Thursday, August 24, 2017

अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक प्रसंग जो कभी भूलता नहीं और बार-बार उदाहरण बनकर कलम की पकड़ में आ जाता है। मेरी मित्र #sushmakumawat ने कामकाजी महिलाओं की एक कार्यशाला की, उसमें मुझे आमंत्रित किया। कार्यशाला में 100 मुस्लिम महिलाएं थी। मुझे वहाँ कुछ बोलना था, मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं क्या विषय लूं जो इन्हें समझ आ जाये! फिर मैंने कहा कि आज हम केवल बातचीत करते हैं और आपके जो प्रश्न हो उनको हल करने का प्रयास करते हैं। दो प्रश्न आए – पहला – तलाक-तलाक-तलाक कब तक और दूसरा बुर्का कब तक। वहाँ 100 महिलाओं में हर उम्र की महिला थी, अधिकांश पीड़ित थीं, तलाकशुदा थीं। हम उनका दर्द जानने का प्रयास कर ही रहे थे कि नीचे शोर मचा। तब मुझे बताया गया कि किसी महिला के कमरे में मौलवी घुसकर जबरदस्ती कर रहा है और महिला चिल्ला रही है लेकिन बचाने की हिम्मत किसी में नहीं है। तब मैंने इस बात को कई बार दोहराया कि मुस्लिम समाज में अवश्य क्रांति आएगी और महिलाओं के द्वारा ही आएगी। आज पहले प्रश्न का समाधान आ गया है बस दूसरा उसके सहारे ही हल हो जाएगा।
साहित्यिक महिलाओं की एक विचार गोष्ठी किसी परिवार में आयोजित थी, वहाँ महिला अधिकारों की बात हो रही थी। मुस्लिम बहन कह रही थी कि हमें कोई अधिकार नहीं हैं, हमारे नाम मकान नहीं है, कोई सम्पत्ती नहीं है। ताज्जुब तब हुआ जब हिन्दू बहने भी उसी रो में बहती दिखीं। मैंने कहा कि हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है, मेरे नाम मकान है और पूरा घर मेरा है। मुस्लिमों की इस समस्या को हिन्दुओं की क्यों बनाते हो। महिला मुक्ति आंदोलन में यही स्थिति बनी। यूरोप में महिलाओं ने चर्च के खिलाफ मोर्चा खोला तो आग हमारे यहाँ भी लगी, जबकि भारत में ऐसा नहीं था। दोनों बातें सामने आयीं, एक ईसाई महिला पादरियों का शिकार हो रही थीं और दूसरा मुस्लिम महिला मौलवियों का शिकार बन रही थी। लेकिन लपेटे में हिन्दू समाज भी आ रहा था। हिन्दू समाज के सन्तों ने भी स्वयं को भगवान का दर्जा दिया और महिलाओं का शोषण करने का प्रयास प्रारम्भ किया। मुस्लिम समाज में भी जहाँ एक तरफ तीन तलाक का बोलबाला था तो हिन्दू समाज के पुरुष भी महिला को अपनी अनुगामिनी मानने लगे और सभी जगह अपना वर्चस्व स्थापित करने में लग गये।
इसलिये कल का दिन इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है जब स्त्रियों को आजादी मिली है। प्रत्यक्ष आजादी मुस्लिम महिला को मिली है लेकिन अप्रत्यक्ष आजादी सभी को मिली है। जो अपराध समाज में बढ़ता जा रहा था और उसके छींटे सारे समाजों पर पड़ रहे थे, उससे समाज और देश को मुक्ति मिली है। हलाला को नाम पर यौन उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ था जो हवस बनकर विस्तार ले रहा था। सारा महिला समाज असुरक्षित हो गया था, नन्हीं बच्चियां तक असुरक्षित हो गयी थीं। जब किसी एक वर्ग की तानाशाही समाप्त होती है तो बहुत सारे अपराध और जुल्म भी समाप्त होते हैं। यह विभेद बहुत पहले ही समाप्त हो जाता यदि शाहबानो के केस में राजीव गांधी महिलाओं के पक्ष में खड़े होते। आज मोदी जी का लाख-लाख धन्यवाद है कि वे महिलाओं के पक्ष में खड़े हुए और उन्हें न्याय मिलने के मार्ग में बाधक नहीं बने। हमारा उनको नमन। यह सृष्टि जितनी पुरुषों की है उतनी ही महिलाओं की है, किसी एक को इसे अपनी मन मर्जी से चलाने का हक नहीं है। अब महिला ने खड़ा होना सीख लिया है, वे अपने अधिकार लेकर ही रहेगी। धर्म के नाम पर महिलाएं कल यूरोप में पादरियों से मुक्त हुई थीं और आज भारत में मौलवियों से। अब महिला का स्वाभिमान लौटेगा और उसका यथोचित सम्मान समाज को देना ही पड़ेगा। जिन महिलाओं ने भी इस आंदोलन को लड़ा है उन्हें भी प्रणाम। इस आंदोलन से देश बदलेगा और सारे ही समीकरण बदलेंगे। अब वोट बैंक के लिये महिला का अधिकार नहीं छीना जाएगा। अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा।
www.sahityakar.com

Saturday, August 19, 2017

हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है

#हिन्दी_ब्लागिंग

मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा  बना रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं ये पक्षी? मन में प्रश्न था। शायद ये कहीं दूर से आए हैं और इनने अपना ठिकाना कुछ दिनों के लिये यहाँ बसा लिया है। पहले तो इन पक्षियों को कभी यहाँ नहीं देखा, बस दो-चार साल से ही दिखायी पड़ रहे हैं। सफेद और काले पक्षी, बड़े-बड़े पंखों वाले पक्षी। उड़ते हैं तो आकाश नाप लेते हैं और जब जल में उतर जाते हैं तो किस तरह इठलाते हुए तैरते हैं। इनका उड़ना, इनका लहराकर पेड़ पर बैठना कितना आकर्षक है! मेरे रोज का क्रम हो गया है इन पक्षियों को देखने का। मन करता है कि यहाँ से नजर हटे ही ना। इन बड़े पक्षियों के साथ नन्हीं चिड़ियाओं की दुनिया भी यहाँ बसती है। सैकड़ों की तादाद में आती हैं और इन्हीं तीन-चार पेड़ों पर अपना ठिकाना बना लेती हैं। शाम पड़ते ही इनका काफिला फतेहसागर की ओर चल पड़ता है, चहचहाट पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती है। ये चिड़िया भी अपनी गौरैया नहीं है, कोई विदेशी नस्ल की ही दिखायी  देती हैं। रात होने को है और अब चिड़ियाएं धीरे से उड़कर पेड़ के नीचे के हिस्से में चले गयी हैं, वहाँ सुरक्षित जो हैं। ये पेड़ मानों इन पक्षियों की हवेली है जिसमें नीचे की मंजिल में नन्हीं चिड़िया रहती हैं और ऊपर बड़े पक्षी।
गर्मी के दिनों में नन्हीं चिड़ियाएं दिखायी नहीं दे रही थी, शायद वे भी ननिहाल गयी होंगी! लेकिन जैसे ही मौसम सुहावना हुआ, ये लौट आयी हैं। बड़े पक्षी अपने देश नहीं लौटे और इनने अपना पक्का ठिकाना यहाँ पर ही बना लिया है। तभी आकाश में हवाईजहाज गरजने लगता है, न जाने कितने पक्षी दूसरे देश में बसेरा ढूंढने निकल पड़े होंगे! मेरी इस खूबसूरत झील में दुनिया जहान के पक्षी आए हैं अपना सुकून ढूंढने, ये लौटकर नहीं जा रहे हैं और इस जहाज में लदकर न जाने कितने बाशिंदे दूसरे देश में सुकून ढूंढ रहे हैं। तभी लगता है कि जीवन रीतने लगा है, इस पेड़ पर बड़े पक्षी हैं तो नन्हें पक्षी भी है। ये आपस में बतियाते तो होंगे, सारा वातावरण तो गूंज रहा है इनकी बातों से। लेकिन मन खामोश है, न जाने कितने घर खामोश हैं और शहर खामोश हैं। इन घरों की बाते रीत गयी हैं, यहाँ कोई बतियाने नहीं आता। घरों के पक्षियों ने दूसरे देश में सुकून ढूंढ लिया है। बूढ़े होते माँ-बाप पूछ रहे हैं कि किस पेड़ पर जीवन मिलेगा? क्या हमें भी अपना बसेरा उजाड़ना पड़ेगा? क्या हमें भी सात समन्दर पार जाना पड़ेगा? ये पक्षी तो मेरे शहर में आ बसे हैं लेकिन शायद मुझे इनका साथ छोड़ना  पड़ेगा।

मनुष्य क्यों यायावर बन गया है, ये पक्षी शायद इन्हें यायावरी सिखा रहे हैं। अब मुझे क्रोध आने लगा है इन पर, तुम क्यों चले आये अपने देश से? तुमने ही तो सिखाया है मनुष्य को दूसरे देशों में बसना। तुम्हारा जीवन तो सरल  है लेकिन हमारा जीवन सरल नहीं है, तुम्हारें पास लोभ नहीं है, संग्रह नहीं है, तुम छोड़कर कुछ नहीं आते। लेकिन हमें तो जीवन का हिसाब करना होता है। किस-किस माँ को क्या-क्या जवाब दूं कि परिंदों सा जीवन नहीं हैं हमारा। परिंदे जब उड़ते हैं तो आजादी तलाशते हैं, वे किसी झील को अपना मुकाम बना लेते हैं, जहाँ जीवन में सब कुछ पाना हो जाता है। ये परिंदे भी सबकुछ अपने पीछे छोड़कर आए हैं, इनके पीछे कोई नहीं आया। सभी के पेड़ निर्धारित हैं, सभी की झीलें निर्धारित हैं। कोई इस देश की झील में बसेरा करता है तो कोई पराये देश की झील में बसेरा करता है। मनुष्य कब तक स्वयं को दूसरों से अलग मानता रहेगा? घुलना-मिलना ही होगा हमें इन पक्षियों के साथ। इनके जीवन की तरह अकेले रहकर  ही बनाना होगा अपना आशियाना। जब ये पक्षी अकेले ही जीवन जीते हैं तो हम क्यों नहीं! हमने घौंसला बनाया, परिंदों को पाला, लेकिन अब वे उड़ गये हैं। उन्हें उड़ने दो, अपना संसार बसा लेने दो। उनकी गर्मी-सर्दी उनकी है, हम किस-किस को अपनी छत देंगे? कब तक देंगे और कब तक देने की स्थिति में रहेंगे? वे भी हमें कब तक आश्वासन देंगे? यहाँ फतेहसागर की झील में कितने ही पक्षियों का बसेरा है, हम भी हमारे ही देश में इन परिन्दों की तरह बसे रहेंगे। पेड़ बन जाएंगे जहाँ पक्षी अपना बसेरा बना सके। इन जहाजों में जाने दो युवाओं को, उनको दूर देश की झील ने मोह लिया है लेकिन हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है। 

Wednesday, August 16, 2017

पहाड़ों के बीच बसा अलसीगढ़

#हिन्दी_ब्लागिंग
मनुष्य प्रकृति की गोद खोजता है, नन्हा शिशु भी माँ की गोद खोजता है। शिशु को माँ की गोद में जीवन मिलता है, उसे अमृत मिलता है और मिलती है सुरक्षा। बस इंसान भी इसी खोज में आजीवन जुटा रहता है। बचपन छूट जाता है लेकिन जहाँ जीवन मिले, जहाँ अमृत मिले और जहाँ सुरक्षा मिले, उस माँ समान गोद की तलाश जारी रखता है। प्रकृति की ऐसी गोद जब उसे मिलती है तो वह कह उठता है यह मेरी माँ ही तो है। कभी साहित्याकर की भाषा में जन्नत कह उठता है। मनुष्य कितनी ही भौतिक उन्नति कर ले लेकिन प्रकृति को आत्मसात करने की उसकी फितरत कभी नहीं जाती। वह कभी बर्फिली पहाड़ियों पर पहुंचता है तो अनायास ही कह देता है कि धरती पर यही जन्नत है, कभी मेरे जैसा व्यक्ति हरियाली से लदे पहाड़ों से मध्य जा पहुंचता है तो कह देता है कि अरे इसके अतिरिक्त जन्नत और क्या होगी? हमने तो धरती की इसी जन्नत को बार-बार देखा है, इसी में जीवन को खोजा है, इसी में अमृत ढूंढा है और इसी धरती को सुरक्षित माँ की गोद माना है। इसलिये इसे ही नमन करते हैं, इसी का वन्दन करते हैं।
कल निकल पड़े थे इसी जन्नत की ओर, उदयपुर के जनजाति गाँव की सैर पर। घर से मात्र 20 किमी की दूरी थी लेकिन वहाँ पहुंचने में 40 मिनट का समय लग गया। हमारी गाडी सर्पिली सड़कों पर गुजरती हुई पहाड़ियों को लांघ रही थी, कभी पहाड़ सामने ही आ खड़ा होता था तो कुछ दूर चलने पर ही रास्ता बना देता था। पहाड़ पेड़ों से और हरी घास से लदे थे, बीच-बीच में इनमें जीवन भी दिखायी दे जाता था। कहीं छोटी सी पहाड़ी थी तो उसमें एक झोपड़ी थी, बकरी थी और बच्चे थे। महिला और पुरुष खेतों सें दिखायी दे जाते थे। खेत भी तो पहाड़ी के तलहटी में ही छोटे आकार के थे। चारो तरफ मक्की की खेती लहलहा रही थी। कब 40 मिनट बीत गये, पता ही नहीं चला और गाँव अलसीगढ़ आ गया। हमारे एक मित्र का वहाँ छोटा सा ठिकाना था हमने वहीं अपना सामान रखा और अलसीगढ़ के डेम की ओर चलने को तैयार हो गए। हमारे ठिकाने की महिला चौकीदार से पूछा कि डेम कितनी दूर है, वह बोली पास ही है। हमने कहा फिर पैदल ही चलते हैं फिर युवाओं से पूछा तो बोले की नहीं चार किमी है, गाडी से जाइये, सीधी सड़क वहीं तक जा रही है। हम गाडी उठाकर चल पड़े। कुछ दूर जाकर पूछ लिया कि कहाँ है डेम? अरे वह तो पीछे छूट गया। अब वापस पीछे, कच्चे रास्ते में गाडियां उतार दी, लेकिन कुछ दूर चले थे कि पता लग गया कि गाडी ले जाना सम्भव नहीं है। वापस लौटे, फिर सड़क पर चलते रहे, पता लगा कि फिर काफी दूर निकल आये हैं। वापस लौटे और दूसरे रास्ते पर गाडी उतारी, लेकिन रास्ता फिर भी नहीं मिला। पानी दिख रहा है लेकिन पहाड़ को लांघने का रास्ता नहीं मिल रहा। फिर वापस, अब की बार जवान को साथ लिया और उसने रास्ता दिखाया। गाडियों को खड़ा करके पहाड़ों को लांघना था। पहाड़ के पीछे बांध का पानी था। पहले पहाड़ पर चढ़ना फिर उतरना, तब कहीं जाकर पानी को हाथ लगा सकते थे। हमें पानी में उतरने को भी मना कर दिया गया था, बताया था कि पानी गहरा है, खतरा मत मोल लेना।
चारों तरफ पहाड़े थे और पहाड़ों के बीच में पानी को रोक रखा था, नदी भी थी। कभी सोचो, दिन की चहल-पहल के बाद जब रात ढलती होगी तब प्रकृति क्या बात करती होगी? आकाश में चाँद और तारे झिलमिलाते होंगे और धरती पर पहाड़ों के मध्य बसा यह पानी कभी किसी मछली की छपाक के साथ खामोशी तोड़ता होगा। पहाड़ मद्धिम रोशनी में जगमगाते होंगे, हरी दूब पर शबनम की बूंदे जब तैरती होंगी तो हीरे जगमगाते होंगे! उस अलौकिक सौन्दर्य को पता नहीं किसने देखा होगा या यह सब हमारा ही है, कभी ध्यान नहीं दिया होगा! सुबह पंक्षियों की चहचहाट से होती होगी और खेतों में किसान जब अपने बैलों को ले जाते होंगे तो कैसा समा होगा! लेकिन इतना ही तो नहीं है गाँव! इसके आगे भी बहुत कुछ है, इस जन्नत में लोग रहते हैं लेकिन प्रकृति से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं। गाँव तक स्कूल जा पहुंचा लेकिन बच्चे पढ़ने के शौकीन नहीं, उनका मन लगता ही नहीं। शिक्षा को उन पर थोप दिया गया है। यदि शिक्षा से उन्हें मुक्त कर दिया जाए और जीवन को वहीं के साधनों से सम्पन्न बना दिया जाए तो शिक्षा को अपना लेंगे। थोपी हुई कोई चीज किसी को भी पसन्द नहीं आती, हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है, अपने तरीके से जीना चाहता है। हम क्यों उन्हें अपना सा बनाना चाहते हैं? उनकी कुटिया को स्वच्छ और सुन्दर बना दीजिये, ग्रामीण पर्यटन शुरू कर दीजिये, वे सम्पन्न हो जाएंगे और शिक्षा की ओर भी मुड़ जाएंगे। तरीके उनकी पहल के होने चाहिये फिर हमारा सुझाव होना चाहिये, ऐसा कर लिया तो वे अपनी तरह से आगे बढ़ेंगे और फिर हमें जा पकड़ेंगे। प्रकृति के पुत्रों को प्रकृति ही रास आती है और प्रकृति स्वतंत्र होती है। 

Tuesday, August 15, 2017

जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है

#हिन्दा_ब्लागिंग
आधा-आधा जीवन जीते हैं हम, आधे-आधे विकसित होते हैं हम और आधे-आधे व्यक्तित्व को लेकर जिन्दगी गुजारते हैं हम। खिलौने का एक हिस्सा एक घर में बनता है और दूसरा हिस्सा दूसरे घर में। दोनों को जोड़ते हैं, तो ही पूरा खिलौना बनता है। यदि दोनों हिस्सों में कोई भी त्रुटी रह जाए तो जुड़ना असम्भव हो जाता है। हम भी खिलौना बना दिये गए हैं, हमने भी अपनी संतान को खिलौने जैसे संस्कारित किया है। एक हिस्सा किसी घर में तो दूसरा हिस्सा किसी घर में संस्कारित होता है। शरीर सम्पूर्ण मिला है लेकिन हमने कार्य विभाजन करके उसे आधा ही विकसित होने दिया है। एक को शक्तिशाली तो दूसरे को कोमल, एक को अर्थतंत्र में प्रवीण तो दूसरे को गृहविज्ञान में निपुण बनाने में हम सभी जुट गये हैं। हम इसी सभ्यता को लेकर अभी तक संस्कारित हुए हैं। इसीकारण एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इन दो खिलौनों को जोड़ने के लिये एक सी परवरिश चाहिये, दोनों को एक दूसरे के पूरक के रूप में ही संस्कारित होने की जरूरत है। सारी बात का मूल यह है कि हम युगल रूप में संस्कारित होते हैं, हमारा जीवन एकाकी रूप में संस्कारित नहीं है। इसके विपरीत यदि अमेरिका, यूरोप आदि देशों का जीवन एकाकी रूप में संस्कारित होता है, वहाँ युगल रूप से संतान को संस्कारित करने का रिवाज नहीं है।
एक दादी माँ थीं, उनसे एक कहावत सुनी थी। जब कोई बेटा रोता था तो वे कहती थीं कि – बेटा तू क्यों रो रहा है? आने वाली आएगी, तेरे लिए रोटी पकाती जाएगी और रोती जाएगी। ऐसे ही जब बेटी रोती थी तो कहती थीं – बेटी तू क्यों रो रही है? आने वाला आएगा, कमाता जाएगा और रोता जाएगा। याने रोना दोनों को है। हँसने के लिये दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए। आज परिवार का मूल झगड़ा भी यही है, हम एक दूसरे पर निर्भर हो गये हैं। हमारी खुशी दूसरे पर है, आपकी पत्नी का यदि आपकी माँ से झगड़ा होता है तो आप उसका समाधान नहीं दे पाते क्योंकि आपके व्यक्तित्व में परिवार के समाधान का संस्कार ही नहीं है। पुरुष महिलाओं के झगड़े में क्यों पड़े, बस पुरुष को यही सिखाया गया है। वह घर की समस्या में उलझना भी चाहता है और समाधान भी उसके पास नहीं है। जो बाहरी दुनिया में सफल है, कलेक्टर है याने पूरे जिले का रखवाला है वह अपने घर को समाधान नहीं दे पाता और आत्महत्या कर लेता है। उधर महिला को जीवन से जूझने के लिये सबकुछ सिखाया जा रहा है, वह सक्षम होती जा रही है, स्वयं को पूर्ण विकसित करती जा रही है। अब वह कार्यविभाजन के सिद्धान्त को मानने के लिये तैयार नहीं है। वह पति पर निर्भर होने के बावजूद भी कार्य विभाजन के सिद्धान्त को पूरी तरह से नहीं मानती है और इस सिद्धान्त को तो कतई नहीं मानती कि सम्पूर्ण परिवार का बोझ उस पर हो। और यदि वह भी कामकाजी है तो फिर इस सिद्धान्त को मानना उसकी कतई मजबूरी नहीं है।
भारतीय समाज इसी उहापोह में जीवन जी रहा है, वह आज भी समझ नहीं पा रहा है कि हमें हमारी संतान को पूर्ण रूप से संस्कारित करना होगा, तेरा काम और मेरा काम करके दिये गये संस्कार किसी युग में चल गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आज के युग में भी चल जाएंगे। ना लड़की को निर्भर रहने के संस्कार दीजिये और ना लड़के को। दोनों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित कीजिये। आज के समय की यही आवश्यकता है। मुझे अपनी बुआ के घर की बात हमेशा अच्छी लगती थी, जब भी वहाँ जाती थी, बुआ को भी और भाभी को भी बराबर काम करते देखती थी। बुआ सभी के कपड़े धोती थी, यह नहीं की बहु के कपड़ अलग निकाल दें। मैंने उनके बीच में हमेशा प्रेम देखा। परिवार को चलाना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है, सभी को सारे काम के लिये तैयार कीजिये। जब लड़के घर में रोटी बनाते दिखायी देंगे तब कोई झगड़ा सर नहीं उठा पाएगा। फिर किसी कलेक्टर को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी। युग बदलता है तो सभ्यता में भी परिवर्तन होता है। हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये लेकिन परिवार में वहीं अटके हैं। परिवार में भी आगे बढ़िये, एक दूसरे पर निर्भर मत बनिए। यह निर्भरता ही आपको तोड़ रही है, कभी आशा साहनी मर रही है तो कभी सिंघानिया बेघर हो रहा है और कभी कलेक्टर आत्महत्या कर रहा है। अपनी परम्पराओं से चिपके नहीं, इन्हें बदलते रहें। रूकी हुई जिन्दगी सड़ने लगती हैं, जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है।

Wednesday, August 9, 2017

दिल इतना बड़ा कीजिये कि दुनिया समा जाये

#हिन्दी_ब्लागिंग

मन का दोगलापन देखिये, कभी मन कहता है कि अकेलापन चाहिये और कभी कहता है कि अकेलापन नहीं चाहिये। कभी कहता है कि अकेलापन तो चाहिये लेकिन केवल अपनी चाहत के साथ का अकेलापन चाहिये। हम अपनी पसन्द का साथ चाहते हैं, बस उसी के लिये सारी मारा-मारी करते हैं। दुनिया भरी पड़ी है लेकिन हम भरी दुनिया में अकेले रह जाते हैं। समारोह में जाते हैं और साथी का साथ छूट जाये तो कह देते हैं कि तुम मुझे अकेला छोड़कर चले गये। अरे कहाँ थे तुम अकेले! समारोह में इतने लोग तो थे! लेकिन बस जो अपना है, जो अपने दिल के करीब है या जो हमारा आत्मीय है, बस उसी का साथ चाहिये। बचपन में माँ अपनी होती है,  लोकिन यौवन आते ही मन संगी का साथ ढूंढने लगता है और माँ विस्मृत हो जाती है। माँ अपने पुत्र के बिना अकेलापन अनुभव करती है और पुत्र को यौन आकांक्षा की पूर्ति करने वाली संगी के साथ का अकेलापन चाहिये। अकेलापन दोनो को ही चाहिये, दोनो की ही शर्तें हैं। अपना इच्छित साथी दोनों को ही चाहिये। माँ दुखी है क्योंकि पुत्र अब उसके पास नहीं है लेकिन पुत्र सुखी है क्योंकि जीवन संगनी उसके साथ है। माँ कहती है कि पुत्र मैं अकेली हूँ और पुत्र कहता है कि मुझे अकेला छोड़ दो। ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में होता है। कभी कहानी बन जाती है और कभी बिना कहानी के ही जीवन बीत जाता है। मुम्बई की आशा साहनी की कहानी बन गयी। उसके अकेलेपन की घटना समाज के अस्तित्व की कहानी बन गयी।

मन के धागे आत्मीयता से बंधते हैं, प्रेम भी आत्मीय भाव से ही उपजता है। सम्बन्धों को आत्मीयता की अनुभूति हर पल करानी होती है, कभी त्याग भी करना पड़ता है तो कभी प्यार भी देना पड़ता है। आशा साहनी की कहानी में आत्मीयता के धागे उलझ गये थे। जब पुत्र को प्यार की जरूरत थी तो माँ ने त्याग नहीं किया और जब माँ को प्यार की जरूरत थी तो पुत्र की आत्मीयता दूर चले गयी थी। किसे दोष दें? यह मन का ही दोष है कि हम केवल मनचाहे से ही बंधना चाहते हैं। अपने रिश्तों को विस्तार नहीं देते। पत्नी की मृत्यु होने पर पति को दूसरी पत्नी का साथ चाहिये ही तो पति की मृत्यु होने पर पत्नी को भी दूसरा साथी चाहिये। हमें दूसरा साथी तो चाहिये लेकिन हम अपनी संतान के साथ के बारे में भूल जाते हैं। तब हमें संतान के रहते अकेलापन लगता है और अपनी संतान के अकेलेपन को भूल जाते हैं। अक्सर सौतले रिश्तों में प्रेम पनपता नहीं है। आशा साहनी के मामले में भी यही हुआ। आशा साहनी ने दूसरी शादी की और पुत्र का प्रेम दूसरे पिता के साथ नहीं पनपा। पुत्र अकेला हो गया और जब माँ दोबारा अकेली हुई तो पुत्र की आत्मीयता जागृत नहीं हुई। दोनो के सम्बन्धों में दूरी आ गयी। छटे-चौमासे बात होने लगी। माँ पुत्र के आलावा अकेलेपन को कहीं  बांट नहीं पायी और अकेलापन उसका काल  बन  गया। रिश्ते जब दुराव के रास्ते चल पड़ते हैं तब समय कितना निकल गया यह रिश्ते याद नहीं रखते। अनबोलापन पसर जाता है और रह जाता है अकेलापन। लेकिन हम सभी को अपने रिश्तों को विस्तार देना होगा, केवल खून के रिश्तों को जिद से नहीं बांध सकते और ना किसी अधिकार से बांधकर रखा जा सकता है। यह हम सब की विडम्बना है कि आज हम अकेले हैं लेकिन हम अकेले केवल संतान से है, बाकि रिश्ते तो हमारे साथ हैं। आत्मीयता का विस्तार करते रहिये, फिर सब अपने से लगेंगे। अपने मन को खोलना सीखिये, फिर देखिये कैसे दूसरे भी अपने ही बन जाते हैं। आशा साहनी की कहानी को मत दोहराइये, मत जिद करिये इच्छित के साथ की। बस दुनिया बहुत बड़ी है और अपना दिल भी इतना बड़ा कर लीजिये कि इसमे दुनिया समा जाये।

Sunday, August 6, 2017

तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है

#हिन्दी_ब्लागिंग

ओह! आज मित्रता दिवस है! मित्र याने मीत, अपने मन का गीत। मन रोज भर जाता है, उसे रीतना ही होता है,  लेकिन रीते कैसे? रीतने के लिये कोई मीत तो चाहिये। मन जहाँ अपने आप बिना संकोच रीत जाए वही तो मीत होता है। मन को अभिव्यक्त करने के लिये मीत का साथ चाहिये और जिसे यह साथ मिल जाए वह सबसे धनवान बन जाता है। पता नहीं किसे मीत मिला और किसे नहीं लेकिन मेरा मीत तो मेरी लेखनी बन गयी है। यह फेसबुक यह ब्लाग और यह वेबसाइट मेरे मीत बनकर मेरे साथ हर पल खड़े हैं। यह मुझे नकारते नहीं है, मैं जो चाहे वो लिख सकती हूँ, जैसे चाहे अपने मन की परते खोल सकती हूँ। इससे कुछ भी नहीं छिपा है। मन को अभिव्यक्त होने का मार्ग मिल गया है। इसलिये हमारा सबसे प्यारा मित्र यह सोशल मीडिया बन गया है। ना केवल यह मेरी सुनता है अपितु मुझे सम्भालकर भी रखता है, मेरी बातों को सहेजकर रखता है। इतना तो किसी ने नहीं सुना जितना यह सुन लेता है। इसलिये मित्रता दिवस पर आज इसी परम मित्र को अपनी बाहों में भर लेती हूँ। यह नहीं होता तो मेरा वजूद भी बिखर गया होता, इसी के सहारे मेरा स्वाभिमान जिन्दा है।
लेखक मन को अभिव्यक्त करता है, इसके सहारे समाज के मन को भी अभिव्यक्त कर देता है लेकिन सम्पादक आप पर पहरे बिठा देता है। लोग आपको मंच से धकेल देते हैं। दो ही बाते होती हैं आपके सामने या तो अपनी अभिव्यक्ति बन्द कर दो या फिर अपना स्वाभिमान बेच दो। किसी समूह का हिस्सा बनकर गुलामी का जीवन और दूसरों की इच्छित अभिव्यक्ति आपका नसीब बन जाता है। पुरस्कार भी मिल जाते हैं, प्रसिद्धि भी मिल जाती है लेकिन मन में जो द्वंद्व हैं वे प्रकट नहीं होते, स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। जीवन नकली बन जाता है। आपको कुछ पैर दिखायी देते रहते हैं, जिन्हें पूजना आपकी नियति बन जाती है। लेकिन की-बोर्ड पर जब अंगुली थिरकती है और मॉनीटर  पर शब्द दिखायी देने लगते हैं तब सारे की प्रतिबंध दूर हो जाते हैं। अपनी वेबसाइट  पर बिना ताले-कुंजी के अपनी सम्पत्ती को रखने का आनन्द ही कुछ और है। मेरे मित्र के घर से भी कुछ लोग सेंध लगा देते हैं लेकिन दूध है तो बिल्ली पीयेगी ही, बस यह सोचकर बिसरा देती हूँ।

लेकिन दुनिया में अपने मन की सुनने वाले और भी हैं। कल एक माँ से बात हो रही थी, मैंने पूछा कि कितने बच्चे हैं? वे बोली कि दो हैं, दोनों ही बेटे हैं। बिटिया नहीं है, इस बात से दुखी थीं। मैंने पूछा कि मन किसके साथ सांझा करती हो? वे बोली कि इसी बात का गम है। बताने लगी कि कल तक बेटी ना होने का गम नहीं था लेकिन अब जब बेटे बड़े हो गये हैं, घर सूना लग रहा है। मन बात करने को तरस रहा है। मन तो हमेशा ही अभिव्यक्त होना चाहता है। बचपन में भी चाहता था लेकिन माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी लेकिन बहन थी और शायद ऐसी कोई ही बात होगी जो अभिव्यक्त ना होती हो। वह मित्रता गहरी थी, मन से मन का जुड़ाव था। जहाँ भी छिपाव है वहाँ मित्रता दूर चले जाती है। अब बेटी है, मन को अभिव्यक्त करने के लिये। लेकिन जहाँ बहन नहीं है और बेटी नहीं है, उनसे पूछो कि मन को कहाँ हलका करते हो? शायद वे अभिव्यक्ति के मायने ही भूल  गये हैं। सच्ची मित्रता बस यहीं बसी है। आज इस फेसबुक को भी, यहाँ के मित्रों को भी और बहन को भी और प्यारी बिटिया को भी मित्रता दिवस  पर अपना सा प्रेम। तुम लड़ भी लोगे तो भी अभिव्यक्त ही हो जाओगे, तुम अपने से रहोगे तो भी अभिव्यक्त हो जाओगे. इसी मन की अभिव्यक्ति को तो मित्रता कहते हैं और तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है। 

Monday, July 31, 2017

तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

#हिन्दी_ब्लागिंग
बादल गरज रहे हैं, बरस रहे हैं। नदियां उफन रही हैं, सृष्टि की प्यास बुझा रही हैं। वृक्ष बीज दे रहे हैं और धरती उन्हें अंकुरित कर रही है। प्रकृति नवीन सृजन कर रही है। सृष्टि का गुबार शान्त हो गया है। कहीं-कहीं मनुष्य ने बाधा पहुंचाने का काम किया है, वहीं बादलों ने ताण्डव मचा दिया है, नदियों में  बाढ़ आ गयी है और जल अपने सहस्त्रों हाथों से बाधाओं को दूर करने में लगा है। कहीं मनुष्य की हठधर्मिता विनाश लिये खड़ी है तो कहीं  बादलों का रौद्र रूप हठधर्मिता को सबक सिखाने को तैयार खड़ा है। प्रकृति और पुरुष, नदियाँ और बादल सृष्टि का नवीन श्रृंगार करने को तत्पर हैं लेकिन धरती के एक प्राणी की मनमर्जी उन्हें मंजूर नहीं। वे अपने कार्य में किसी को बाधक नहीं बनने देंगे, जो भी उनका मार्ग रोकेगा, वे ताण्डव करेंगे और उनका रौद्र रूप मनुष्य को त्राही माम् त्राही माम् करने पर मजबूर करेगा। इन्हें विसंगति नहीं चाहिये, संतुलन चाहिये। प्रत्येक प्राणी में संतुलन, प्रत्येक जीवन में संतुलन, प्रत्येक तत्व में संतुलन। ये जो वर्षा ऋतु है, इसी संतुलन की ओर संकेत करती है। हमें बता देती है कि हमने कहाँ प्रकृति को बाधित किया है। उसके एक्स-रे में कुछ नहीं छिपा है, सारा चित्र सामने आ जाता है। बाधा को तोड़ने बादल बरस उठते हैं, कहीं-कहीं अति होने पर बादल फट भी जाते हैं लेकिन बाधा को इंगित कर ही देते हैं। वे अपनी सहयोगिनी नदियों को आह्वान करते हैं कि प्रबल वेग से बह जाओ और बाधाओं को दूर कर दो।

मनुष्य ने धरती को बाधित कर दिया है, उसकी स्वतंत्रता को छीन लिया है। चारों तरफ पहरे हैं, नदियों से कहा जा रहा है कि हम बताएंगे कि तुम्हें किस मार्ग से बहना है। समुद्र को भी कहा जा रहा है कि हम तुम्हारे सीने पर भी अपना साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। पहाड़ जो धरती के  रक्षक थे, उन्हें भी प्रहरी बनने से रोका जा रहा है, उन्हें नष्ट करके रक्षक की भूमिका से वंचित किया जा रहा है। रोज ही न जाने कितनी प्रजातियों को नष्ट किया जा रहा  है। मनुष्य अपने विलास के लिये सृष्टि को लील रहा है। इसलिये वर्षा ऋतु में मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष होता है। मनुष्य अपनी जिद पर अड़ा है, प्रकृति हर बार संदेश देती है लेकिन मनुष्य ठीट बन गया है। वह प्रकृति का सम्मान करना ही नहीं चाहता तो कब तक प्रकृति उसे क्षमा करती रहेगी? इस विशाल सृष्टि पर प्रकृति ने अनेक सम्भावनाएं प्रदत्त की हैं, मनुष्य सहित प्रत्येक जीवन को जीने की स्वतंत्रता दी है सब कुछ संतुलित है। संतुलन बिगाड़ने के उपक्रम में ही विनाश है। इसे रोकने लिये सुदृढ़ प्रशासन चाहिये। अनुशासन हमारे जीवन का आधार होना चाहिये। कम से कम हम अपने स्वार्थ के लिये धरती को बाधित करने का प्रयास ना करें, सृष्टि के संतुलन को  बिगाड़ने का कार्य ना करे। यदि हमनें स्वयं को अनुशासित कर लिया तो फिर ऋतु आने पर बादल नहीं फटेंगे, नदियाँ सैलाबी नहीं बनेंगी और तटबंध तोड़कर जल, प्रलय को नहीं न्योता दे बैठेगा। इस वर्षा ऋतु को आनन्दमयी बनाइये, धरती को पुष्पित और पल्लवित होने दीजिये। सावन जाने में है और भादवा आने में है, बस इस सुन्दर धरती को निहारिये और इससे पूछते रहिये कि बता तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

Saturday, July 29, 2017

देखी तेरी चतुराई

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल राजस्थान के जोधपुर में एक हादसा होते-होते बचा। हवाई-जहाज से पक्षी टकराया, विमान लड़खड़ाया लेकिन पायलेट ने अपनी सूझ-बूझ से स्थिति को सम्भाल लिया। यह खबर है सभी के लिये लेकिन इस खबर के अन्दर जो खबर है, वह हमारा गौरव और विश्वास बढ़ाती है। महिला पायलेट ने जैसे ही पक्षी के टकराने पर हुआ विस्फोट सुना, उसने तत्क्षण जहाज को ऊपर उड़ा दिया और इंजन बन्द करके जहाज को उतार लिया। सभी यात्री सुरक्षित उतर गये। महिला पायलेट के नाम से मन थोड़ा तो घबराता था ही, क्योंकि रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है कि महिला में विश्वास और हौंसलों की कमी होती है। हम इस झूठ को प्रतिपल सुनते हैं और अब तो सोशल मीडिया ने सहूलियत भी कर दी है और रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है। सभी को रात-दिन सुनी जाने वाली बात पर  पक्का यकीन हो जाता है तो हमें भी यकीन हो गया था कि महिला में आत्मविश्वास, सूझ-बूझ कि कमी होती है लेकिन कल महिला पायलेट की सूझ-बूझ ने नया आत्मविश्वास जगा दिया।
कल ही क्रिकेट की महिला कप्तान मिताली राज सहित सम्पूर्ण टीम का साक्षात्कार जी न्यूज दिखा रहा था। एक पुराने प्रश्न के उत्तर पर सभी पत्रकार आश्चर्य चकित थे। सुधीर चौधरी ने फिर पूछा कि आपसे जब यह पूछा गया था कि क्रिकेट में आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? तब आपने उत्तर दिया कि क्या आपने कभी यही प्रश्न किसी पुरुष खिलाड़ी से किया है? इस उत्तर का कारण क्या था? तब मिताली राज का उत्तर दिल को खुश करने वाला था। मिताली ने कहा कि यह प्रश्न कहीं दूसरे समय किया जाता तो ठीक था लेकिन उस समय जब हम फाइनल खेलने की तैयारी कर रहे हों, तब ऐसा लगा कि हमारा खेल मायने नहीं रखता। मिताली के उत्तर के बहुत गहरे मायने थे। यह ऐसा ही प्रश्न था जैसे मोदीजी की अमेरिका यात्रा के समय एक पत्रकार ने लोगों से पूछा था कि क्या आप का क्रेज मोदीजी को लेकर शाहरूख खान जैसा है? लोगों ने पत्रकार को झिड़क दिया था। लोगों ने कहा कि आप मोदीजी की तुलना शाररूख से करना चाहते हैं? असल में पत्रकार की सोच में केवल ग्लेमर बसता है, वे इससे आगे दुनिया देख ही नहीं  पाते। यही कारण है कि वे मिताली से पूछ लेते हैं कि आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? यह प्रश्न किसी को भी दोयम दर्जा देने में सक्षम है और कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति दोयम दर्जा नहीं पसन्द करता है।

महिला और पुरुष दोनों में ही असीम शक्ति है, किसे अवसर कितने मिले और किसे कितने, बस इसी बात पर सब कुछ निर्भर करता है। जब हम महिला को दोयम दर्जा दे देते हैं तब कुछ महिलाएं तो हैं जो जिद पर आ जाती हैं कि हम दोयम नहीं हैं और वे ऐसे क्षेत्र चुनती हैं जो पुरुष क्षेत्र कहलाते हैं। महिला अपनी यात्रा में चल पड़ी हैं, वे हमारे समाज को बता रही हैं कि अब दोयम दर्जे के दिन लद गये। सभी जगहों से महिला की उपस्थिति की आवाज आ रही है। एक महिला जहाज के यात्रियों को बचा लेती है और न जाने कितनी महिलाएं आत्मविश्वास से भर जाती हैं? कितनों के हौंसले बुलन्द हो जाते हैं! हम जैसे लिख्खाड़ भी उमंग से भर जाते हैं कि हौंसले गाली देने में नहीं है, हौंसले तो मन के है। पुरुष गाली देकर अपने बुलन्द इरादों को बताता है, लोग कहते हैं कि जो जितना गाली देता है, वह उतना ही बहादुर  होता है। जबकि मेरी नजर में गाली देना अपनी बुजदिली छिपाने की निशानी है। हम जब विचलित होते हैं तो चिवन्गम खाकर अपनी परेशानी को छिपाते हैं, ऐसे ही गाली देकर भी अपनी बुजदिली को छिपाते हैं। महिला अपने हौंसलों से, सभ्यता के साथ प्रथम दर्जा पाने में सफल हो रही हैं, मन अब महिला पर विश्वास कायम करने लगा है।  मन खुशी से नाच उठता है और गाने लगता है – देखी तेरी चतुराई। 

Tuesday, July 25, 2017

गुटर गूं के अतिरिक्त नहीं है जीवन

#हिन्दी_ब्लागिंग
मसूरी में देखे थे देवदार के वृक्ष, लम्बे इतने की मानो आकाश को छूने की होड़ लगी हो और गहरे इतने की जमीन तलाशनी पड़े। पेड़ जहाँ उगते हैं, वे वहाँ तक सीमित नहीं रहते, आकाश-पाताल की तलाश करते ही रहते हैं। हम मनुष्य भी सारा जहाँ देखना चाहते हैं, सात समुद्र के पार तक सब कुछ देखना चाहते हैं। पहाड़ों के ऊपर जहाँ और भी है, उसे भी तलाशना चाहते हैं। मैं एक नन्हीं चिड़िया कैसे उड़ती है, उसे देखना चाहती हूँ, एक छोटी सी मछली विशाल समुद्र में कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है, उसे देखना चाहती हूँ। रेत के टीलों पर कैसे एक केक्टस में फूल खिलता है. उसे महसूस करना चाहती हूँ। मैं वो सब देखना और छूना  चाहती हूँ जो इस धरती पर प्रकृति की देन है। मनुष्य ने क्या बनाया है, यह देखना मेरी चाहत नहीं है। बस प्रकृति कैसी है, यही देखने की चाहना है। लेकिन क्या मन की चाह पूरी होती है? कभी समुद्र की एक बूंद से ही सातों समुद्र नापने का संतोष करना पड़ता है तो कभी एक बीज से ही सारे देवदार और सारे ही अरण्य देखने का सुख तलाश लेती हूँ।
कभी महसूस होता है कि हम जंजीरों से जकड़े हैं, बेड़ियां पड़ी हैं हमारे पैरों में। यायावर की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं लेकिन जीवन ऐसा नहीं करने देता। हम एक गृहस्थी बसा  लेते हैं और उस बसावट में ऐसी भूलभुलैय्या में फंस जाते हैं कि निकलने का मार्ग ही नहीं सूझता। प्रकृति हँसना सिखाती है लेकिन गृहस्थी रोने का पाठ बखूबी पढ़ा देती है। रोते-रोते जीवन कब प्रकृति से दूर चले गया पता ही नहीं चलता। बरसात में सारी गर्द झड़ जाती है, लेकिन समय मन पर ऐसी गर्द चढ़ा देता है कि कितना ही खुरचो, मन की उजास दिखायी ही नहीं देती। कैसी उजली सी है प्रकृति, लेकिन मन न जाने कहाँ खो गया है! उसे छूने का, उसे महसूस करने का मन ही नहीं  होता। हिरण अपनी जिन्दगी जी लेता है, वह कूदता है, फलांग लगाता है, मौर नाच लेता है, कोयल कुहूं-कुहूं बोल लेती है, चिड़िया भी मुंडेर पर आकर चींची कर लेती है, लेकिन मन न जाने किसे खोजता रहता है!

सारी प्रकृति जोड़ों से बंधी है, मोर तभी नाचता है जब उसे मोरनी के साथ होती है, चिड़िया की चींची भी साथी के बिना अधूरी है। प्रकृति कुछ भी नहीं है, बस जोड़ों की कहानी है। हँसना, फुदकना, चहचहाना सभी कुछ एक-दूसरे के लिये है।  लेकिन मनुष्य की बात जुदा है, वह हमेशा दिखाना चाहता है कि मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ, मेरी खुशी अकेले में भी सम्भव है। मैं अकेले में भी चहचहा सकता हूँ। लेकिन यह उसका भ्रम है। जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में भी जो एक-दूजे में खुशी ढूंढते हैं, वे ही खुश रहते हैं। जो खुद की ही खुशी ढूंढते हैं, वे खुश नहीं रह सकते। मनुष्य अकेला चल पड़ता है, उसे लगता है कि वह यायावर बनकर अकेला ही चल सकेगा लेकिन यदि वह भी कबूतर के जोड़े की तरह रहे या उन पक्षियों की तरह रहे जो अपने जोड़ो के साथ सात समुद्र पार करके भी भारत चले आते हैं और यहाँ नया जीवन बसाते हैं,  फिर उड़ जाते हैं। उदयपुर का फतेहसागर सफेद और काले पक्षियों का डेरा है, बड़े-बड़े पंख फैलाते ये पक्षी जीवन को अपने पास बुलाते हैं। हम मनुष्यों को जीवन क्या है, पाठ पढ़ाते रहते हैं। मैं रोज शाम को इनको देखने फतेहसागर चले जाती हूँ, लगता है कि यही जीवन है। यही यायावरी है, ये जब चाहे आकाश में उड़कर उसे नाप लेते हैं और जब चाहें पानी में तैरकर उसकी थाह ले लेते हैं। हम तो बस किनारे से देखने वाले लोग हैं, प्रकृति को आत्मसात नहीं कर पाते, बस दूर से ही देखते हैं और दूर से भी कहाँ देख पाते हैं? यहाँ कितने हैं जिनके जोड़े एक दूसरे के पूरक है? शायद कोई नहीं या शायद मुठ्ठीभर। कभी लगता  है कि मनुष्य ने कितने किले खड़े कर लिये लेकिन अपने साथी का  हाथ नहीं पकड़ पाया। मनुष्य ने पानी में भी दुनिया बसा ली लेकिन साथी का साथ नहीं रख पाया। बिना साथी सबकुछ बेकार है, यह प्रकृति है ही नहीं, यह तो विकृति है और इस विकृति को जीने के लिये मनुष्य कितना अहंकारी बन बैठा है? काश हम भी कबूतर के जोड़े के समान ही होते! गुटर गूं के अतिरिक्त कुछ नहीं है जीवन।

Monday, July 24, 2017

पहल करो – खेल तुम्हारा होगा

#हिन्दी_ब्लागिंग

आओ आज खेल की ही  बात करें। हम भी अजीब रहे हैं, अपने आप में। कुछ हमारा डिफेक्ट और कुछ हमारी परिस्थितियों का या भाग्य का। हम बस वही करते रहे जो दुनिया में अमूमन नहीं होता था। हमारा भाग्य भी हमें उसी ओर धकेलता रहा है। हमारी लड़की बने रहने की चाहत लम्बे समय तक चल ही नहीं पाती थी, आज पूरी कोशिश में लगी हूँ कि महिला होने के सारे सुख अपनी झोली में डाल लूँ। बचपन में सभी खेलते हैं, तो हम  भी खूब खेलते थे, उसमें नया कुछ नहीं था, बस नया इतना ही था कि गुड़िया की शादी कभी नहीं करायी, रसोई-रसोई का खेल कभी नहीं खेला। इसके उलट कंचे खेले, गिल्ली-डण्डा खेला। पहलदूज, रस्सीकूद, गुट्टे यह सब तो रोज का और बारहमासी खेल था। लेकिन जैसे ही क्रिकेट का खेल रेडियो पर सुनायी देने लगा, हम रेडियो से चिपक जाते और जब बेट और बॉल से खेलने लायक हुए तो अपना मैदान तैयार कर लिया। एक टीम भी बना डाली जिसमें लड़के और लड़कियाँ सभी थे। बाकायदा पिच भी बनायी गयी और लोगों के घरों की खिड़की तक गेंद भी पहुंचायी गयी। हमारे घर के परिसर में ही मैदान था तो हमने बना डाला खेल का मैदान। वहाँ क्रिकेट भी होता, बेडमिंटन भी और रिंग भी। खाली जमीन धीरे-धीरे मुनाफे की ओर मुड़ गयी और वहाँ बसावट  होने लगी। शुरू में एक ही घर बसा, लेकिन ना वे खुश और ना हम खुश। राजी-नाराजी के  बाद भी खेल चलता रहा। तो क्रिकेट खूब खेला, स्कूल में नहीं था, नहीं तो वहाँ भी  हम ही होते। वहाँ खो-खो था तो हम थे। खेल के मैदान पर बालीबॉल खिलाड़ी की कमी पड़ी तो हम थे। दो-दो टूर्नामेंट में भी भाग लिया, स्कूल में भी और कॉलेज में भी।

हमने घर पर कोई भी खेल खेला  हो, उसमें लड़के और लड़कियां साथ ही रही। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी ऐसा हुआ हो कि हम हारते हों और लड़के जीतते हों। पता नहीं हमारे साथ कैसे फिसड्डी लड़के खेल खेलते थे! लेकिन कल महिला क्रिकेट देखते हुए लगा कि खेल में महिला और पुरुष कुछ नहीं होता। युद्ध भूमि पर भी नहीं  होता, बस हौंसले चाहिये। हमारे घर के पास ही जयपुर का प्रसिद्ध तीर्थ गलता जी है, हम बचपन से ही रोज वहाँ जाते रहे हैं। गलताजी के दरवाजे पर ही एक अखाड़ा बना हुआ था, पहलवान कुश्ती लड़ते थे और हमारे पिताजी हमें भी उतार देते थे। कबड्डी तो हमारा प्रिय खेल था, रेत के टीलों पर कबड्डी खेलने का आनन्द ही कुछ और था। पतंग तो सभी उड़ा लेते हैं लेकिन लड़कों की तरह पतंग लूटना भी खूब किया। खेल के लिये कभी पिताजी ने मना नहीं किया, ना कभी कहा कि यह लड़कों के लिये है और तुम्हारे लिये नहीं हैं। हमने यह अन्तर जाना ही नहीं। पहली बार टूर्नामेंट में जाने का अवसर मिला जब हम सातवीं में पढ़ते थे, दूसरे शहर जाना था, पता नहीं पिताजी का क्या उत्तर हो? लेकिन उन्होंने मना नहीं किया। कॉलेज में  भी  गये और वहाँ भी राजी-राजी आज्ञा मिली। क्रिकेट का बेट खरीदना हो या बेडमिंटन का रेकेट, पिताजी से पैसे मिल ही जाते थे, लेकिन कभी चूड़ी-बिन्दी के लिये पैसे नहीं मिले। हम हाथों में मेहंदी लगे हाथ, चूड़ी और बिन्दी से सजी लड़की को देखकर मुग्ध  हो जाते थे, सोचते थे कि काश हमें भी अवसर मिलता। लड़कों की तरह जीवन जीने के हिमायती रहे  हमारे  पिताजी तो हमें भी वहीं जीवन जीने का अवसर मिला। वे कहते थे कि स्वेटर बुनने में क्या रखा है? बाजार में खूब मिलेंगे, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार में नहीं मिलेगा। इसलिये कहते थे कि खेलो और पढ़ो। हमने खूब खेला, आज भी बेट देखते ही मन मचल उठता है कि एकाध हाथ तो जमा ही दें। फिर अपनी उम्र का तकाजा देखकर महिला बनने की ओर मुड़ने लगती हूँ। खेल नहीं सकते तो क्या, क्रिकेट और दूसरे खेल देख तो सकते ही हैं, खूब देखते हैं। हमने तो उस पल को भी बहुत गर्व के साथ जीया था जब एशियन गेम्स में भारत प्रथम स्थान पर रहा था। खेलो खूब खेलो, कभी मत सोचो की यह लड़कियों का खेल है या लड़कों का, सारे ही खेल सभी के हैं, बस पहल करो तो खेल तुम्हारा होगा। 

Friday, July 21, 2017

मैं इस बात से आहत हूँ

#हिन्दी_ब्लागिंग
#संजयसिन्हा की एक कहानी पर बात करते हैं। वे लिखते हैं कि मैंने एक बगीचा लगाया, पत्नी बांस के पौधों को  पास-पास रखने के लिये कहती है और बताती है कि पास रखने से पौधा सूखता नहीं। वे लिखते हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा भी होता है?  उनकी कहानियों में माँ प्रधान हैं, हमारे देश में माँ ही प्रधान है और संस्कृति के संरक्षण की जब बात आती है तो आज  भी स्त्री की तरफ ही देश देखता है। पौधों की नजदीकियों से लेकर इंसानों की नजदीकियों की सम्भाल हमारे देश में अधिक है। इसलिये जब लेखक अपने दायरे में सत्य को देखता है और सत्य को ही लिखता है तब उसकी कहानी अंधेरे में भी अपने देश और समाज का परिदृश्य खड़ा करती है। आजतक हम इन कहानियों के माध्यम से ही अपने समाज को समझ सके हैं। लेकिन जब कोई इस कहानी को चुराता है और समझदारी का श्रेय लेने के चक्कर में या पुरुषत्व के हावी होने पर स्त्री के स्थान पर पुरुष को बिठा देता है तब कहानी की आत्मा मर जाती है, देश और समाज की बात से  परे कहानी नकली लगती है। पत्नी जब कहती है कि पौधों को पास रखने से वे बढ़ते हैं तो यह समाज का सच उजागर करते हैं लेकिन जब पत्नी के स्थान पर लेखक स्वयं विराजमान हो जाता है तब कहानी, कहानी नहीं रहती। कहानी चोरी भी करते हो और देश के साथ खिलवाड़ भी, ऐसा नहीं चलेगा।
हम बौद्धिक सम्पदा की चोरी करते हैं, कीजिये आपका  हक है। क्योंकि यह विचार भी हम समाज से ही लेते हैं तो इन पर आपका भी  हक बन ही जाता है लेकिन कम से कम तारीफ का हक तो उसे दे दो जिसने इन विचारों को एक लड़ी में पिरोया है। अभी #संजयसिन्हा ने दर्द उकेरा था कि मेरी कहानियाँ चोरी होती हैं, सभी की हो रही हैं, खुलेआम हो रही हैं। आज भी उनकी एक कहानी को तोड़-मरोड़कर यहाँ परोसा गया, अपना बनाने के चक्कर में मूल भाव में  भी  परिवर्तन कर दिया गया, मन बहुत दुखी हुआ। आप किसी की कहानी उठा लें लेकिन उसके मूल भाव में तो  परिवर्तन ना करें और जब लोग आपकी सोच की तारीफ कर रहे हों तब शर्म खाकर सच लिख ही दें कि यह मेरी कहानी नहीं है।

हम फेसबुक और सोशल मिडिया पर बने रहने के लिए रोज चोरी कर रहे हैं, रचनाओं के मूल भाव को कचरा कर रहे हैं। आप सोच रहे हैं कि मैं बहुत अच्छा कर रहा हूँ  लेकिन आप समाज और देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आप कहानी के मर्म को बदल रहे हैं, स्त्री पात्र के स्थान पर पुरुष पात्र को और पुरुष के स्थान पर स्त्री को रखकर समाज और देश की संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप विदेश की कहानी को भारत के संदर्भ में बना देते हैं, आप देश से खिलवाड़ करते हैं। यह साहित्य ही तो हैं, जिसे पढ़कर हम अपने समाज और देश की मनस्थिति का पता लगाते हैं, लेकिन  हमने चोरी करने के चक्कर में सब गुड़-गोबर कर दिया है। हम एक सांसद को गाली देते हैं कि वह हमारे धर्म का अपमान करता है, उसे सजा मिलनी चाहिये लेकिन हम अपने आप में झांककर नहीं देखते कि  हम क्या कर रहे हैं? हमारा कसूर भी उससे कम नहीं है। आप चोरी करें मुझे आपत्ति नहीं है, क्योंकि यदि आप चोरी को जायज मानते हैं तो करें लेकिन रचना के मूल स्वरूप में बदलाव अक्षम्य अपराध  है। क्योंकि इससे लेखक आहत होता है, ऐसा नहीं है,  लेकिन देश और समाज आहत होता है, मैं इस बात से आहत हूँ।

Thursday, July 20, 2017

सील के ये थूथन

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक दृश्य देखा था, बीत गये न जाने कितने ही दिन लेकिन वह दृश्य आज भी मुझे कुछ लिखने को उकसाता है। मैं दिमाग को झटक देती हूँ लेकिन फिर वह सामने आकर बिराज जाता है। उस दृश्य के क्या मायने निकालूं समझ ही नहीं पाती। किसी भूल-भुलैय्या में ले जाए बिना अपनी बात सीधे रूप में ही कह देती हूँ – समुद्र किनारे एक समुद्री जीव का पूरा दल या हरम आराम कर रहा है। मोटा-ताजा मुखिया मस्ती में अलसाया सा पड़ा है। उसके चारों तरफ 100 के लगभग मादाएं भी अलसा रही हैं। केवल एक नर है, शेष मादा। मुखिया बूढ़ा हो चला है, मोटा-थुलथुल सा है, लेकिन उसी का साम्राज्य इस हरम पर है। तभी क्या देखती हूँ कि एक युवा मादाओं के बीच में जा पहुंचा, लेकिन किसी मादा की हिम्मत नहीं कि उसे अपना साथी बना ले। वह टोह लेता है लेकिन तभी मुखिया को पता लग जाता है और वह अपनी थूथन से उसे भगा देता है। टिप्पणीकर्ता बताता है कि यह सील है, जल और धरती दोनों पर रहती हैं, अनेक प्रकार की होती हैं। ये अपना समूह बनाकर रहती हैं, एक नर सील, ढेर सारी मादाओं को अपने हरम में रखता है और किसी अन्य नर सील की हिम्मत नहीं जो इस समूह की मादा को हाथ लगा ले। उसे मुखिया को हराना होगा तब जाकर वह मादाओं के इस हरम को हथिया सकेगा। ऐसी ही कहानी बन्दरों की भी है और अनेक प्राणियों की है।
देश में ऐसे कितने ही थुलथुले सील हैं, सभी के अपने समूह हैं। वह सील अपने दल के मुखिया हैं, वहाँ दूसरे का प्रवेश वर्जित है। कभी मुझे यह दृश्य बिहार की राजनीति में लालू के दर्शन करा देता है तो कभी उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती दिखायी देते हैं। सील नामक प्राणी के दल के रूप में हरम है लेकिन यहाँ सारा तबका मौजूद है। मुलायम नामक सील की थूथन पर तो लात मारकर युवा अखिलेश विराजमान हो गये लेकिन बिहार में युवा सील के अभी मूछे भी नहीं निकली थी कि उसे दूसरों ने ही पटकनी दे दी। दल में घमासान मच गया है, लेकिन स्थापित सील जस की तस है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक इन सीलों का साम्राज्य है, न जाने किस-किस रूप में ये विराजमान हैं। युवा पीढ़ी का संघर्ष जारी है, कुछ सफल हो जाते हैं और कुछ असफल। बन्दरों का झुण्ड भी मुझे दिखायी देने लगा है, कुछ युवा मासूम बन्दर गुमसुम बैठे हैं, उन्हें किसी मादा का सहचर्य नहीं मिलता, बस जिन्दगी निकल जाती है, यूं ही। थूथन को उठाए मठाधीश अपने साम्राज्य को देखता रहता है और निगरानी रखता है कि कोई युवा वहाँ अनाधिकृत प्रवेश ना कर जाए। बस मुझे चारों तरफ सील के ये थूथन ही थूथन दिखायी देते हैं

Wednesday, July 19, 2017

सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल iifa awards का प्रसारण  हो रहा था। उत्तर भारतीय शादी में और इस कार्यक्रम में कुछ अन्तर नहीं था। हमारे यहाँ की शादी कैसी होती है? शादी का मुख्य बिन्दु है पाणिग्रहण संस्कार। लेकिन यह सबसे अधिक गौण बन गया है, सारे नाच-कूद हो जाते हैं उसके बाद समय मिलने पर या चुपके से यह संस्कार  भी करा दिया जाता है। जितने भी फिल्मों के अवार्ड फंक्शन होते हैं, उनमें भी यही होता है। अवार्ड के लिये एक मिनट और हँसी-ठिठोली के लिये दस मिनट। शादी में सप्तपदी से अधिक महिला संगीत पर फोकस रहता है, यहाँ भी कलाकारों के नृत्य पर ध्यान लगा रहता है।
आप किसी भी शादी में मेहमान बनकर जाइए, बस वहाँ सब नाचते हुए ही मिलेंगे। सारा दिन नाच की प्रेक्टिस चलती है और मेहमान कौन आया और कौन गया किसी को नहीं पता। ब्यूटी-पार्लर भी प्रमुख विषय है, दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने की ललक तो आपके मन में रह ही जाती है, जब पूछो तब – वे पार्लर गए हैं। कल वहाँ भी ऐसा ही हुआ। अवार्ड देते-देते ध्यान आ गया कि ये जो हिरोइनें हैं, इतना सज-धज कर आयी हैं, इनकी ड्रेस की भी नुमाइश लगा ही दी जाए। बस एंकर के मन में आया और खेल शुरू, किसकी ड्रेस सुन्दर का खेल, खेल लिया गया।
अवार्ड फंक्शन में फिल्म के प्रमोशन भी होने लगे हैं, जिसकी भी नयी फिल्म आ रही है, वह स्टेज पर आता हैं और अपनी-अपनी तरह से प्रमोशन करता है। हमारे यहाँ शादियों में ऐसा खेल तो नहीं होता लेकिन नये जोड़े  बनने का खेल खूब होता है। लड़के-लड़की ने कब आँख मटक्का कर लिया पता ही नहीं  चलता या फिर माता-पिता ने कब किसके लड़के या लड़की को देखकर पसन्द कर लिया, यह हमेशा का खेल है।

इसलिये शादी केवल सप्तपदी नहीं है, बहुआयामी समारोह है, ऐसे ही अवार्ड फंक्शन केवल पुरस्कार देना नहीं है अपितु पूरा फिल्मी मनोरंजन है। कौन नया कलाकार छाने की कोशिश में है और कौन पुराना अब स्थापित होकर अपनी जगह बना चुका है, सारे ही खेल होते हैं। बस एक बात ध्यान  देने की है कि जो किसी विशेष समूह से जुड़ जाता है, वह शीघ्र  ही ऊँचाई छूने लगता है और जो नहीं जुड़ पाता वह शायद अंधेरे में खो जाता है। इसलिये कुछ लोग अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं। मेरी छतरी के नीचे आ जा का खेल चलता रहता है। कभी कपूर खानदान की छतरी विशाल थी अब कई छतरियाँ तन गयी हैं और ऐसे समारोह ही तय करते हैं कि किसकी छतरी में कितनी सुरक्षा है। जिसने इन छतरियों को पहचान लिया बस वह सुरक्षित हो जाता है। कल की एक बातचीत – तू अपने बाप के कारण है, वरूण धवन से कहा गया। वरूण ने पलटकर कहा कि सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है। तभी कर्ण जौहर ने स्वयं कह दिया कि मैं भी अपने  बाप की बदौलत हूँ। 

Tuesday, July 18, 2017

लड़ना क्या इतना आसान होता है?

#हिन्दी_ब्लागिंग

लड़ना क्या इतना आसान होता है? पिताजी जब डांटते थे तब बहुत देर तक भुनभुनाते रहते थे, दूसरों के कंधे का सहारा लेकर रो  भी लेते थे लेकिन हिम्मत नहीं होती थी कि पिताजी से झगड़ा कर लें या उनसे कुछ बोल दें। माँ भी कभी ऊंच-नीच बताती थी तो भी मन मानता नहीं था, माँ को जवाब भी दे देते थे लेकिन बात-बात में झगड़ा नहीं किया जा सकता था। ऐसा ही हाल भाइयों के साथ था। नाते-रिश्तेदार, परिचित सभी के साथ कुछ ना कुछ तो मतभेद हो ही जाता था लेकिन झगड़ें की जब नौबत आती थी तब हौंसले पस्त हो जाते थे। नौकरी में भी कभी-कभार झगड़ा कर लेते थे लेकिन रोज-मर्रा यह सम्भव नहीं होता था। बस एक जगह है जहाँ आप रोज झगड़ा करने के लिये स्वतंत्र हैं। रोज कहना भी ठीक नहीं, हर पल आपके पास यह सुविधा उपलब्ध है और दुनिया का हर व्यक्ति इस सुविधा का प्रयोग करता ही है। जिसके पास भी एक अदद पति है या पत्नी है, उसे भला कौन रोक सकता है, इस सुविधा का लाभ लेने से? गर्मी हो या सर्दी, भरी बरसात हो या खिलता हुआ वसन्त, झगड़े के  बहाने अपने आप निकल आते हैं। मजेदार बात यह है कि झगड़ा भी कर लो और दूसरे ही क्षण हँस भी दो। हौसला बनाने में यह रिश्ता बहुत काम आता है, जिसने इस  रिश्ते की कद्र नहीं की और अभी तक अकेला है, वह हमेशा डरा हुआ ही रहता है।

एक किस्सा याद अ गया। मेरी एक मित्र के घर मैं गयी थी. वहाँ तमाशा पूरी स्पीड से चल रहा था। सारा ही घर हँस-हँसकर लौटपोट हो रहा था। मेरी मित्र ने बताया कि अभी कुछ देर पहले हमारी पड़ोसन आयी और चूड़िया फोड़कर चले गयी। जबरदस्त गुस्से में थी, बस आज के बाद पति से सारे ही सम्बन्ध समाप्त। लेकिन यह क्या, अभी कुछ ही देर बीती होगी कि देखा सज-धज कर कहीं जाने की जुगाड़ में है। हमने पूछा कि क्या हुआ, कहाँ जा रही हो? हँसकर बोली की पति के साथ पिक्चर देखने जा रही  हूँ। अब कर लो बात। 

Monday, July 17, 2017

कश्मीर मोसुल की राह पर

#हिन्दी_ब्लागिंग
कल इराक का शहर मोसुल एक चैनल पर दिखाया जा रहा था। इस्लामिक स्टेट का कब्जा अब खाली करवा लिया गया है। लोग वहाँ वापस आ रहे हैं, धरती को चूम रहे हैं। वहाँ के लगभग 10 लाख लोगों को वापस बसाया जाएगा। एक-एक घर खण्डहर में बदल चुका है, उसे वापस खड़ा करना कितना कठिन होगा? मोसुल की दशा देखकर कश्मीर दिखायी देता है, क्या इसके भाग्य में भी मोसुल जैसा विनाश लिखा है? जब मोसुल में इस्लामिक स्टेट घुसा था तो लोगों को एतराज नहीं हुआ होगा, शायद उनका स्वागत भी किया होगा। जेहाद धर्म का हिस्सा है और इसका स्वागत तो करना ही चाहिये। कश्मीर में भी आज यही हो रहा है, जेहाद के नाम पर इस्लामिक स्टेट अपने पैर पसार रही है और बची-खुची कश्मीरीयत उनका स्वागत कर रही है। कश्मीरी सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं और आतंकियों का फूलों से स्वागत कर रहे हैं। एक दिन यह जन्नत जहन्नुम में बदल जाएंगी तब समझ आएगा कि हमने क्या कर डाला है?
सीरीया कभी जीरे का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश था, आज नष्ट हो रहा है। हम भी कहेंगे कि केसर की घाटी केसर विहीन हो गयी है। कश्मीर के वाशिंदे तो जेहाद की अफीम चाटकर पत्थर फेंकने में मशगूल हैं लेकिन शेष देशवासी तो मोसुल को देख रहे हैं, उन्हें तो कश्मीर को बचाने के लिये आगे आना होगा। वहाँ की कश्मीरीयत तो कश्मीरी पंडितों के साथ ही पलायन कर गयी थी, अब जो शेष है केवल सम्प्रदाय विशेष है। यह सम्प्रदाय यदि जिहाद के रंग में रंग गया तो कश्मीर को मोसुल बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। अभी भी समय है, चेत जाओ। मोसुल के नागरिक अपने शहर लौट रहे हैं, धरती पर माथा रगड़ रहे हैं, उसे प्रणाम कर रहे हैं। कल तक कहते थे कि यह धरती हमारी माँ नहीं है, हम किसी देश को माँ का दर्जा नहीं दे सकते, आज मोसुल वासी धरती पर माथा रगड़ रहे हैं। यदि अपना देश है तो हम है, जिस दिन अपना देश छूटेगा, उस दिन हम उस चूहे की तरह हो जाएंगे जिसे उड़ती चील अपने पंजों में दबोच लेती है। कश्मीर पर संकट मंडरा रहा है, उसे समय रहते मोसुल बनने से रोकना होगा।

Friday, July 14, 2017

नाम शबाना

www.sahityakar.com
अभी दो दिन पहले एक फिल्म देखी – नाम शबाना। शायद आप लोगों ने देखी होगी और हो सकता है कि नहीं  भी देखी होगी, क्योंकि इस फिल्म की चर्चा अधिक नहीं हुई थी। फिल्म बेबी की चर्चा खूब थी, यह उसी फिल्म का पहला भाग था,  लेकिन शायद बना बाद में था। खैर छोड़िये इन बातों को, मूल विषय पर आते हैं। एक लड़की है – शबाना, उसकी माँ रोज ही अपने पति से पिटती है। एक दिन माँ चिल्ला उठी – शबाना – शबाना-शबाना। अब शबाना ने एक रोड उठायी और अब्बा के सर  पर दे मारी, अब्बा वहीं ढेर हो गये। नाबालिग शबाना को पुलिस ले जाती है और तभी एक फोटो क्लिक होती है – खचाक। नाबालिग होने से शबाना छूट जाती है और कॉलेज में प्रवेश लेती है, वहाँ कराटे क्लास में जाती है – फोटो खिंचती है – खचाक। उसके हर तेवर की फोटो खिंचती है। एक दिन रात को अपने मित्र के साथ आ रही थी कि कुछ गुण्डे घेर लेते हैं, मित्र कुछ नहीं करने की सलाह देता है लेकिन वह नहीं मानती और गुण्डों को मारती है, लेकिन तभी एक गुण्डा उसके मित्र को सर पर वार करता है और वह वहीं मर जाता है। गुण्डे  भाग जाते हैं, पुलिस आती है। तीन माह तक वह पुलिस के चक्कर काटती है लेकिन केस आगे नहीं बढ़ता। वह फिर तेवर दिखाती है और पुलिस कहती है कि अब यहाँ मत आना। तभी उसके पास फोन आता है कि तुम इस केस में क्या चाहती हो? वह कहती है कि मैं उस लड़के को मारना चाहती हूँ। सामने से आवाज आती है कि ठीक, हम तुम्हारी सहायता करेंगे लेकिन बदले में तुम्हें हमारे लिये काम करना होगा। हम भी सरकार की गुप्त पुलिस हैं। हमारे पास वर्दी नहीं होती, हमें गुमनामी में ही जीना होता है और गुमनामी में ही मरना होता है। शबाना उनका प्रस्ताव मानती है और वह शामिल हो जाती है, इस गुमनाम पुलिस में। बेबी फिल्म में भी शबाना थी।

फिल्म में बताया गया है कि प्रधानमंत्री की देखरेख में ऐसी स्पेशल सेल का गठन किया गया  है, जो अपराधियों को चुपचाप समाप्त करे। काश यह फिल्म ही ना हो लेकिन सच्चाई भी हो। वैसै ऐसे दल हमेशा से सरकारों के काम के हिस्से रहे हैं, लेकिन कई सालों से ये निष्क्रीय हो गये थे, अब शायद वजूद में आए हैं। वर्तमान परिस्थितियों के देखते हुए, जहाँ राजनीति देश में आग लगाने कि परिस्थितियां पैदा करती है, ऐसे विकल्पों पर काम होना ही चाहिये। जो युवा कानून हाथ में लेने का हरदम प्रयास करते हैं, उनको ऐसी सेवाएं देनी ही चाहिये। शबाना का चयन भी हजारों लोगों में से हुआ था, उसके तेवरों को देखकर उसकी फोटो खेंची जा रही थी और समय आने पर उसका चयन किया गया था। जो लोग जोश खाते रहते हैं, उन्हें अपनी सेवाएं देने के लिये सरकार से निवेदन करना चाहिये और इसके लिये वैसा ही प्रशिक्षण भी लेना चाहिये। आज हजारों नहीं लाखों युवाओं की जरूरत है जो देश और समाज की रक्षा के लिये आगे आएं। एक शबाना से काम नहीं चलेगा, आप सभी को आगे आना होगा, जैसे इजरायल में लोग आगे आए हुए हैं। जब विनाश के लिये युवा आगे आ रहे हैं तो बचाव के लिये भी आगे आना ही होगा।
हिन्दी_ब्लागिंग

Tuesday, July 11, 2017

इस बार सेकुलरवाद की चादर है

www.sahityakar.com
हम सबके पास एक-एक भ्रम हैं, उस भ्रम की चादर ओढ़कर हम चैन की नींद सोते हैं। जैसे ही भ्रम की चादर हम ओढ़ते हैं, हमारा सम्बन्ध शेष दुनिया से कट जाता है, तब ना हमारे लिये देश रहता है, ना समाज  रहता है और ना ही परिस्थिति। याद कीजिए जब सिकन्दर आया था, तब हमारे पास कौन सी चादर थी? ज्ञान की चादर ओढ़कर हम बैठे थे, देश लुट रहा था, कत्लेआम हो रहा था लेकिन हम ज्ञान की चादर की छांव में आराम से बैठे थे। लूट लो जितना लूटना हो इस देश को, हमारा ज्ञान तो नहीं लूट पाओंगे। कभी गजनी आया और कभी बाबर आया, हमने फिर नये भ्रम की चादर ओढ़ ली। हम मोक्ष पाने के मार्ग पर आरूढ़ थे और गजनी और बाबर हमारी आस्था के स्थानों को विध्वंश कर रहे थे। हमने चादर नहीं उतारी। औरंगजेब ने एक-एक मन्दिर की एक-एक मूर्ति को खण्डित कर दिया लेकिन हमारी चादर नहीं उतरी। अंग्रेज आये, उन्होंने चादर ही खींच डाली, सारे मुखौटे भरभराकर गिर गये। उन्होंने कहा कि इस देश को चादर ओढ़कर रहने का बड़ा शौक है, ऐसा करते हैं कि इनकी चादर ही बदल देते हैं, उन्होंने अपनी चादर ओढ़ा दी, हम फिर भी खुश थे। अब नयी चादर ओढ़कर खुश थे, ज्ञान की नयी चादर  पाकर हम बेहद खुश  हो गये, हमें अपनी ही  पुरानी चादर बेकार लगने लगी। खण्डित मूर्तियों के स्थान पर उन्होंने ईसा की मूर्ति पकड़ा दी, हम और खुश हो गये। हमारा इतिहास बदल दिया, हमारी खुशी जारी रही।
लेकिन कुछ लोग थे, ये कुछ लोग इतिहास में हमेशा रहते हैं, कभी ये सफल हो जाते हैं और कभी असफल। सफल तब हो पाते हैं, जब चादर ओढ़े लोगों की चादर उतारने में सफल होते हैं, जब ये लोगों की चादर नहीं उतार पाते तो ये कुछ लोग असफल हो जाते हैं। इन लोगों ने सिकन्दर के जमाने में भी प्रयास किये थे, देश को बचा तो लिया था लेकिन अधिक देर तक चादर को समेट कर नहीं रख पाए। हमने तब मोक्ष की चादर तगड़ी ओढ़ ली थी, हमें इस देश से क्या, हम तो मोक्ष के अधिकारी बनेंगे, बस चादर ओढ़कर बैठ गये। अंग्रेजों के अत्याचारों ने इनकी चादर में छेद कर दिये और ये उन कुछ लोगों का साथ देने लगे। एक दिन हम नये देश के साथ जीने के लिये आजाद हो गये थे। जैसे ही आजाद हुए, हमें चादर की फिर याद आ गयी। अब तो हमारे  पास दो चादर थी, एक अंग्रेजियत की और दूसरी अपनी वही पुरानी वाली। चादर के कई स्वरूप हो गये, किसी के पास धर्म की  चादर, किसी के पास साहित्य की चादर, किसी के पास पत्रकारिता की चादर, किसी के पास समाज सेवा की चादर। बस चादरे ही चादरे दिखायी देने लगी, देश इन चादरों की भीड़ में कहीं छिप गया। सभी कहते थे कि हमारी चादर से बड़ा देश नहीं हो सकता। ये कुछ लोग सावचेत करने में लगे हैं कि खतरा मंडरा रहा है, देखो और समझो, लेकिन कोई नहीं सुन रहा। सभी इसी भ्रम में हैं कि भला हमें क्या खतरा है? खतरा होने पर जरूरी हुआ तो चादर बदल लेंगे लेकिन अपना भ्रम नहीं तोड़ेंगे।

कल मोसुल शहर इराक के सैनिकों ने आतंकियों से वापस जीत लिया, लेकिन किसे जीत लिया! खण्डित शहर को! आबादी को पहले ही मौत के घाट उतार दिया गया था। मोसुल शहर के वासी  तो अपने धर्म की चादर ओढ़े ही बैठे थे फिर क्यों समाप्त हो गये वे सब? कश्मीर में अब मौसुल जैसा ही खेल खेला जा रहा है, कश्मीरियों के हाथों में पत्थर पकड़ा दिये गये हैं, कुछ हथियार भी दे दिये हैं, चलाओ और मरो या मारो। किसी दिन कश्मीर भी कब्रिस्तान बन जाएगा तब कश्मीर वालों की चादर उतरेगी या अन्तिम चादर चढ़ जाएगी? बंगाल में भी नरसंहार की तैयारी कर ली गयी है, यहाँ का तो पुराना इतिहास है, लेकिन इतिहास कौन पढ़ता है? मनोरंजन के इतने साधन हैं, उन से तो फुर्सत मिलती नहीं, आप इतिहास पढ़ने की  बात करते हैं? अब हमने बड़ी मुश्किल से तो मनोरंजन की चादर ओढ़ी है, ओढ़े रहने दीजिये। इतिहास के वे कुछ लोग समझा रहे हैं कि अपनी चादर उतार फेंको लेकिन इस बार कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कह रहे हैं कि नहीं चादर मत उतारना, भ्रम की यह चादर बनी रहनी चाहिये। कट जाना लेकिन भ्रम बनाये रखना कि हम सेकुलर हैं। न जाने कितने मौसुल, कितने कश्मीर और कितने बंगाल बिल्ली की नजरों में हैं, लेकिन हम चादर ओढ़े खरगोश हैं। इस बार सेकुलरवाद की चादर है। 

Sunday, July 9, 2017

कम्यूनिज्म जीतता है या फिर बौद्धिज्म


मोदीजी! यह नहीं चलेगा। हम कितनी मेहनत करके एक कहानी बनाते हैं, चीख-चीखकर दुनिया को सुनाते हैं। लोगों में विश्वास भर देते हैं कि हम जो कह रहे हैं, ऐसा ही होने जा रहा है। अब कल की ही बात ले लीजिए, हम मीडिया के लोगों ने चीन से युद्ध तक की स्थिति बना दी थी। लगा था कि बस अब युद्ध होकर ही रहेगा। जनता भी दो खेमों में बंट गयी थी, एक खेमा कह रहा था कि युद्ध हो ही जाने दीजिये तो दूसरा कह रहा था कि युद्ध हुआ तो हमें नुक्सान होगा। ताबड़तोड़ चैनल चल रहे थे, मेप बना-बनाकर समझाया जा रहा था लेकिन कल आपने सारा खेल बिगाड़ दिया। आप चीन के राष्ट्रपति से हँस-हँसकर मिल रहे थे, खबर यह भी आ  रही थी कि चीन ने छोटी मीटिंग के लिये निवेदन भी किया है। और तो और चीन ने भी आपके रूख की तारीफ कर डाली। अब फिर चिल्ल-पों मचेगी कि क्या चीन आतंक के खिलाफ खड़ा होगा?
हम जब भी अमेरिका जाते हैं तो हमसे पूछा जाता है कि साथ में कोई बीज तो नहीं है? यदि किसी प्रकार का बीज साथ होगा तो आप उसे अमेरिका में उगा लेंगे और वह अमेरिका के हित में नहीं होगा। चीन भी आतंक की खेती नहीं करता, वह किसी बीज को अंकुरित होने की वजह ही नहीं देता। हम आतंक को खाद-पानी सभी देते हैं फिर आतंक को खत्म करने के लिये चिन्तित  होते हैं लेकिन चीन ने सारे ही खाद-पानी बन्द कर दिये हैं। वह आतंक का साथ नहीं दे रहा अपितु पाकिस्तान का साथ दे रहा है। एक मूर्ख देश यदि कुछ टुकड़े डालने पर ही दुम हिलाता रहे तो क्या बुराई है?
दो उभरते हुए पहलवान अपने-अपने दमखम को बढ़ा रहे  हैं, मुझे कोई  बुराई नहीं दिखायी देती। जिस देश की अधिकांश जनसंख्या बौद्ध हो, वह हमारे नजदीक ही आएगा। मोदीजी इसी भाव को बार-बार उकेरते हैं और इसी भाव के साथ हाथ मिलाते हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि देश में ही ऐसे बहुत सारे तत्व हैं जो इस भाव को पीछे धकेलते रहते हैं। हम सब बौद्ध आयाम को भुला देते हैं और बस याद रहता है तो कम्युनिज्म। जब भी कोई  हमारी संस्कृति याद दिलाता है तो मन में हिलोर उठती ही है। एक बार मैंने एक वरिष्ठ प्रचारक से कहा कि आप लोग हमेशा यह बताते हैं कि यह खतरा है और वह खतरा है। लेकिन कभी यह नहीं बताते कि इन खतरों को कम करने के लिए हमारे क्या प्रयास हैं? तब उन्होंने विस्तार से समझाया था कि हम चीन समेत विश्व के सारे बौद्धों को एक करने में लगे हैं। यदि हम सफल होते हैं तब भारत की ताकत सबसे अधिक होगी। मोदीजी का इसी सांस्कृतिक एकता पर बल है। इस एकता की पहल कभी गुजरात में झूला झूलते हुए होती है तो कभी चीन में जिनपिंग के शहर और मोदी को शहर का इतिहास टटोलते हुए होती है तो कभी मानसरोवर की यात्रा प्रारम्भ करते हुए होती है।

ऐसे सेकुलर जो "भारत तेरे टुकड़े होंगे" बोलने वालों के साथ खड़े रहते हैं, जो पाकिस्तान और चीन को एक होते देखते हैं, जो मोदी से इतनी नफरत करते हैं कि उन्हें गुलामी मंजूर है लेकिन मोदी नहीं। इसलिये ये देश को डराते रहते हैं कि मोदी के कारण चीन युद्ध कर देगा। मित्रों मैं तो मोदी पर विश्वास करती हूँ और इसलिये दावे से कहती हूँ कि बाजीराव की चाल पर और मोदी की सोच पर कोई शक नहीं। वे चीन को तुरप के इक्के से साध लेंगे। बौद्ध और हिन्दू सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं, इन्हें साथ आना ही होगा। अब देखना है कि कम्यूनिज्म जीतता है या फिर बौद्धिज्म। मोदीजी देश को ऐसे ही हैरत में डालते रहेंगे, हम भक्तगण खुश होते रहेंगे और सेकुलर बिरादरी हाय-हाय करती रहेगी। देखते रहिये, दुनिया करवट ले रही है, अभी बहुत कुछ देखना और समझना शेष है। 

Friday, July 7, 2017

चक्कर देता साहित्य

जब मैं नौकरी में थी तब का एक वाकया सुनाती हूँ। कॉपियों का बण्डल सामने था और उन्हें जाँचकर भेजना भी था। लेकिन कहीं से भी आशा की किरण दिखायी नहीं दे रही थी। अब कितनों को फैल करेंगे? आखिर बेमन से जाँच होने लगी, लेकिन यह क्या! एक कॉपी पर कुछ वाक्य पढ़े गये, वही वाक्य बार-बार दोहराए जा रहे थे। लगा कि कुछ ठहरना ही पड़ेगा। छात्र की चालाकी देखिये कि उसने 3-4 वाक्य अनर्गल से ले लिये थे और उन्हें वह बार-बार लिख रहा था। पूरी कॉपी इसी से भरी थी। सच मानिये कि आधा पेज पढ़ते ही चक्कर आने लगे जैसे घुमावदार रास्ते पर चलते हुए आपको चक्कर आने लगते हैं। ऐसा ही कुछ सोशल मीडिया  पर हो रहा है। आप एक-एक शब्द को अच्छी तरह से पढ़ लीजिये लेकिन क्या मजाल जो आपको समझ आ जाए कि बन्दा/बन्दी कहना क्या चाह रही है। आप उसके मन की थाह पकड़ ही नहीं सकते। मैं सारा दिन पेज पलटती हूँ लेकिन बस कुछ लोग ही समझ आते हैं। मैं गैंहू में से कंकर नहीं अपितु कंकर में से गैहूँ निकालती हूँ।
ब्लाग पर वापस आओ कि राम-धुन चल रही है, मैं वहाँ पहले भी जाती थी और अब भी जा रही हूँ लेकिन गोल-गोल घुमावदार पहाड़ियों से  ही सामना होता है। कुछ लोग अभी भी असहिष्णुता के दौर में ही चल रहे हैं और अब गोल-गोल घूमकर अपनी बात कह रहे हैं। इस गोलाई के कारण कोई सिरा पकड़ में ही नहीं आता। साहित्य के जितने आयाम है, उनका उपयोग सभी करते हैं, लेकिन जो सबसे जरूरी वस्तु है, बस वही गायब है। साहित्य में यदि सामाजिक सरोकार ना हो तो वह कुछ भी नहीं है। लेकिन यहाँ का लेखक सबसे अधिक समाज से ही भाग रहा है, वह लिखना ही नहीं चाह रहा है, समाज का सच। उसने कपोल-कल्पित कहानियां गढ़ ली हैं, जो शायद ही किसी समाज की हो, उसे थोपने को ही साहित्य समझ बैठा है। प्रेम तो ऐसे टपक रहा है जैसे इस संसार में नर-मादा के प्रेम के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं। नर-मादा का प्रेम नहीं होता यह तो प्रकृति जन्य है, प्रेम तो हमारे अन्दर का वह भाव है जो प्राणी मात्र के लिये  होता है। यहाँ एक हिंसक व्यक्ति या हिंसक समूह को भी इंगित नहीं किया जाता अपितु कहा जा रहा है कि तू ही हिंसक नहीं है, देख हम सब भी हिंसक है।

ऐसा साहित्य जो लोगों को दिशा ना दे सके, ऐसा साहित्य जो केवल भ्रमित करे, ऐसा साहित्य जो पाप और पुण्य को एक तराजू पर तौले, उसे कैसे साहित्य कह सकेंगे? मनोरंजन के लिये भी साहित्य  होता है और उसमें भी समाज की मनोदशा झलकती है। लेकिन यहाँ तो उसे भी घुमावदार रास्तों का खेल बना दिया गया है। जो बात पुरुष पर लागू होती है वह स्त्री पर लागू कर दी गयी है और जो स्त्री पर लागू होती है, वह पुरुष पर। सोशल मीडिया ना हुआ, आजादी हो गयी। हर कोई नारे लगा रहा है – हमें चाहिये आजादी। सारा दिन इन गलियों में घूमकर केवल खाक छानी जा रही है, भूसे से सुई ना कल मिली थी और ना आज मिल रही है। क्या इस भीड़ को भी कोई नियन्त्रित कर सकता है? क्या यहाँ भी कोई समीक्षक पैदा हो सकते हैं? या फिर वाह-वाह के समूहों में ही सिमटकर रह जाएगा, सोशल मीडिया का लेखन। 

www.sahityakar.com 

Wednesday, July 5, 2017

मोदी का मोशा से क्या रिश्ता है?

मोदी बनना सरल नहीं है। जो लोग मोदी को राजनैतिक चश्मे से देखते हैं, वे मोदी के लिये जौहरी नहीं हो सकते। मोदी की राजनीति, अव्यवस्था पर प्रहार करती है, मोदी की राजनीति, अकर्मण्यता पर प्रहार करती है, मोदी की राजनीति, आतंक  पर प्रहार करती है। मोदी व्यवस्था को सुचारू करना चाहते हैं, मोदी आम और खास को कर्तव्य का पाठ पढ़ाना चाहते हैं, मोदी देश को सुरक्षित करना चाहते हैं। मोदी के हिस्से हजारों काम है, मोदी हजार प्रकार से सोचते हैं, मोदी हजार  प्रकार से काम करते हैं। उनकी कार्यशैली को कोई नहीं समझ पाया है। वे एक जगह  रहते हुए भी  हजार जगह होते हैं। लेकिन उनके हर काम में मुझे एक बात समान दिखायी देती है और यही बात उन्हें सभी से अलग करती है। राजनेता अनेक हुए हैं, एक से एक कूटनीतिज्ञ भी  हुए हैं। दुनिया ने उनका लोहा माना है, ऐसे भी अनेक हुए हैं। लेकिन एक खास बात है – मोदी में, जो शायद ही किसी में हो। मैं हमेशा उनके उसी पक्ष को देखती हूँ और अभिभूत हो जाती हूँ। शायद उनके विरोधी इस पक्ष को ना देख पाते हों,  फिर उन्हें यह पक्ष एक ढोंग लगता हो। लेकिन मुझे नहीं लगता, क्योंकि व्यक्ति एक बार ढोंग कर सकता है, दो बार कर सकता है लेकिन हर बार नहीं कर सकता। फिर ढोंग करने के लिये भी तो सोच होनी चाहिये। कहाँ ढोंग करना है, इसका विवेक भी तो होना चाहिये।
मोदी इजरायल जाते हैं, अनेक कार्यक्रम में उलझे हैं। 70 साल से प्रतीक्षित रिश्तों के कई ताने-बाने बुनने हैं। लेकिन मेरे लिये एक बात खास बन जाती है। सीधे दिल पर आकर लगती है। एंकर बता रहा है कि वे मोशा से मिलेंगे। मेरी उत्सुकता बढ़ती है कि मोशा कौन है! शायद कोई होनहार बच्चा होगा! लेकिन एंकर  बता रहा है कि मोशा वह बच्चा है जो 26/11 के मुम्बई हमले में अपने माता-पिता को खो देता है। माता-पिता यहूदी हैं और उनका यही सबसे बड़ा जुर्म है कि वे यहूदी हैं। आतंक के सहारे सम्प्रदाय का विस्तार करने वाले, मोशा के सारे परिवार को मौत के घाट उतार देते हैं। नन्हा दो साल का मोशा अपनी हिन्दुस्तानी आया की दूरदर्शिता से बच जाता है। आज वह अपने दादा-दादी के पास इजरायल में है। अब वह 10 साल का हो गया है। भारत का यह अनोखा प्रधानमंत्री मोशा से मिलने जा रहा है, साथ ही उस आया से भी मिलने जा रहा है। मोदी अपने रिश्ते परिवार की भावना से जोड़ते हैं, वे राजनीति को भी परिवार से ही साधते हैं। तभी तो नवाज शरीफ की माँ के लिये भी शॉल लेकर जाते हैं और उनके चरणों में प्रणाम भी करते हैं। मोदी बता देना चाहते हैं दुनिया को कि भारत में वसुधैव कुटुम्बकम् की बात केवल राजनीति के लिये नहीं कही थी, वे दिल से सभी को परिवार मानते हैं, तभी एक नन्हें बच्चे से जाकर मिलते हैं। क्योंकि वे मानते हैं कि उनके देश में ही इस बच्चे का संसार उजड़ा था और इसके साथ दर्द का रिश्ता जोड़ लेते हैं। वे मानते हैं कि माँ हमेशा वन्दनीय होती है फिर चाहे शत्रुता निभा रहे पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री की ही माँ क्यों ना हो।

बस मोदी इन्हीं बातों से दिल में जगह बना लेते हैं। उनका भावुक होना ही उन्हें महान बनाता है। आप इसे कुछ भी नाम दें लेकिन मेरे लिये मोदी संवेदनशीलता का नाम है। ऐसी संवेदनशीलता जो परिवारों के रक्त सम्बन्धों में दौड़ती है, ऐसी संवेदनशीलता जो अपनी जाति और देश के लिये दौड़ती है, ऐसी संवेदनशीलता जो सम्पूर्ण प्राणी मात्र के लिये दौड़ती है। मैं इसी संवेदनशीलता के कारण उन्हें प्रणाम करती हूँ। 
#हिन्दी_ब्लागिंंग 

Tuesday, July 4, 2017

कल के नरेन्द्र का मूर्त रूप

#हिन्दी_ब्लागिंग
नेकनामी और बदनामी, दोनों का चोली-दामन का साथ है। जैसे ही किसी व्यक्ति की कीर्ति फैलने लगती है, उसी के साथ उसको कलंकित करने वाले उपाय भी प्रारम्भ हो जाते हैं। दोनो में संघर्ष चलता है लेकिन जीत सत्य की ही होती है। आज 4 जुलाई को ऐसे ही सत्य का स्मरण हो रहा है। 11 सितम्बर 1893 को जब विवेकानन्द जी को अपने शिकागो भाषण के कारण नेकनामी मिली तो कुछ लोगों ने उनके प्रति दुष्प्रचार प्रारम्भ कर दिया। कलकत्ता के अखबार रंग दिये गये, उनका हर सम्भव प्रकार से चरित्र हनन किया गया। नेकनामी और बदनामी का संधर्ष चलता रहा लेकिन अन्त में सत्य सामने आ गया।
जब ऐतिहासिक नरेन्द्र को देखती हूँ तो वर्तमान नरेन्द्र इतिहास बनाते दिखायी देने लगते हैं। एक सी परिस्थितियाँ दिखायी देती हैं, एक से संघर्ष दिखायी देते हैं। अनेक लोग दिखायी दे रहे हैं इनके अपयश की कामना लिये। लेकिन जैसे विवेकानन्द नहीं रूके थे वैसे ही अभी के नरेन्द्र नहीं रूक रहे हैं। जितनी तेजी से वे आगे बढ़ते हैं लोग उतनी तेजी से प्रहार करना शुरू करते हैं, मानो उनकी जीत सुनिश्चित करने में अपना योगदान दे रहे हों। सोने को निरापद किया जा रहा है। जब हम धूप में चलते हैं तब हमारी काली छाया साथ चलती ही है। लेकिन जैसे ही संघर्ष रूपी धूप थमती है तब काली छाया का अवसान हो जाता है। नरेन्द्र भारत के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिये अनथक चल रहे हैं, वे अमर बेल को जड़ से उखाड़ रहे हैं। न जाने कितने पेड़ों को इन अमर बेलों ने अपना शिकार बनाया है, उन्हें चिह्नित करते जा रहे हैं। पेड़ों की सुरक्षा कर रहे हैं।

विवेकानन्द जी का आज निर्वाण दिवस है। उन्होंने सनातन धर्म रूपी सत्य की स्थापना की। उन्होंने व्यक्ति को अपना कर्तव्य पालन करने का संदेश दिया, केवल अपना। वे कहते थे कि केवल आप अपना कर्म कीजिये, दूसरों को बाध्य मत कीजिये। आपके कर्म से ही बदलाव आएगा। यदि दूसरों को बाध्य करेंगे तब केवल संघर्ष होगा। वर्तमान नरेन्द्र भी यही कर रहे हैं, वे स्वयं को बदलने के लिये कह रहे हैं, हम बदलेंगे तभी देश बदलेगा। हम यदि सुनिश्चित कर लें कि कोई भी अनैतिक कार्य जो देश हित में ना हो, हम नहीं करेंगे तो हम सनातन धर्म को पुन: स्थापित कर सकेंगे लेकिन यदि हम नहीं बदले और हमने दूसरों को बदलने के लिये ही शक्ति लगा दी तब कुछ नहीं बदलेगा। अपनी शक्ति का दुरुपयोग मत कीजिये, दूसरे पर शक्ति लगाने से वो और शक्तिशाली होता है, बस सनातन की  बात मानिये। इस देश ने हमें विवेकानन्द जैसे अनेक सन्त दिये हैं, हमारे पास सृष्टि का सनातन ज्ञान है, उसे उपयोगी बनाइये और आज के दिन दोनों नरेन्द्र को स्मृति में रखिये, एक ने विश्व के समक्ष भारत को कल दैदिप्यमान किया था और एक आज कर रहा है। हमने कल के नरेन्द्र को तो नहीं देखा लेकिन हम आज के नरेन्द्र को देख रहे हैं। हमने कल के संघर्ष के भागीदार नहीं बने लेकिन आज अवसर आया है तो भागीदार अवश्य बनेंगे। कल का नरेन्द्र आज मूर्त रूप में उतर आया है, उनके संघर्ष में हम अपनी आहुति अवश्य देंगे। 

Sunday, July 2, 2017

बुजुर्ग हमारे इतिहास की किताब हैं

माँ हमारे बारे में हमें छोटी-छोटी कहानियां सुनाती थी, अब वही कहानियाँ हमारे अन्दर घुलमिल गयी हैं। हमारा इतिहास बन गयी हैं। जब वे सुनाती थी कि गाँव में तीन कोस पैदल जाकर पानी लाना होता था तब उस युग का इतिहास हमारे सामने होता था। माँ अंग्रेजों की बात नहीं करती थी, बस अपने परिवार के बारे में बताती थी और हम उसी ज्ञान को पाकर बड़े हुए हैं। हम जब भी उन प्रसंगों को याद करते हैं तो वे बातें इतिहास बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं। बचपन तक ही हम माँ से अपनी कहानियां सुन सके फिर तो हम स्याणे हो चुके थे और स्वयं को ज्ञानवान भी समझने लगे थे तो भला कौन उन घर-परिवार की बातों को सुने! जमाना तो दुनिया की जानकारी का था तो पिताजी बाहरी ज्ञान दे देते थे। उनके दिये ज्ञान की बदौलत हम कुछ जानकार हो गये थे। लेकिन जब हमें फुर्सत मिली तो महसूस हुआ कि बहुत कुछ छूट गया, फिर हम भाइयों से कहने लगे कि जब भी हम मायके आएं हमें परिवार के किस्से सुनाया करो। लेकिन हमारी इच्छा वे पूरी नहीं कर पाते हैं क्योंकि शायद उन्होंने माँ से वे किस्से सुने ही नहीं तो उन्हें पता ही नहीं कि इन किस्सों से ही इतिहास बनता है। वर्तमान ज्ञान तो सभी के पास है लेकिन विगत का ज्ञान तो बुजुर्गों के पास ही है। 
बुजुर्ग व्यक्ति की क्या अहमियत होती है? हाथ-पैर हिलने लगते हैं, याददाश्त जाने लगती है, कानों से सुनायी नहीं देता, आदि-आदि। परिवार के युवा परेशान होने लगते हैं, वे उन्हें अपने आनन्द का बोझ समझने लगते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि बुजुर्ग व्यक्ति कितना ही बुजुर्ग हो जाए, वह हमारे लिये इतिहास के पन्ने बन जाता है। परिवार का इतिहास, समाज का इतिहास, देश का इतिहास, सारा ही उसके अन्दर होता है, बस हमें पन्नों को उलटने की जरूरत है। मैं जब भी बड़ों के बीच बैठती हूँ तो उनसे यही आग्रह रहता है कि वे कुछ विगत का कथानक सुनाएं। मैं भी कोशिश करती हूँ कि मैं भी बच्चों को उनके परिवार के इतिहास से जोड़ू। यदि हमने इस सत्य को समझ लिया कि बुजुर्ग हमारी किताब हैं, और इनके पास बैठने से हमें विगत का पता लगेगा तो फिर बुजुर्ग कभी बोझ नहीं बनेंगे।
जब मुझे सुनाया जाता है कि मेरा बचपन किस भाई के कंधों पर बैठकर बीता तो मैं प्रेम के धागे से स्वत: बंध जाती हूँ, जब मुझे बताया जाता है कि कैसे पिताजी हमारे लिये सोचते थे कि उनकी संतान डॉक्टर-इंजीनियर ही बने, तो हम गर्व से भर जाते हैं। मैं आजकल लिखकर या बोलकर कहानी सुनाने लगती हूँ, जिससे नयी पीढ़ी और हमारे बीच दूरियाँ कम हो। उन्हे पता होना ही चाहिये कि उनके माता-पिता जो आज समर्थ दिखायी दे रहे हैं, उसके पीछे किसका परिश्रम है। जब तक हम बुजुर्गों को घेरकर नहीं बैठेंगे तब तक पता नहीं लगेगा कि कैसे यह परिवार बना था! जिन बुजुर्गों को हम कबाड़ समझने लगे हैं, जब उनके माध्यम से इतिहास में झांकेंगे तब उनके प्रति श्रद्धा से भर जाएंगे। इसलिये इनका उपयोग लो, इन्हें घेरकर बैठो, जीवन के कितने पाठ अपने आप समझ आ जाएंगे। कैसे माली ने बीज बोया था, कैसे उसने खाद डाली थी, कब कोंपल फूटी थी और कब कली खिली थी? आज जो फूल बनकर झूम रहा है, वह उसी माली की मेहनत है, जिसे तुम अंधेरों में धकेल चुके हो। इसलिये बेकार मत करो इस धरोहर को, इसे यादों के पन्नों में इतिहास बनने दो। यह पीढ़ी दर पीढ़ी हमें हमारी जड़ों से जोड़ता रहेगा और घर में कभी कोई बुजुर्ग घूरे के ढेर में नहीं फेंका जाएगा।

Thursday, June 29, 2017

सुना है तेरी महफिल में रतजगा है


अब जमींदारी नहीं रही, रतजगे नहीं होते। जमींदारों की हवेलियाँ होटलों में तब्दील हो गयी हैं। क्या दिन थे वे? हवेली में सुबह से ही चहल-पहल हो जाती, जमींदार भी चौकड़ी जमाने के लिये शतरंज बिछा देते। उनकी हवेली  पर ही सारे सेठ-साहूकार एकत्र होते। जहाँ जमींदार शतरंज की बाजी से शह और मात का खेल खेलते वहीं छोटे जमींदार तीतर-बटेर को लड़ा देते। जनानी ड्योढ़ी में भी चहल-पहल रहती। सुबह से ही इत्र-फुलेल से लेकर सोने के गहनों का जिक्र हो जाता। नगर में किस घर में सास की चल रही है या बहु बाजी मार रही है, सुबह से चर्चा का बाजार गर्म रहता। कभी कोई किसी की शिकायत ले आता तो कभी कोई किसी को हवेली से ही धकिया देता। एकाध हवेली में तो यह भी हुआ कि तीतर-बटेर की लड़ाई लड़ते-लड़ते जमींदार ही आजीज आ गया और उसने हवेली के दरवाजे ही बन्द कर दिये। लोग जाएं तो कहाँ जाएं? कोई मन्दिर में जाकर बैठ गया तो कोई किसी दूसरी हवेली पर।

जमींदारों पर असली संकट तो तब आया जब जमींदारी ही खत्म हो गयी। नगर में क्रान्ति का बिगुल बज गया। एक समाज सुधारक आंधी की तरह आया और सभी को कहा कि आओ मेरे साथ आओ। अब युवा क्रान्ति के साथ जाने लगे और जमींदार से जुड़े लोग जमींदारी के फायदे बताने लगे लेकिन नुकसान तो हवेली का हो गया। धीरे-धीरे हवेली में सूनापन पसर गया। सभी किसी ने बताया कि अब छोटे फ्लेटों में भी नये-नये खेल होते हैं, वहाँ सोसायटी बनी होती हैं और आप जैसा चाहो वैसा खेल खेल सकते हो। बस फिर क्या था, लोग दौड़ पड़े। अब हवेली में बड़े-बूढ़े ही रह गये। एक दिन फ्लेट वालों ने कहा कि भाई चलो एक बार हवेली देख आएं। जहाँ नाल गड़ी हो, भला वहां की याद किसे नहीं आती, लोग तैयार हो गये, सभी ने कहा कि चलो एक तारीख को चलते हैं। अब एक तारीख को हवेली गुलजार होने वाली है, वापस से शतरंज को मोहरे अपनी बिसात पर बैठेंगे। तीतर-बटेर भी लड़ाए जाएंगे। नाच-गाना भी सारी रात चलेगा। हवेली के रंग रोगन के लिये विशेषज्ञों को भेज दिया गया है। हवेली के रास्ते में किसी ने अपनी दुकान तो नहीं लगा दी, इसके मौका-मुआयना के लिये भी टीम भेज दी गयी है। जमींदार को भी ढूंढा जा रहा है। जनानी ड्योढ़ी में क्या खास होगा, इसकी भी फुसफुसाहट है। मर्दों के बीच मल्ल युद्ध होगा या नहीं, कानाफूसी हो रही है। नये युवा जिन्होंने कभी हवेली का रतजगा नहीं देखा, वे भी ललचा रहे हैं। सारे ही बड़े-बूढ़े कह रहे हैं कि हवेली को चमका दो, फीका कर दो फ्लेट और सोसायटी का चलन। देखते हैं कि हवेली में कितना मन लगता है, क्योंकि आज तक तो यही कहानी है कि जो एक बार गाँव से गया वह वापस नहीं आया, बस शादी-ब्याह के मौके पर ही आना होता है। अपने गाँव में देखें कौन कितने दिन टिकता है,  हमने तो खूंटे गाड़ ही रखे थे। अपने झोपड़े में रोज दिया जला देते थे। अब सुन रहे हैं कि हवेली पर रतजगा है तो हम भी खुश होकर गा रहे हैं – सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।

#हिन्दी_ब्लागिंग

Wednesday, June 21, 2017

संताप से भरे पुत्र का पत्र

कल एक पुत्र का संताप से भरा पत्र पढ़ने को मिला। उसके साथ ऐसी भयंकर दुर्घटना  हुई थी जिसका संताप उसे आजीवन भुगतना ही होगा। पिता आपने शहर में अकेले रहते थे, उन्हें शाम को गाड़ी पकड़नी थी पुत्र के शहर जाने के लिये। सारे ही रिश्तेदारों से लेकरआस-पड़ोस तक को सूचित कर दिया गया था कि मैं पुत्र के पास जा रहा हूँ। नौकरानी भी काम कर के चले गयी थी। अखबार वाले और दूध वाले को भी मना कर दिया गया था। अटेची पेक हो चुकी थी लेकिन तभी अचानक मौत का हमला हुआ, यमराज ने समय ही नहीं दिया और वे पलंग पर ही दम तोड़ बैठे। पुत्र ने फोन किया कि कब निकल रहे हो, लेकिन उत्तर कौन दे! पुत्र ने सोचा कहीं व्यस्त होंगे। रात को फोन किया कि गाड़ी में बैठ गये हैं क्या? लेकिन फिर उत्तर नहीं! सोचा नेटवर्क की समस्या होगी। 48 घण्टे निकल गये, पुत्र का सम्पर्क नहीं हुआ। आस-पड़ोस ने भी घर की तरफ नहीं झांका। तभी अचानक एक परिचित मिलने चले आये, घण्टी बजाई, उत्तर नहीं। पड़ोस में गया, पूछा कि कही गए हैं क्या? पड़ोसी ने कहा कि हाँ पुत्र के पास गए हैं। लेकिन तभी परिचित के दिमाग में कुछ कौंधा, बोला कि यदि बाहर गये हैं तो चैनल गेट कैसे खुला है। अब पड़ोसी को भी लगा कि देखें क्या माजरा है? खिड़की में से जब अन्दर झांका गया तब उस विभत्स दृश्य को देखकर सब विचलित  हो गये। दो दिन में शरीर सड़ चुका था और लाखों मक्खियां उसे नोच रही थीं। सारा परिवार आनन-फानन में एकत्र हुआ लेकिन पुत्र का संताप कौन हरे? वह अपने पत्र में लिख रहा है कि बार-बार फोन करो, अकेले रह रहे पिता की चिन्ता करो, आदि-आदि।
जब इस घटना और पत्र के बारे में मेरी मित्र ने मुझे बताया तो मुझे एक घटना याद आ गयी। माँ होती है ना, उसका दिल धड़कने लगता है, जब भी उसकी संतान पर कोई संकट आता  है। लेकिन संतान बिरली  ही होती है जिसको माता-पिता पर आये संकट का आभास होता है। मेरे देवर दूर शहर में पढ़ रहे थे, उन दिनों फोन की उतनी सुविधा नहीं थी कि हर मिनट के समाचार पता रहे। हमारी महिने में एकाध बार बात होती होगी बस, जब मनी-आर्डर भेजना होता था और एकाध बार और। उन दिनों हमारी माताजी भी हमारे पास आयी हुईं थीं। हमारी नयी-नयी गृहस्थी थी और हमारे पास संसाधन ना के बराबर थे। एक थाली में ही हम सब साथ-साथ खाना खा लेते थे। मैंने देखा कि वे ढंग से खाना नहीं खा रही हैं। दूसरे दिन भी वे अनमनी सी रहीं। फिर मैंने पूछ ही लिया कि क्या बात है? वे  बोली कि राजू की चिंता हो रही है। मैंने पतिदेव से कहा कि एक बार फोन कर लो, चिन्ता दूर हो जाएगी। फोन किया तो चिंता बढ़ गयी। मालूम पड़ा कि अस्पताल में भर्ती है। अब पतिदेव बिना विलम्ब किये रवाना हो गये। हमने माताजी को कुछ नहीं बताया बस कहा कि जाकर देख आते हैं। शहर भी  दूर था, पहुंचने में 20-22 घण्टे लगते थे लेकिन एक माँ की चिन्ता के कारण विपत्ति टल गयी और समय रहते हम सावधान  हो गये।

ये जो हमारे खून के रिश्ते हैं, हमें हमेशा सावचेत करते हैं, बस कभी हम इनकी आवाज सुन नहीं पाते और कभी ध्यान नहीं देते। यदि हमारे दिल का एक कोना केवल अपने रिश्तों के लिये ही खाली रखें तो सात समन्दर पार से भी हिचकी आ ही जाती है। इन धमनियों में जो रक्त बह रहा है, उसमें हमारे रिश्ते भी रहते हैं। धमनी की रुकावट का परीक्षण तो हम करवा लेते हैं लेकिन रिश्ते कहीं हमें आवाज नहीं दे रहे हैं, उनकी गति रुक गयी है, उसका परीक्षण हम नहीं करवाते हैं। जब ऐसी घटना घट जाती है तब जीवन भर का संताप हमें दे जाती हैं। माँ का तो दिल सूचना दे ही देता है लेकिन संतान का दिल भी सूचना दे, इसके लिये रिश्तों की कद्र करो। आज वह पुत्र पत्र लिख-लिख कर लोगों को सावचेत कर रहा है कि अपने पिता को अकेला मत छोड़ो, फोन नहीं उठाएं तो बार-बार फोन करो, आस-पास करो, लेकिन बेफिक्र होकर मत बैठ जाओ। जैसे एक पुत्र अपनी आग में जल रहा है, वैसे ही कहीं औरों को ना जलना पड़े, इसलिये अपने दिल को अपनों के लिये धड़कने दो।