर जब अंगुली थिरकती है और मॉनीटर  पर शब्द दिखायी देने लगते हैं तब सारे की प्रतिबंध दूर हो जाते हैं। अपनी वेबसाइट  पर बिना ताले-कुंजी के अपनी सम्पत्ती को रखने का आनन्द ही कुछ और है। मेरे मित्र के घर से भी कुछ लोग सेंध लगा देते हैं लेकिन दूध है तो बिल्ली पीयेगी ही, बस यह सोचकर बिसरा देती हूँ।

लेकिन दुनिया में अपने मन की सुनने वाले और भी हैं। कल एक माँ से बात हो रही थी, मैंने पूछा कि कितने बच्चे हैं? वे बोली कि दो हैं, दोनों ही बेटे हैं। बिटिया नहीं है, इस बात से दुखी थीं। मैंने पूछा कि मन किसके साथ सांझा करती हो? वे बोली कि इसी बात का गम है। बताने लगी कि कल तक बेटी ना होने का गम नहीं था लेकिन अब जब बेटे बड़े हो गये हैं, घर सूना लग रहा है। मन बात करने को तरस रहा है। मन तो हमेशा ही अभिव्यक्त होना चाहता है। बचपन में भी चाहता था लेकिन माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी लेकिन बहन थी और शायद ऐसी कोई ही बात होगी जो अभिव्यक्त ना होती हो। वह मित्रता गहरी थी, मन से मन का जुड़ाव था। जहाँ भी छिपाव है वहाँ मित्रता दूर चले जाती है। अब बेटी है, मन को अभिव्यक्त करने के लिये। लेकिन जहाँ बहन नहीं है और बेटी नहीं है, उनसे पूछो कि मन को कहाँ हलका करते हो? शायद वे अभिव्यक्ति के मायने ही भूल  गये हैं। सच्ची मित्रता बस यहीं बसी है। आज इस फेसबुक को भी, यहाँ के मित्रों को भी और बहन को भी और प्यारी बिटिया को भी मित्रता दिवस  पर अपना सा प्रेम। तुम लड़ भी लोगे तो भी अभिव्यक्त ही हो जाओगे, तुम अपने से रहोगे तो भी अभिव्यक्त हो जाओगे. इसी मन की अभिव्यक्ति को तो मित्रता कहते हैं और तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है। 

Monday, July 31, 2017

तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

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बादल गरज रहे हैं, बरस रहे हैं। नदियां उफन रही हैं, सृष्टि की प्यास बुझा रही हैं। वृक्ष बीज दे रहे हैं और धरती उन्हें अंकुरित कर रही है। प्रकृति नवीन सृजन कर रही है। सृष्टि का गुबार शान्त हो गया है। कहीं-कहीं मनुष्य ने बाधा पहुंचाने का काम किया है, वहीं बादलों ने ताण्डव मचा दिया है, नदियों में  बाढ़ आ गयी है और जल अपने सहस्त्रों हाथों से बाधाओं को दूर करने में लगा है। कहीं मनुष्य की हठधर्मिता विनाश लिये खड़ी है तो कहीं  बादलों का रौद्र रूप हठधर्मिता को सबक सिखाने को तैयार खड़ा है। प्रकृति और पुरुष, नदियाँ और बादल सृष्टि का नवीन श्रृंगार करने को तत्पर हैं लेकिन धरती के एक प्राणी की मनमर्जी उन्हें मंजूर नहीं। वे अपने कार्य में किसी को बाधक नहीं बनने देंगे, जो भी उनका मार्ग रोकेगा, वे ताण्डव करेंगे और उनका रौद्र रूप मनुष्य को त्राही माम् त्राही माम् करने पर मजबूर करेगा। इन्हें विसंगति नहीं चाहिये, संतुलन चाहिये। प्रत्येक प्राणी में संतुलन, प्रत्येक जीवन में संतुलन, प्रत्येक तत्व में संतुलन। ये जो वर्षा ऋतु है, इसी संतुलन की ओर संकेत करती है। हमें बता देती है कि हमने कहाँ प्रकृति को बाधित किया है। उसके एक्स-रे में कुछ नहीं छिपा है, सारा चित्र सामने आ जाता है। बाधा को तोड़ने बादल बरस उठते हैं, कहीं-कहीं अति होने पर बादल फट भी जाते हैं लेकिन बाधा को इंगित कर ही देते हैं। वे अपनी सहयोगिनी नदियों को आह्वान करते हैं कि प्रबल वेग से बह जाओ और बाधाओं को दूर कर दो।

मनुष्य ने धरती को बाधित कर दिया है, उसकी स्वतंत्रता को छीन लिया है। चारों तरफ पहरे हैं, नदियों से कहा जा रहा है कि हम बताएंगे कि तुम्हें किस मार्ग से बहना है। समुद्र को भी कहा जा रहा है कि हम तुम्हारे सीने पर भी अपना साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। पहाड़ जो धरती के  रक्षक थे, उन्हें भी प्रहरी बनने से रोका जा रहा है, उन्हें नष्ट करके रक्षक की भूमिका से वंचित किया जा रहा है। रोज ही न जाने कितनी प्रजातियों को नष्ट किया जा रहा  है। मनुष्य अपने विलास के लिये सृष्टि को लील रहा है। इसलिये वर्षा ऋतु में मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष होता है। मनुष्य अपनी जिद पर अड़ा है, प्रकृति हर बार संदेश देती है लेकिन मनुष्य ठीट बन गया है। वह प्रकृति का सम्मान करना ही नहीं चाहता तो कब तक प्रकृति उसे क्षमा करती रहेगी? इस विशाल सृष्टि पर प्रकृति ने अनेक सम्भावनाएं प्रदत्त की हैं, मनुष्य सहित प्रत्येक जीवन को जीने की स्वतंत्रता दी है सब कुछ संतुलित है। संतुलन बिगाड़ने के उपक्रम में ही विनाश है। इसे रोकने लिये सुदृढ़ प्रशासन चाहिये। अनुशासन हमारे जीवन का आधार होना चाहिये। कम से कम हम अपने स्वार्थ के लिये धरती को बाधित करने का प्रयास ना करें, सृष्टि के संतुलन को  बिगाड़ने का कार्य ना करे। यदि हमनें स्वयं को अनुशासित कर लिया तो फिर ऋतु आने पर बादल नहीं फटेंगे, नदियाँ सैलाबी नहीं बनेंगी और तटबंध तोड़कर जल, प्रलय को नहीं न्योता दे बैठेगा। इस वर्षा ऋतु को आनन्दमयी बनाइये, धरती को पुष्पित और पल्लवित होने दीजिये। सावन जाने में है और भादवा आने में है, बस इस सुन्दर धरती को निहारिये और इससे पूछते रहिये कि बता तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

Saturday, July 29, 2017

देखी तेरी चतुराई

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कल राजस्थान के जोधपुर में एक हादसा होते-होते बचा। हवाई-जहाज से पक्षी टकराया, विमान लड़खड़ाया लेकिन पायलेट ने अपनी सूझ-बूझ से स्थिति को सम्भाल लिया। यह खबर है सभी के लिये लेकिन इस खबर के अन्दर जो खबर है, वह हमारा गौरव और विश्वास बढ़ाती है। महिला पायलेट ने जैसे ही पक्षी के टकराने पर हुआ विस्फोट सुना, उसने तत्क्षण जहाज को ऊपर उड़ा दिया और इंजन बन्द करके जहाज को उतार लिया। सभी यात्री सुरक्षित उतर गये। महिला पायलेट के नाम से मन थोड़ा तो घबराता था ही, क्योंकि रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है कि महिला में विश्वास और हौंसलों की कमी होती है। हम इस झूठ को प्रतिपल सुनते हैं और अब तो सोशल मीडिया ने सहूलियत भी कर दी है और रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है। सभी को रात-दिन सुनी जाने वाली बात पर  पक्का यकीन हो जाता है तो हमें भी यकीन हो गया था कि महिला में आत्मविश्वास, सूझ-बूझ कि कमी होती है लेकिन कल महिला पायलेट की सूझ-बूझ ने नया आत्मविश्वास जगा दिया।
कल ही क्रिकेट की महिला कप्तान मिताली राज सहित सम्पूर्ण टीम का साक्षात्कार जी न्यूज दिखा रहा था। एक पुराने प्रश्न के उत्तर पर सभी पत्रकार आश्चर्य चकित थे। सुधीर चौधरी ने फिर पूछा कि आपसे जब यह पूछा गया था कि क्रिकेट में आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? तब आपने उत्तर दिया कि क्या आपने कभी यही प्रश्न किसी पुरुष खिलाड़ी से किया है? इस उत्तर का कारण क्या था? तब मिताली राज का उत्तर दिल को खुश करने वाला था। मिताली ने कहा कि यह प्रश्न कहीं दूसरे समय किया जाता तो ठीक था लेकिन उस समय जब हम फाइनल खेलने की तैयारी कर रहे हों, तब ऐसा लगा कि हमारा खेल मायने नहीं रखता। मिताली के उत्तर के बहुत गहरे मायने थे। यह ऐसा ही प्रश्न था जैसे मोदीजी की अमेरिका यात्रा के समय एक पत्रकार ने लोगों से पूछा था कि क्या आप का क्रेज मोदीजी को लेकर शाहरूख खान जैसा है? लोगों ने पत्रकार को झिड़क दिया था। लोगों ने कहा कि आप मोदीजी की तुलना शाररूख से करना चाहते हैं? असल में पत्रकार की सोच में केवल ग्लेमर बसता है, वे इससे आगे दुनिया देख ही नहीं  पाते। यही कारण है कि वे मिताली से पूछ लेते हैं कि आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? यह प्रश्न किसी को भी दोयम दर्जा देने में सक्षम है और कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति दोयम दर्जा नहीं पसन्द करता है।

महिला और पुरुष दोनों में ही असीम शक्ति है, किसे अवसर कितने मिले और किसे कितने, बस इसी बात पर सब कुछ निर्भर करता है। जब हम महिला को दोयम दर्जा दे देते हैं तब कुछ महिलाएं तो हैं जो जिद पर आ जाती हैं कि हम दोयम नहीं हैं और वे ऐसे क्षेत्र चुनती हैं जो पुरुष क्षेत्र कहलाते हैं। महिला अपनी यात्रा में चल पड़ी हैं, वे हमारे समाज को बता रही हैं कि अब दोयम दर्जे के दिन लद गये। सभी जगहों से महिला की उपस्थिति की आवाज आ रही है। एक महिला जहाज के यात्रियों को बचा लेती है और न जाने कितनी महिलाएं आत्मविश्वास से भर जाती हैं? कितनों के हौंसले बुलन्द हो जाते हैं! हम जैसे लिख्खाड़ भी उमंग से भर जाते हैं कि हौंसले गाली देने में नहीं है, हौंसले तो मन के है। पुरुष गाली देकर अपने बुलन्द इरादों को बताता है, लोग कहते हैं कि जो जितना गाली देता है, वह उतना ही बहादुर  होता है। जबकि मेरी नजर में गाली देना अपनी बुजदिली छिपाने की निशानी है। हम जब विचलित होते हैं तो चिवन्गम खाकर अपनी परेशानी को छिपाते हैं, ऐसे ही गाली देकर भी अपनी बुजदिली को छिपाते हैं। महिला अपने हौंसलों से, सभ्यता के साथ प्रथम दर्जा पाने में सफल हो रही हैं, मन अब महिला पर विश्वास कायम करने लगा है।  मन खुशी से नाच उठता है और गाने लगता है – देखी तेरी चतुराई। 

Tuesday, July 25, 2017

गुटर गूं के अतिरिक्त नहीं है जीवन

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मसूरी में देखे थे देवदार के वृक्ष, लम्बे इतने की मानो आकाश को छूने की होड़ लगी हो और गहरे इतने की जमीन तलाशनी पड़े। पेड़ जहाँ उगते हैं, वे वहाँ तक सीमित नहीं रहते, आकाश-पाताल की तलाश करते ही रहते हैं। हम मनुष्य भी सारा जहाँ देखना चाहते हैं, सात समुद्र के पार तक सब कुछ देखना चाहते हैं। पहाड़ों के ऊपर जहाँ और भी है, उसे भी तलाशना चाहते हैं। मैं एक नन्हीं चिड़िया कैसे उड़ती है, उसे देखना चाहती हूँ, एक छोटी सी मछली विशाल समुद्र में कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है, उसे देखना चाहती हूँ। रेत के टीलों पर कैसे एक केक्टस में फूल खिलता है. उसे महसूस करना चाहती हूँ। मैं वो सब देखना और छूना  चाहती हूँ जो इस धरती पर प्रकृति की देन है। मनुष्य ने क्या बनाया है, यह देखना मेरी चाहत नहीं है। बस प्रकृति कैसी है, यही देखने की चाहना है। लेकिन क्या मन की चाह पूरी होती है? कभी समुद्र की एक बूंद से ही सातों समुद्र नापने का संतोष करना पड़ता है तो कभी एक बीज से ही सारे देवदार और सारे ही अरण्य देखने का सुख तलाश लेती हूँ।
कभी महसूस होता है कि हम जंजीरों से जकड़े हैं, बेड़ियां पड़ी हैं हमारे पैरों में। यायावर की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं लेकिन जीवन ऐसा नहीं करने देता। हम एक गृहस्थी बसा  लेते हैं और उस बसावट में ऐसी भूलभुलैय्या में फंस जाते हैं कि निकलने का मार्ग ही नहीं सूझता। प्रकृति हँसना सिखाती है लेकिन गृहस्थी रोने का पाठ बखूबी पढ़ा देती है। रोते-रोते जीवन कब प्रकृति से दूर चले गया पता ही नहीं चलता। बरसात में सारी गर्द झड़ जाती है, लेकिन समय मन पर ऐसी गर्द चढ़ा देता है कि कितना ही खुरचो, मन की उजास दिखायी ही नहीं देती। कैसी उजली सी है प्रकृति, लेकिन मन न जाने कहाँ खो गया है! उसे छूने का, उसे महसूस करने का मन ही नहीं  होता। हिरण अपनी जिन्दगी जी लेता है, वह कूदता है, फलांग लगाता है, मौर नाच लेता है, कोयल कुहूं-कुहूं बोल लेती है, चिड़िया भी मुंडेर पर आकर चींची कर लेती है, लेकिन मन न जाने किसे खोजता रहता है!

सारी प्रकृति जोड़ों से बंधी है, मोर तभी नाचता है जब उसे मोरनी के साथ होती है, चिड़िया की चींची भी साथी के बिना अधूरी है। प्रकृति कुछ भी नहीं है, बस जोड़ों की कहानी है। हँसना, फुदकना, चहचहाना सभी कुछ एक-दूसरे के लिये है।  लेकिन मनुष्य की बात जुदा है, वह हमेशा दिखाना चाहता है कि मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ, मेरी खुशी अकेले में भी सम्भव है। मैं अकेले में भी चहचहा सकता हूँ। लेकिन यह उसका भ्रम है। जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में भी जो एक-दूजे में खुशी ढूंढते हैं, वे ही खुश रहते हैं। जो खुद की ही खुशी ढूंढते हैं, वे खुश नहीं रह सकते। मनुष्य अकेला चल पड़ता है, उसे लगता है कि वह यायावर बनकर अकेला ही चल सकेगा लेकिन यदि वह भी कबूतर के जोड़े की तरह रहे या उन पक्षियों की तरह रहे जो अपने जोड़ो के साथ सात समुद्र पार करके भी भारत चले आते हैं और यहाँ नया जीवन बसाते हैं,  फिर उड़ जाते हैं। उदयपुर का फतेहसागर सफेद और काले पक्षियों का डेरा है, बड़े-बड़े पंख फैलाते ये पक्षी जीवन को अपने पास बुलाते हैं। हम मनुष्यों को जीवन क्या है, पाठ पढ़ाते रहते हैं। मैं रोज शाम को इनको देखने फतेहसागर चले जाती हूँ, लगता है कि यही जीवन है। यही यायावरी है, ये जब चाहे आकाश में उड़कर उसे नाप लेते हैं और जब चाहें पानी में तैरकर उसकी थाह ले लेते हैं। हम तो बस किनारे से देखने वाले लोग हैं, प्रकृति को आत्मसात नहीं कर पाते, बस दूर से ही देखते हैं और दूर से भी कहाँ देख पाते हैं? यहाँ कितने हैं जिनके जोड़े एक दूसरे के पूरक है? शायद कोई नहीं या शायद मुठ्ठीभर। कभी लगता  है कि मनुष्य ने कितने किले खड़े कर लिये लेकिन अपने साथी का  हाथ नहीं पकड़ पाया। मनुष्य ने पानी में भी दुनिया बसा ली लेकिन साथी का साथ नहीं रख पाया। बिना साथी सबकुछ बेकार है, यह प्रकृति है ही नहीं, यह तो विकृति है और इस विकृति को जीने के लिये मनुष्य कितना अहंकारी बन बैठा है? काश हम भी कबूतर के जोड़े के समान ही होते! गुटर गूं के अतिरिक्त कुछ नहीं है जीवन।

Monday, July 24, 2017

पहल करो – खेल तुम्हारा होगा

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आओ आज खेल की ही  बात करें। हम भी अजीब रहे हैं, अपने आप में। कुछ हमारा डिफेक्ट और कुछ हमारी परिस्थितियों का या भाग्य का। हम बस वही करते रहे जो दुनिया में अमूमन नहीं होता था। हमारा भाग्य भी हमें उसी ओर धकेलता रहा है। हमारी लड़की बने रहने की चाहत लम्बे समय तक चल ही नहीं पाती थी, आज पूरी कोशिश में लगी हूँ कि महिला होने के सारे सुख अपनी झोली में डाल लूँ। बचपन में सभी खेलते हैं, तो हम  भी खूब खेलते थे, उसमें नया कुछ नहीं था, बस नया इतना ही था कि गुड़िया की शादी कभी नहीं करायी, रसोई-रसोई का खेल कभी नहीं खेला। इसके उलट कंचे खेले, गिल्ली-डण्डा खेला। पहलदूज, रस्सीकूद, गुट्टे यह सब तो रोज का और बारहमासी खेल था। लेकिन जैसे ही क्रिकेट का खेल रेडियो पर सुनायी देने लगा, हम रेडियो से चिपक जाते और जब बेट और बॉल से खेलने लायक हुए तो अपना मैदान तैयार कर लिया। एक टीम भी बना डाली जिसमें लड़के और लड़कियाँ सभी थे। बाकायदा पिच भी बनायी गयी और लोगों के घरों की खिड़की तक गेंद भी पहुंचायी गयी। हमारे घर के परिसर में ही मैदान था तो हमने बना डाला खेल का मैदान। वहाँ क्रिकेट भी होता, बेडमिंटन भी और रिंग भी। खाली जमीन धीरे-धीरे मुनाफे की ओर मुड़ गयी और वहाँ बसावट  होने लगी। शुरू में एक ही घर बसा, लेकिन ना वे खुश और ना हम खुश। राजी-नाराजी के  बाद भी खेल चलता रहा। तो क्रिकेट खूब खेला, स्कूल में नहीं था, नहीं तो वहाँ भी  हम ही होते। वहाँ खो-खो था तो हम थे। खेल के मैदान पर बालीबॉल खिलाड़ी की कमी पड़ी तो हम थे। दो-दो टूर्नामेंट में भी भाग लिया, स्कूल में भी और कॉलेज में भी।

हमने घर पर कोई भी खेल खेला  हो, उसमें लड़के और लड़कियां साथ ही रही। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी ऐसा हुआ हो कि हम हारते हों और लड़के जीतते हों। पता नहीं हमारे साथ कैसे फिसड्डी लड़के खेल खेलते थे! लेकिन कल महिला क्रिकेट देखते हुए लगा कि खेल में महिला और पुरुष कुछ नहीं होता। युद्ध भूमि पर भी नहीं  होता, बस हौंसले चाहिये। हमारे घर के पास ही जयपुर का प्रसिद्ध तीर्थ गलता जी है, हम बचपन से ही रोज वहाँ जाते रहे हैं। गलताजी के दरवाजे पर ही एक अखाड़ा बना हुआ था, पहलवान कुश्ती लड़ते थे और हमारे पिताजी हमें भी उतार देते थे। कबड्डी तो हमारा प्रिय खेल था, रेत के टीलों पर कबड्डी खेलने का आनन्द ही कुछ और था। पतंग तो सभी उड़ा लेते हैं लेकिन लड़कों की तरह पतंग लूटना भी खूब किया। खेल के लिये कभी पिताजी ने मना नहीं किया, ना कभी कहा कि यह लड़कों के लिये है और तुम्हारे लिये नहीं हैं। हमने यह अन्तर जाना ही नहीं। पहली बार टूर्नामेंट में जाने का अवसर मिला जब हम सातवीं में पढ़ते थे, दूसरे शहर जाना था, पता नहीं पिताजी का क्या उत्तर हो? लेकिन उन्होंने मना नहीं किया। कॉलेज में  भी  गये और वहाँ भी राजी-राजी आज्ञा मिली। क्रिकेट का बेट खरीदना हो या बेडमिंटन का रेकेट, पिताजी से पैसे मिल ही जाते थे, लेकिन कभी चूड़ी-बिन्दी के लिये पैसे नहीं मिले। हम हाथों में मेहंदी लगे हाथ, चूड़ी और बिन्दी से सजी लड़की को देखकर मुग्ध  हो जाते थे, सोचते थे कि काश हमें भी अवसर मिलता। लड़कों की तरह जीवन जीने के हिमायती रहे  हमारे  पिताजी तो हमें भी वहीं जीवन जीने का अवसर मिला। वे कहते थे कि स्वेटर बुनने में क्या रखा है? बाजार में खूब मिलेंगे, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार में नहीं मिलेगा। इसलिये कहते थे कि खेलो और पढ़ो। हमने खूब खेला, आज भी बेट देखते ही मन मचल उठता है कि एकाध हाथ तो जमा ही दें। फिर अपनी उम्र का तकाजा देखकर महिला बनने की ओर मुड़ने लगती हूँ। खेल नहीं सकते तो क्या, क्रिकेट और दूसरे खेल देख तो सकते ही हैं, खूब देखते हैं। हमने तो उस पल को भी बहुत गर्व के साथ जीया था जब एशियन गेम्स में भारत प्रथम स्थान पर रहा था। खेलो खूब खेलो, कभी मत सोचो की यह लड़कियों का खेल है या लड़कों का, सारे ही खेल सभी के हैं, बस पहल करो तो खेल तुम्हारा होगा। 

Friday, July 21, 2017

मैं इस बात से आहत हूँ

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#संजयसिन्हा की एक कहानी पर बात करते हैं। वे लिखते हैं कि मैंने एक बगीचा लगाया, पत्नी बांस के पौधों को  पास-पास रखने के लिये कहती है और बताती है कि पास रखने से पौधा सूखता नहीं। वे लिखते हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा भी होता है?  उनकी कहानियों में माँ प्रधान हैं, हमारे देश में माँ ही प्रधान है और संस्कृति के संरक्षण की जब बात आती है तो आज  भी स्त्री की तरफ ही देश देखता है। पौधों की नजदीकियों से लेकर इंसानों की नजदीकियों की सम्भाल हमारे देश में अधिक है। इसलिये जब लेखक अपने दायरे में सत्य को देखता है और सत्य को ही लिखता है तब उसकी कहानी अंधेरे में भी अपने देश और समाज का परिदृश्य खड़ा करती है। आजतक हम इन कहानियों के माध्यम से ही अपने समाज को समझ सके हैं। लेकिन जब कोई इस कहानी को चुराता है और समझदारी का श्रेय लेने के चक्कर में या पुरुषत्व के हावी होने पर स्त्री के स्थान पर पुरुष को बिठा देता है तब कहानी की आत्मा मर जाती है, देश और समाज की बात से  परे कहानी नकली लगती है। पत्नी जब कहती है कि पौधों को पास रखने से वे बढ़ते हैं तो यह समाज का सच उजागर करते हैं लेकिन जब पत्नी के स्थान पर लेखक स्वयं विराजमान हो जाता है तब कहानी, कहानी नहीं रहती। कहानी चोरी भी करते हो और देश के साथ खिलवाड़ भी, ऐसा नहीं चलेगा।
हम बौद्धिक सम्पदा की चोरी करते हैं, कीजिये आपका  हक है। क्योंकि यह विचार भी हम समाज से ही लेते हैं तो इन पर आपका भी  हक बन ही जाता है लेकिन कम से कम तारीफ का हक तो उसे दे दो जिसने इन विचारों को एक लड़ी में पिरोया है। अभी #संजयसिन्हा ने दर्द उकेरा था कि मेरी कहानियाँ चोरी होती हैं, सभी की हो रही हैं, खुलेआम हो रही हैं। आज भी उनकी एक कहानी को तोड़-मरोड़कर यहाँ परोसा गया, अपना बनाने के चक्कर में मूल भाव में  भी  परिवर्तन कर दिया गया, मन बहुत दुखी हुआ। आप किसी की कहानी उठा लें लेकिन उसके मूल भाव में तो  परिवर्तन ना करें और जब लोग आपकी सोच की तारीफ कर रहे हों तब शर्म खाकर सच लिख ही दें कि यह मेरी कहानी नहीं है।

हम फेसबुक और सोशल मिडिया पर बने रहने के लिए रोज चोरी कर रहे हैं, रचनाओं के मूल भाव को कचरा कर रहे हैं। आप सोच रहे हैं कि मैं बहुत अच्छा कर रहा हूँ  लेकिन आप समाज और देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आप कहानी के मर्म को बदल रहे हैं, स्त्री पात्र के स्थान पर पुरुष पात्र को और पुरुष के स्थान पर स्त्री को रखकर समाज और देश की संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप विदेश की कहानी को भारत के संदर्भ में बना देते हैं, आप देश से खिलवाड़ करते हैं। यह साहित्य ही तो हैं, जिसे पढ़कर हम अपने समाज और देश की मनस्थिति का पता लगाते हैं, लेकिन  हमने चोरी करने के चक्कर में सब गुड़-गोबर कर दिया है। हम एक सांसद को गाली देते हैं कि वह हमारे धर्म का अपमान करता है, उसे सजा मिलनी चाहिये लेकिन हम अपने आप में झांककर नहीं देखते कि  हम क्या कर रहे हैं? हमारा कसूर भी उससे कम नहीं है। आप चोरी करें मुझे आपत्ति नहीं है, क्योंकि यदि आप चोरी को जायज मानते हैं तो करें लेकिन रचना के मूल स्वरूप में बदलाव अक्षम्य अपराध  है। क्योंकि इससे लेखक आहत होता है, ऐसा नहीं है,  लेकिन देश और समाज आहत होता है, मैं इस बात से आहत हूँ।

Thursday, July 20, 2017

सील के ये थूथन

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक दृश्य देखा था, बीत गये न जाने कितने ही दिन लेकिन वह दृश्य आज भी मुझे कुछ लिखने को उकसाता है। मैं दिमाग को झटक देती हूँ लेकिन फिर वह सामने आकर बिराज जाता है। उस दृश्य के क्या मायने निकालूं समझ ही नहीं पाती। किसी भूल-भुलैय्या में ले जाए बिना अपनी बात सीधे रूप में ही कह देती हूँ – समुद्र किनारे एक समुद्री जीव का पूरा दल या हरम आराम कर रहा है। मोटा-ताजा मुखिया मस्ती में अलसाया सा पड़ा है। उसके चारों तरफ 100 के लगभग मादाएं भी अलसा रही हैं। केवल एक नर है, शेष मादा। मुखिया बूढ़ा हो चला है, मोटा-थुलथुल सा है, लेकिन उसी का साम्राज्य इस हरम पर है। तभी क्या देखती हूँ कि एक युवा मादाओं के बीच में जा पहुंचा, लेकिन किसी मादा की हिम्मत नहीं कि उसे अपना साथी बना ले। वह टोह लेता है लेकिन तभी मुखिया को पता लग जाता है और वह अपनी थूथन से उसे भगा देता है। टिप्पणीकर्ता बताता है कि यह सील है, जल और धरती दोनों पर रहती हैं, अनेक प्रकार की होती हैं। ये अपना समूह बनाकर रहती हैं, एक नर सील, ढेर सारी मादाओं को अपने हरम में रखता है और किसी अन्य नर सील की हिम्मत नहीं जो इस समूह की मादा को हाथ लगा ले। उसे मुखिया को हराना होगा तब जाकर वह मादाओं के इस हरम को हथिया सकेगा। ऐसी ही कहानी बन्दरों की भी है और अनेक प्राणियों की है।
देश में ऐसे कितने ही थुलथुले सील हैं, सभी के अपने समूह हैं। वह सील अपने दल के मुखिया हैं, वहाँ दूसरे का प्रवेश वर्जित है। कभी मुझे यह दृश्य बिहार की राजनीति में लालू के दर्शन करा देता है तो कभी उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती दिखायी देते हैं। सील नामक प्राणी के दल के रूप में हरम है लेकिन यहाँ सारा तबका मौजूद है। मुलायम नामक सील की थूथन पर तो लात मारकर युवा अखिलेश विराजमान हो गये लेकिन बिहार में युवा सील के अभी मूछे भी नहीं निकली थी कि उसे दूसरों ने ही पटकनी दे दी। दल में घमासान मच गया है, लेकिन स्थापित सील जस की तस है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक इन सीलों का साम्राज्य है, न जाने किस-किस रूप में ये विराजमान हैं। युवा पीढ़ी का संघर्ष जारी है, कुछ सफल हो जाते हैं और कुछ असफल। बन्दरों का झुण्ड भी मुझे दिखायी देने लगा है, कुछ युवा मासूम बन्दर गुमसुम बैठे हैं, उन्हें किसी मादा का सहचर्य नहीं मिलता, बस जिन्दगी निकल जाती है, यूं ही। थूथन को उठाए मठाधीश अपने साम्राज्य को देखता रहता है और निगरानी रखता है कि कोई युवा वहाँ अनाधिकृत प्रवेश ना कर जाए। बस मुझे चारों तरफ सील के ये थूथन ही थूथन दिखायी देते हैं

Wednesday, July 19, 2017

सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल iifa awards का प्रसारण  हो रहा था। उत्तर भारतीय शादी में और इस कार्यक्रम में कुछ अन्तर नहीं था। हमारे यहाँ की शादी कैसी होती है? शादी का मुख्य बिन्दु है पाणिग्रहण संस्कार। लेकिन यह सबसे अधिक गौण बन गया है, सारे नाच-कूद हो जाते हैं उसके बाद समय मिलने पर या चुपके से यह संस्कार  भी करा दिया जाता है। जितने भी फिल्मों के अवार्ड फंक्शन होते हैं, उनमें भी यही होता है। अवार्ड के लिये एक मिनट और हँसी-ठिठोली के लिये दस मिनट। शादी में सप्तपदी से अधिक महिला संगीत पर फोकस रहता है, यहाँ भी कलाकारों के नृत्य पर ध्यान लगा रहता है।
आप किसी भी शादी में मेहमान बनकर जाइए, बस वहाँ सब नाचते हुए ही मिलेंगे। सारा दिन नाच की प्रेक्टिस चलती है और मेहमान कौन आया और कौन गया किसी को नहीं पता। ब्यूटी-पार्लर भी प्रमुख विषय है, दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने की ललक तो आपके मन में रह ही जाती है, जब पूछो तब – वे पार्लर गए हैं। कल वहाँ भी ऐसा ही हुआ। अवार्ड देते-देते ध्यान आ गया कि ये जो हिरोइनें हैं, इतना सज-धज कर आयी हैं, इनकी ड्रेस की भी नुमाइश लगा ही दी जाए। बस एंकर के मन में आया और खेल शुरू, किसकी ड्रेस सुन्दर का खेल, खेल लिया गया।
अवार्ड फंक्शन में फिल्म के प्रमोशन भी होने लगे हैं, जिसकी भी नयी फिल्म आ रही है, वह स्टेज पर आता हैं और अपनी-अपनी तरह से प्रमोशन करता है। हमारे यहाँ शादियों में ऐसा खेल तो नहीं होता लेकिन नये जोड़े  बनने का खेल खूब होता है। लड़के-लड़की ने कब आँख मटक्का कर लिया पता ही नहीं  चलता या फिर माता-पिता ने कब किसके लड़के या लड़की को देखकर पसन्द कर लिया, यह हमेशा का खेल है।

इसलिये शादी केवल सप्तपदी नहीं है, बहुआयामी समारोह है, ऐसे ही अवार्ड फंक्शन केवल पुरस्कार देना नहीं है अपितु पूरा फिल्मी मनोरंजन है। कौन नया कलाकार छाने की कोशिश में है और कौन पुराना अब स्थापित होकर अपनी जगह बना चुका है, सारे ही खेल होते हैं। बस एक बात ध्यान  देने की है कि जो किसी विशेष समूह से जुड़ जाता है, वह शीघ्र  ही ऊँचाई छूने लगता है और जो नहीं जुड़ पाता वह शायद अंधेरे में खो जाता है। इसलिये कुछ लोग अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं। मेरी छतरी के नीचे आ जा का खेल चलता रहता है। कभी कपूर खानदान की छतरी विशाल थी अब कई छतरियाँ तन गयी हैं और ऐसे समारोह ही तय करते हैं कि किसकी छतरी में कितनी सुरक्षा है। जिसने इन छतरियों को पहचान लिया बस वह सुरक्षित हो जाता है। कल की एक बातचीत – तू अपने बाप के कारण है, वरूण धवन से कहा गया। वरूण ने पलटकर कहा कि सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है। तभी कर्ण जौहर ने स्वयं कह दिया कि मैं भी अपने  बाप की बदौलत हूँ।